पंचतंत्र की सरल और नैतिक कहानियां | Panchatantra Stories in Hindi With Audio

Table of Contents

Panchatantra Stories in Hindi

Panchatantra Stories in Hindi
Panchatantra Stories in Hindi



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 पंचतंत्र क्या है 

 

आपने कभी न कभी तो ऐसी कहानियां तो सुनी ही होंगी जिनमे शिक्षा दी जाती है वह कहानियां हमें बुद्धिमान बनाने का काम करती है उन्हें पंचतंत्र की कहानिया कहा जाता है पचतंत्र एक किताब है जो मुर्ख से मुर्ख व्यक्ति को पशु पक्षियों की कहानियों के माध्यम से बुद्धिमान बना देती है। इसका इतिहास कुछ इस प्रकार है। 

एक समय था जब महिलारोप्य नाम का एक नगर हुआ करता था उस नगर का राजा जिसका नाम अमरशक्ति था बहुत महान  था। लेकिन उनके तीन पुत्र थे जिनका नाम बहुशक्ति, उग्रशक्ति, अनेकशक्ति था राजा उनसे बहुत परेशान था क्योंकि वह बहुत मुर्ख थे। एक दिन राजा ने परेशांन होकर और उन्हें पढाई लिखाई से  विमुख देख एक सभा बुलाई और अपने मंत्रियों से कहा-

“आप लोग जानते हैं कि मेरे तीन पुत्र बुद्धि हीन हैं उनमे से कोई भी मेरे बाद राजपाठ सँभालने योग्य नहीं है। इसलिए कोई ऐसा उपाए कीजिये जिससे इनकी बुद्धि का विकास किया जा सके”।

तभी एक पंडित बोले-

“महाराज सिर्फ़ व्याकरण का अध्ययन करने में ही बारह वर्ष का समय लग जायेगा और उसे बाद शास्त्र आदि का ज्ञान दिया जाता है जिससे बुद्धि का विकास होता है”।

इसपर एक मंत्री बोलता है –

“महाराज यह जीवन नाशवान है इसलिए हमें किसी छोटे और बुद्धि का विकास करने वाले शास्त्र के बारे  विचार करना चाहिए। 

राजा कहता है –

“क्या यह संभव है कि बहुत कम समय में ही सभी शास्त्रों का ज्ञान प्राप्त हो सके। क्या तुम किसी ऐसे विद्वान को जानते हो। 

मंत्री ने कहा –

 हाँ मैं ऐसे विद्वान को जनता हूँ जो बहुत ही कम समय  में आपके पुत्रो को बुद्धिमान बना सकता है उनका नाम पंडित विष्णु शर्मा है। 

राजा के कहने पर अगले दिन विष्णु शर्मा को राजा के सामने पेश किया जाता है। राजा ने विष्णुशर्मा को अपनी दुविधा सुनाई। 

इसपर विष्णुशर्मा ने  कहा-

“राजन मैं आपके पुत्रों को केवल छः महीने में ही बुद्धिमान और शास्त्रों के ज्ञाता बना दूंगा”। 

राजा यह बात सुनकर बहुत खुश हुआ और कहा –

“अगर आप ऐसा कर सकते हो तो मैं आपको 50 गांव इनाम के तौर पर दूंगा”। 

वीष्णुशर्मा ने कहा –

राजा मुझे कुछ नहीं चाहिए बल्कि अगर मैं ऐसा नहीं कर पाया तो अपना नाम बदल दूंगा। इस तरह विष्णुशर्मा ने उनके तीनो पुत्रों को मात्र छः महीने में ही शास्त्रों के ज्ञाता और बुद्धिमान बनाया। 

 

विष्णु शर्मा ने सभी शास्त्रों के अध्ययन को पांच भागों में बाँट दिया था जो बहुत छोटे थे। इस लिए इसे पंचतंत्र कहा गया है। 

 

