लकड़हारे की कुल्हाड़ी | stories for kids in Hindi

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लकड़हारे की कुल्हाड़ी 

(लकड़हारे की कुल्हाड़ी) 

एक समय की बात है एक छोटे से गांव में एक श्याम नाम का लकड़हारा रहता था वह जंगल से लकड़ियां काटता और उन्हें बाजार में बेच कर पैसे कमाता था। वह लकड़हारा बहुत ही ईमानदार और सच्चा था। 


वह गांव के पास ही के जंगल में से लकड़ी काटता था और उन्हें बाजार में बेचता था। उसके पास लकड़ी काटने के लिए एक कुल्हाड़ी थी जिसे वह बहुत सम्भाल  कर रखता था। 


एक समय ऐसा आया जब लकड़हारा अपनी कुल्हाड़ी लेकर जंगल में लकड़ी काटने के लिए गया तो लकड़हारा देखता है कि जंगल में काटने के लिए सुखी लकड़ियां नहीं हैं। ऐसे में लकड़हारा बहुत परेशान हो जाता है और भगवान से कहता है –


“हे भगवान अब मैं क्या करूँ जंगल में से तो सुखी लकड़ियां खत्म हो गई हैं अब मैं पैसे कैसे कमाऊंगा”


लकड़हारा दुखी होकर जंगल में बैठ गया और आसमान की तरफ देखने लगा। 


 तभी उसकी नजरें एक तालाब पर पड़ी लकड़हारा पानी पिने के लिए तालाब के पास चला गया और पानी पिने लगा। जब लकड़हारा पानी पीकर लोटा तो उसने 4-5 सूखे पेड़ देखे लकड़हारे ने सूखे पेड़ों के पास जाकर कहा –


“हे भगवान तुम्हारा बहुत-बहुत धन्यवाद” 

लकड़हारे ने अपनी कुल्हाड़ी निकाली और पेड़ काटने लगा। श्याम लकड़हारा 4 पेड़ों की लकड़ियां काट चूका था पांचवा पेड़ तालाब के बहुत करीब था।


 जब लकड़हारा पांचवे पेड़ की लकड़ी काटने लगा और लकड़ी काटने के लिए उस पर कुल्हाड़ी से वार करने लगा। लकड़हारे के हाथ से कुल्हाड़ी फिसल गई और सीधे तालाब में जा गिरी। 


लकड़हारा परेशान हो गया और अपना सर पकड़कर बैठ गया तालाब बहुत गहरा था इसलिए लकड़हारा चाहते हुए भी कुछ नहीं कर पाया और रोने लगा। रोते हुए लकड़हारा भगवान से कहता है –


“हे भगवान मेरी सहायता करो मेरे पास लकड़ी काटने के लिए कोई भी दूसरी कुल्हाड़ी नहीं है मैं कल लकड़ी नहीं काट पाउँगा”


तभी तालाब से भगवान प्रकट होते हैं और लकड़हारे से पूछते हैं-


“तुम रो क्यों रहे हो”?


लकड़हारा खुश होकर जवाब देता है –


“हे भगवन मेरी कुल्हाड़ी इस तालाब में गिर गई है इस कारन मैं लकड़ियां नहीं काट पाउँगा”


तभी भगवान कहते हैं –


“तुम चिंता मत करो मैं तुम्हे अभी तुम्हारी कुल्हाड़ी लाकर देता हूँ”


तालाब से प्रकट हुए भगवान अपने हाथ को आगे करते हैं और उनके हाथ मे सोने की बहुत ही कीमती कुल्हाड़ी प्रकट हो जाती है और भगवान लकड़हारे से पूछते हैं- 


“क्या यह सोने की कुल्हाड़ी तुम्हारी है” ?


लकड़हारा ईमानदार था लकड़हारे ने जवाब-


 “दिया भगवान यह मेरी कुल्हाड़ी नहीं है मेरी कुल्हाड़ी तो दूसरी है”।


तब भगवान ने अपने हाथ को आगे किये और चाँदी की कीमती कुल्हाड़ी प्रकट की और लकड़हारे से पूछा –


“क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है”  ?


लकड़हारे ने जवाब दिया –


“यह कुल्हाड़ी भी मेरी नहीं है” । 


भगवान श्याम लकड़हारे की परीक्षा ले रहे थे भगवान को अब पता चल गया था कि लकड़हारा बहुत ही ईमानदार है। तभी भगवान ने लोहे की कुल्हाड़ी प्रकट की और लकड़हारे से पूछा –


“क्या यह तुम्हारी कुल्हाड़ी है” ?


श्याम लकड़हारा बहुत ही खुश होकर कहता है –


“हाँ भगवान यही मेरी कुल्हाड़ी है”


भगवान ने लोहे की कुल्हाड़ी श्याम लकड़हारे को दे दी। लकड़हारे ने भगवान का सच्चे दिल से धन्यावाद कहा। 


तभी भगवान ने कहा-


 “मैं तुम्हारी परीक्षा ले रहा था तुम बहुत ही ईमानदार हो इस कारण मैं तुम्हे ये दो सोने और चाँदी की कुल्हाड़ियाँ दान में देता हूँ” । 


लकड़हारा बहुत ही खुश हुआ और उसने वह कुल्हाड़ियाँ ले ली और लकड़हारे ने सोने और चांदी की कुल्हाड़ियाँ बेच दी। 


लकड़हारा बहुत अमीर हो गया। उसके बाद श्याम लकड़हारे ने शादी  कर ली और अपना घर बसा लिया। 


(कहानी की शिक्षा )

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि हमें हमेशा ईमानदारी से रहना चाहिए बिना। ईमानदारी से रहने वाले लोगों को भगवान किसी न किसी रूप में आकर खुद पुरुषकार देते हैं। 

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