ये पांच भाग हैं –

  • मित्रभेद (मित्रों में मनमुटाव एवं अलगाव )
  • मित्रसम्प्राप्ति (मित्र प्राप्ति एवं उसके लाभ)
  • काकुलुकीय (कौवे एवं उल्लुओं की कथा)
  • ळब्दप्रनाश (मृत्यु या विनाश के आने पर)
  • अपरीक्षितकारक (हड़बड़ी में क़दम न उठायें)

 

 

पंचतंत्र में शास्त्रों को बहुत ही सरल भाषा और पशु पक्षियों की कहानी के माध्यम से बताया गया है। यह बच्चों से लेकर बड़ों सभी की बुद्धि के विकास के लिए बहुत उपयोगी है सभी पंचतंत्र की कहानियां निचे से पढ़ सकते हैं। 

1. मित्रभेद की कहानियां  (panchatantra stories in hindi)

 

1.1 कील खींचने वाला बंदर (panchatantra stories in hindi)

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कील खींचने वाला बंदर
एक नगर में किसी ईमानदार बनिये के द्वारा बाग में मंदिर बनवाया जा रहा था। मंदिर निर्माण के लिए बनिये ने बहुत से कारीगरों को काम पर लगाया हुआ था।
 
 कारीगर दोपहर के भोजन के लिए पास के ही शहर में जाते थे। उस बाग में बंदरो का झुण्ड कारीगरों के भोजन पर जाने बाद वहां कूदता था। एक दिन एक कारीगर ने बहुत बड़े पेड़ की लकड़ी बिच में से चिर कर रख दी और उसमे किसी कारणवश बिच में कील ठोक दी और भोजन करने के लिए शहर चले गए। 
 
उनके पीछे से बाग में एक बंदरो का झुण्ड आ जाता है।  बंदरों का झुण्ड कभी मंदिर पर कूदता है और कभी मंदिर निर्माण के लिए रखी हुई लकड़ियों पर तभी उनमे से एक बंदर कारीगर द्वारा बिच में से चिरी हुई लकड़ी के पास आ जाता है और उसपर लेट कर उसमे ठोकी हुई कील को बाहर निकलने की कोशिश करता है। 
दुर्भग्यवश वह बिच में से चिरी हुई लकड़ी का टुकड़ा घिसक जाता है और इसमें से उठी फ़ांस उसके पेट में जा घुसती है। परिणामस्वरुप वह मृत्यु को प्राप्त होता है। 
 
 

शिक्षा 

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि जो भी अपने काम को छोड़ कर दूसरे के काम में टांग अड़ाता है वह कील खींचने वाले बंदर की तरह मृत्यु को प्राप्त होता है।

 
 

1.2 सियार और नगाड़ा (stories of panchatantra in hindi)

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सियार और नगाड़ा
एक दिन बहादुर नाम का एक सियार भूख के मारे इधर उधर भटक रहा था। भटकता हुआ वह दो सेनाओं के लड़ने के मैदान में पहुंचा। वहाँ एक पेड़ के निचे एक नगाड़ा पड़ा हुआ था। जो सियार की नजर में नहीं पड रहा था।
 
 तभी एक हवा का झोंका आता है और पेड़ से एक लकड़ी टूट कर नगाड़े पर गिरती है जिससे बहुत जोरों से आवाज आती है और सियार डर के मारे सोचता है कि
 
 “अरे मारे गए लगता है कोई बड़ा जानवर भोजन ढूंढ़ने के लिए इस मैदान में आ गया है वह मुझे नहीं छोड़ेगा”। 
लेकिन एक और वो सोचता है कि “बिना जाने कि आवाज कौन कर रहा है भागना उचित नहीं होगा”। 
 
वह साहस करके यह देखने के लिए आगे बढ़ा तभी वह देखता है कि एक पेड़ के निचे एक नगाड़ा रखा हुआ है जो पेड़ से गिरी लकड़ी के कारण बज उठा। 
 
सियार उसके पास जाता है और ख़ुशी के मारे नगाड़े को जोर जोर से बजाने लगता है और सोचता है कि अवश्य ही यह चर्भी से भरा होगा। 
 
सियार मेहनत करके नगाड़े पर लगा चमड़ा फाड़ देता है। इस कोशिश में उसके दो दन्त टूट जाते हैं सियार अंदर देखता है कि उसमे तो लकड़ी और चमड़े के आलावा कुछ नहीं है। 
 
तब वह कहता है –“मैंने तो सोचा था कि यह चर्भी से भरा होगा लेकिन जब मेहनत की तब जाना कि उसमे कितनी लकड़ी पर कितना चमड़ा”। 
 

शिक्षा  

 

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि सिर्फ आवाज से नहीं डरना चाहिए उसकी छान बिन जरूर करनी चाहिए।

 

 

1.3 कौआ-कौई और काले सांप की कहानी (panchatantra stories in hindi with moral)

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कौआ-कौई और काले सांप की कहानी

 किसी राज्य में बरगद के बड़े से पेड़ में कौआ-कौई का जोड़ा रहता थे। उस पेड़ में एक काला सांप भी रहा करता था। कौई के बच्चों को हमेशा काला सांप खा जाता था। इससे दुखी होकर कौआ-कौई के जोड़े ने अपने परम मित्र सियार से सहायता मांगी और कहा –

 

“मित्र जिस पेड़ में हम रहते हैं उसमे एक नाग रहता है जो हर बार पेड़ के खोखले में से निकल कर हमारे सारे बच्चे खा जाता है ऐसी स्थिति में हमें क्या करना चाहिए। ” किसी ने सही कहा है –

 

जिसका खेत नदी के किनारे हो, जिसके घर में सांप रहता हो, ऐसे में कोई कैसे सुखी रह सकता है।

 

मित्र इस प्रकार हमें उस पेड़ में रहते हुए प्राण जाने का डर बना रहता है। 

 

इसपर सियार ने कहा –

 

“मित्रो तुम इतने कमजोर हो कि उस सांप को मार नहीं सकते। लेकिन अगर तरकीब लगाई जाये तो बड़े से बड़े  शत्रु को हराना बहुत आसान हो जाता है।” 

 

किसी ने ठीक ही कहा है –

 

 

“कमजोर से कमजोर के पास अगर तरकीब है तो वह बड़े से बड़े शूरवीर को हरा सकता है और तरकीब से शत्रु पर जो जीत मिलती है वैसे हथियारों से संभव नहीं।”

 

इस तरह सियार ने कौआ-कौई के जोड़े को तरकीब बताई। उसकी तरकीब के अनुसार वह एक नदी के किनारे जाते हैं। कौआ-कौई देखते हैं कि उस राज्य के राजा की राजकुमारियां वहां  अपने गहने उतार कर पानी में खेल रही हैं तभी कौआ-कौई का जोडा गहने उड़ा कर ले जाते हैं और बरगद के पेड़ के खोल में डाल देते हैं।

 

 यह देख राजकुमारियों के रक्षक कौआ-कौई के पीछे-पीछे चले आते हैं और पेड़ के खोल में गहने ढूंढ़ने लगते हैं। खोल में उन्हें गहनों के पास बैठा हुआ काला नाग दीखता है जिसे वो लाठी डंडो से पिट पिट कर मार डालते हैं। 

परिणाम स्वरुप कौआ-कौई अब आसानी से अपनी जिंदगी व्यतीत कर रहे हैं। 

 

शिक्षा 

 

 

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि शत्रु चाहे जितना भी ताकतवर क्यों न हो अगर तरकीब लगाई जाये तो उसे हराना बहुत आसान हो जाता है। 

 


1.4 बुद्धिमान खरगोश और शेर की कहानी (panchatantra short stories in hindi with moral)

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बुद्धिमान खरगोश और शेर की कहानी

एक जंगल में एक भासरुक नाम का शेर रहता था जो धीरे-धिरे जंगल के सभी प्राणियों को खा रहा था कोई भी प्राणी उससे नहीं बच सकता था।  एक दिन जंगल के प्राणियों ने यह देखा कि  धीरे-धीरे हमारे वंश समाप्त हो रहे हैं इस लिए हमें कोई उपाय करना चाहिए। 

जंगल के प्राणियों ने उस शेर के साथ बात की और कहा-

“हे जंगल के राजा आप जगल के सभी प्राणियों को धीरे धीरे नष्ट कर रहे हैं इसलिए एक ऐसा उपाय करते हैं जिससे आपकी भूक भी मिट जाये और हमारा वंश भी खत्म न हो।” 

इसपर शेर कहता है –

यह कैसे संभव है?

जंगल के प्राणियों में से एक ने कहा- 

“राजा आपको मेहनत करने की कोई जरुरत नहीं है हमारे में से एक प्राणी आपकी भूख मिटाने के लिए खुद चलकर आया करेगा।” 

तभी भासरुक शेर कहता है –

“अगर ऐसा नहीं हुआ तो मैं तुम सब को अपना भोजन बना लूंगा। “

इस तरह सभी प्राणियों की बारी आती और शेर उन्हें अपना भोजन बना लेता। एक दिन एक खरगोश की बारी आई। 

खरगोश ने सोचा अगर मैंने कोई उपाए नहीं किया तो यह ऐसे ही सभी प्राणियों को खाता रहेगा। जाते हुए खरगोश ने एक कुआ देखा और उसके दिमाग में एक तरकीब आयी। खरगोश जान भूझकर शेर के पास देर से गया। 

 इस ओर भासरुक शेर के मन में यह ख्याल आता है कि अगर आज कोई मेरा भोजन बनने के लिए नहीं आया तो मैं सभी प्राणियों को खा जाऊंगा।

लेकिन कुछ देर बाद वहां खरगोश आ जाता है। 

भासरुक शेर कहता है-

“छोटे से प्राणी तू इतनी देर से क्यों आया अब अपने भगवान को याद कर ले। ”

इसपर खरगोश ने एक कहानी बनाई और कहा  –

“हे जंगल के राजा हमारे मुखिया ने हमें छोटा प्राणी समझ कर और आपकी भूख सिर्फ एक खरगोश से न मिटे, इसलिए मेरे साथ तीन ओर खरगोशों को भेजा था लेकिन रास्ते में किसी दूसरे शेर ने हमें रोक लिया और कहा-

कहाँ जा रहे हो तुम अब अपने इष्ट देव को  याद कर लो क्योंकि मैं तुम्हे अपना भोजन बना लूंगा। 

मैंने कहा- 

हम अपने स्वामी दूसरे शेर का खाना बनाने के लिए जा रहे हैं। 

इसपर शेर कहता है –

अरे वो शेर मुर्ख है जो बैठे बैठे तुम्हे खाता है इसलिए मुझसे उसका मुकाबला करवाओ जो जीतेगा तुम उनका ही भोजन बनोगे। 

इस तरह उस शेर ने तीनो खरगोशों को अपने पास रख लिया और मुझे आपके पास यह सन्देश देने के लिए भेज दिया।” 

 भासरुक शेर ने कहा –

ये कौन सा शेर है जो मेरी जगह लेना चाहता है तू मुझे उसके पास ले चल। 

इस तरह खरगोश आगे आगे और शेर पीछे पीछे चलता है। खरगोश उसे उस कुए के पास ले जाता है और कहता है-

“महाराज वो इस बिल में घुसा है शेर कुए में देखता है उसे  पानी में अपनी परझाई दिखती है और वह खुर्राता है जिससे उसकी आवाज कुए में गूंजती है। शेर सोचता है ये वही शेर है जो मुझसे लड़ना चाहता है और कुए में झलांग लगा कर अपनी जान गंवा देता हैं। 

 शिक्षा 

 

 

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि जिसमे बुद्धि है उसमे बल है। 

 

 

 

1.5 जूँ और खटमल की कहानी (panchatantra small stories in hindi)

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जूँ और खटमल की कहानी

एक बार एक राज्य में बहुत धनवान राजा के सोने के कमरे में  राजा के रेशमी कपड़ों के बिच एक जूं रहा करती थी। जब राजा रात में सोने के लिए जाते और अपने खाट पर लेट जाते तो वह जूं निकल कर उनका रक्त चूसकर अपना जीवन व्यतीत करती। सब कुछ अच्छा ही चल रहा था। 

 

एक दिन उसके पास एक खटमल आया (एक जिव जो गंदे खाट में या कुर्सियों में रहता है ) जूं उसे देख लेती है और कहती है –

 

“तुम यहाँ क्यों आये हो क्या तुम्हे कहीं ओर रक्त चूसने को नहीं मिला।”

इसपर खटमल कहता है –

 

“ऐसा नहीं है मैंने तरह-तरह के मनुष्यों का रक्त चखा है। कसैला, कड़वा, खारा आदि तरह के रक्त का स्वाद भी मैंने चखा है लेकिन इस राजा का मीठा खून मैंने नहीं चखा इसलिए मैं आज इस राजा का रक्त चखने आया हूँ।”

 

खटमल जूं से बहुत अधिक निवेदन करता है कि मुझे राजा का रक्त चखने दे। जूं ने उसे रक्त चखने की आज्ञा दे दी पर एक सलाह सामने रखी और कहा-

 

 “मैं राजा का खून रात में जब राजा सोते हैं तब चूसती हूँ इसलिए तुम भी राजा का खून राजा के सोने पर ही चूसना और झटपट से चले जाना। इसलिए तब तक तुम मेरे साथ रहो।” 

 

दोनों बैठ कर राजा का इंतजार करने लगते हैं राजा सोने के समय अपनी खाट पर लेट जाते हैं। खटमल से अब इंतजार नहीं हो रहा था उसने राजा के सोने से पहले ही राजा का रक्त चूसा राजा को एकदम सुई सी चुभी। तभी राजा ने अपने रक्षकों को बुलाया और कहा- 

 

“यहाँ अवश्य ही कोई खून पिने वाला जीव है इसलिए उसे ढूंढो और मारो।”

 

राजा के रक्षक राजा के वस्त्रों को एक-एक कर जांचते है लेकिन खटमल अपनी फुर्ती से वहां से भाग जाता है और उन्हें जूं दिखाई देती है जिसे वह मार देते हैं। 


शिक्षा 

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि किसी भी अनजान को अपने घर में आश्रय नहीं देना चाहिए।

 


1.6 नील के बर्तन में गिरे सियार की कहानी (panchatantra small stories in hindi)

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नील के बर्तन में गिरे सियार की कहानी

एक जंगल में चडरव नाम का एक सियार रहता था एक दिन उसे खाने के लिए भोजन नहीं मिल रहा था तो वह भटकते हुए एक गांव में घुस गया। घुसते ही उसके पीछे कुत्ते पड़ गए।

 कुत्तों ने उसे दांत और पंजों से जख्मी कर डाला पर वह साहस करता हुआ भागता रहा और एक कपडे रंगने वाले व्यक्ति के घर में जा घुसा वहां उसने कपडे रंगने के लिए एक बड़े बर्तन में नील घोल कर रख रखा था। 

सियार उसमे जा गिरा और नीले रंग का हो गया। कुत्ते भी उसे पहचान नहीं पा रहे थे जिस कारण वो अपनी अपनी दिशा में चले गए। सियार ने मौका देखकर जंगल की और भागना शुरू कर दिया। जंगल के सभी जीव उसे अलग ही तरह का जीव समझ रहे थे। 

तभी एक शेर और उसके साथियों की नजर उस पर पड़ी सियार जानता था कि कोई भी जीव मुझे इस रूप में देख कर हानि नहीं पहुंचाएगा क्योंकि सभी मुझसे डर रहें हैं। वैसा ही हुआ शेरों की भी सियार को खाने की हिम्मत नहीं हो रही थी। 

जंगल के सभी प्राणी उसका नीला रूप देख कर डर रहे थे।  तभी सियार कहता है- 

“डरो मत मुझे ब्रम्हा जी ने बनाकर तुम्हारे उद्धार के लिए तुम्हारे पास भेजा है। मैं तुम सबको अपनी शरण में ले लूंगा।”

इस तरह अभी प्राणियों ने सोचा कि यह जीव सच कह रहा है क्योंकि हमने आजतक ऐसा जीव इस जंगल में नहीं देखा। 

सभी उसे अपना राजा मान लेते हैं और सियार उनको अपने सभी महत्वपूर्ण पद देता है जैसे शेर को मंत्री, बाघ को सेजपाल और भेड़िये को दरबान आदि। 

पर उस सियार ने अपने सभी परम मित्रो जो सियार ही थे उनको जंगल से निकाल दिया। सियार राजा बनकर बहुत खुश था वह दूसरे सियारों से बात भी नहीं करता था। 

चड़रव सियार को राजा बने हुए कुछ समय बीत गया लेकिन एक दिन उसे जंगल में कुछ दूसरे सियारों की आवाजें सुनाई दी।

 वह अपने आप को रोक न सका और जोर से आवाज निकलने लगा सभी प्राणी समझ गए कि यह दुष्ट सियार नीला रंग अपने शरीर पर रंग कर हमें धोखा दे रहा है तभी क्रोधित होकर शेरों ने उसे मार डाला। 

शिक्षा 

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि जो भी धनवान, बड़ा पद मिलने पर या राजा आदि बनने पर अपने साथियों को भूल जाता है और अजनबियों को अपनाता है वह मुर्ख चडरव नाम के सियार की तरह मृत्यु पाता है। 

1.7 शेर, सियार, चीता, कौआ और ऊंट की कहानी (panchatantra stories)

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शेर, सियार, चीता, कौआ और ऊंट की कहानी

एक जंगल में मदोत्कट नाम का एक शेर रहता था उसके नौकर बाघ, चिता, कौआ, सीयार आदि पशु थे। एक दिन मदोत्कट नाम के शेर ने भटकते हुए एक ऊंट को देखा जो अपने झुण्ड से भटक गया था। 

 शेर ने सियार से पूछा-“यह कौन सा जिव है आजतक इस तरह का जीव हमने नहीं देखा।” 

सियार ने कहा –“महाराज ये बड़ा सा और लम्बी गर्दन वाला जीव ऊंट है यह आपका भोजन बन सकता है इसलिए आप इसपर हमला कीजिये और इसे अपना भोजन बनाइये।”

इसपर शेर ने कहा-“मुर्ख घर आने वाले को मैं कभी नहीं मरता सत्य ही कहा है कि-

बिना किसी डर के और विश्वाश करके घर आने वाले को जो भी मरता है उसे ब्राह्मण के मारने जितना पाप लगता है।”

इसलिए तुम उसे मेरे पास बुलाओ मैं उससे यहाँ आने का कारण पूछूंगा। सियार ने ऊंट को मदोत्कट शेर के पास बुलाया। शेर ने उससे यहाँ आने का कारण पूछा ऊंट ने अपने झुण्ड से भटकने का कारण बताया। 

शेर ने कहा अब तुझे गांव में जाकर बोझ ढ़ोने की जरुरत नहीं अब तू मेरे पास बिना किसी भय के रह और जंगल की हरी हरी को घास  मनचाह तरीके से खा। 

ऊंट ने शेर की बात मान ली और ऊंट शेर के पास ही रहने लगा। 

एक दिन मदोत्कट शेर की एक हाथी के साथ लड़ाई हो गई जिसमे शेर बहुत जख्मी हो गया शेर से अब चला भी नहीं जा रहा था। शेर को जख्मी हालत में कई दिन हो गए जिससे सियार, चिता, कौआ, बाघ आदि भूख के मारे तड़प रहे थे क्योंकि मदोत्कट ही उन्हें भोजन आदि देता था। 

सभी नौकर शेर से कहने लगे- 

“महाराज इस तरह तो हम सभी मर जायेंगे। कोई ऐसा उपाय कीजिये जिससे आप भी अपना पेट भर लें और हम भी।”

शेर ने कहा- 

“मैं ऐसी जख्मी हालत में कोई भी शिकार नहीं कर सकता इसलिए तुम कोई ऐसे जानवर को पकड़ कर लाओ जिससे मेरी भी भूख मिट जाये और तुम्हारी भी।”

शेर के सभी नौकर शिकार ढूंढ़ने के लिए चले गए। बहुत कोशिश करने के बाद भी उन्हें कोई ऐसा शिकार नहीं मिला जिसे वो अपना भोजन बना सकें। 

तभी सियार कौए से कहता है-

 “इतनी मेहनत करने के बाद भी हमें कोई शिकार नहीं मिला क्यों न हम अपने महाराज से इस ऊंट को अपना शिकार बनाने की बात कहें।”

कौए ने कहा –

“तुम सही कहते हो हमें महाराज से इस सन्दर्भ में बात करनी चाहिए क्योंकि यही एक ऐसा जीव है जो हम सबकी भूख मिटा सकता है।”

सियार मदोत्कट शेर के पास जाकर कहता है –

“महाराज हमें कोई शिकार नहीं मिला इसलिए हमें उस ऊंट को अपना शिकार बनाना चाहिए क्योंकि वही हमारी भूख मिटा सकता है।” 

इसपर मदोत्कट शेर को बहुत गुस्सा आ जाता है कहता है –

“अरे मुर्ख अभयदान दिए हुए प्राणी को मैं कैसे मार सकता हूँ। “

इसपर सियार कहता है –

“महाराज अगर अभय दान दिए हुए प्राणी को आप दोखे से मारते हो तो पाप लगता है पर लेकिन वह प्राणी खुद आकर आपसे कहे की मुझे अपना शिकार बना लो तो अभयदान दिए हुए को अपने कुल को बचाने के लिए अपना शिकार बनाना चाहिए।

शेर न कहा-

 “जैसा तुम्हे उचित लगे वैसे ही करो। “

सियार और अन्य साथियों ने एक षड्यंत्र रचा जिससे वह खुद शेर को अपना बलिदान दे दे। 

अगले दिन सभी शेर के पास इकट्ठे हो गए और सियार कहने लगा- 

“महाराज आप मुझे खा लीजिये जिससे आपकी और सभी भूख मिट जाये।”

इसपर शेर कहता है –

“अरे मुर्ख तू कुत्तों की प्रजाति वाला है वाला है इसलिए मैं तुम्हे नहीं खा सकता।”

इसके बाद चिता कहता है –

“तू पीछे हट मुझे मालिक को अपना बलिदान देने दो।” 

शेर कहता है-

“तू छोटे शरीर वाला है इसलिए तुझसे हम सब की तृप्ति तो क्या मेरी तृप्ति भी नहीं होगी।”

कौआ कहता है –

“मुझे मालिक को अपनी जान देने दो जिससे मुझे स्वर्ग की प्राप्ति हो सके।”

मदोत्कट कहता है-

“तुम्हे अपना शिकार बना कर क्या फायदा तुम तो इतने छोटे शरीर वाले हो।”

ऊंट सोचता है कि सभी ने मालिक को अपना बलिदान देने के लिए कहा पर मालिक ने किसी को भी अपना भोजन नहीं बनाया इसलिए मैं भी मालिक से अपना बलिदान देने के लिए कहता हूँ। 

ऊंट कहता है –

“मालिक आप मुझे अपना भोजन बना लीजिये मेरे बलिदान से आप सबका पेट भर जायेगा और सबकी जान बच जाएगी। ” 

बस ऊंट के इतना कहते ही सियार और चीते ने उसका गला दबोच लिया और मार दिया और सभी ने आनद से अपना भोजन किया।  


शिक्षा 

 

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि हमें कभी भी अविश्वासी लोगों पर भरोसा नहीं करना चाहिए। 

1.8 टिटिहरी और समुद्र की कहानी (panchatantra stories)

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 टिटिहरी और समुद्र की कहानी

एक समय की बात है समुद्र के किनारे टिटिहरी और टिटहरे का जोड़ा रहता था। टिटिहरी ने गर्भ धारण किया हुआ था। जब  टिटिहरी का प्रसव काल आया तो उसने टिटहरे से कहा –

“प्रिय! मेरा प्रसव काल नजदीक आ रहा है कृपया करके तुम कोई ऐसा सुरक्षित स्थान ढूंढिए जहाँ मैं निश्चिन्त  होकर अंडे दे सकूँ।”

इसपर टिटहरे ने कहा –

“प्रिय! तुम इस सूंदर समुद्र के किनारे ही निश्चिंत होकर अंडे दो यहाँ तुम्हे कोई परेशानी नहीं होगी।” 

टिटिहरी ने कहा –

“यहाँ महीने में चार दिन बहुत तेज ज्वार(पानी की लहरें ) आती हैं जो हाथी को भी बहा ले जाये इसलिए आप कोई सुरक्षित स्थान ढूंढिए।”

टिटहरे ने जवाब दिया –

हा…  हा….  हा…. समुद्र की इतनी क्या हिम्मत जो मेरे बच्चों को नुकसान पहुंचाए।”

समुद्र सोचता है कि शायद इस टिटहरे में कोई खास शक्ति है जिसके घमंड में यह बोल रहा है। अगर मैं इसके अंडे बहा ले जाऊं तो देखता हूँ यह क्या कर पायेगा।

टिटिहरी समुद्र के किनारे ही अंडे दे देती है। जब दोनों खाना ढूंढ़ने के लिए कहीं बाहर गए होते हैं तो समुद्र अपनी लहरों के साथ अण्डे बहा कर ले जाता है। जब टिटिहरी आकर देखती है तो अंडे वहां नहीं दीखते और टिटहरे से कहती है –

“अरे मुर्ख ! मैंने तुझे पहले ही कहा था कि समुद्र अपनी लहरों के साथ अंडो को बहा ले जायेगा पर तू नहीं  माना। 


शिक्षा 

शत्रु का बल जाने बिना उससे कभी भी शत्रुता नहीं करनी चाहिए। 

 

और ज्यादा –

 

“संकट आने से पहले उपाए करने वाला और संकट के समय उपाय करने वाला हमेशा सुख पाता है पर भाग्य भरोसे बैठे रहने वाला हमेशा दुःख पाता है। 

 

1.9 लकड़ी से गिरे कछुए की कहानी (vishnu sharma panchatantra stories in hindi)

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 लकड़ी से गिरे कछुए की कहानी
एक बार के एक तालाब में कम्बुग्रीव नाम का एक कछुआ रहता था उसके साथ उसके दो परम मित्र हंस रहते थे वो अपना जीवन बहुत ही अच्छे से व्यतीत कर रहे थे। एक बार बारिश न होने के कारण जिस तालाब में कछुआ रहता था वह धीरे धीरे सूखने लगा। 
 
तभी कछुए से हंस आकर कहते हैं –
 
“अरे मित्र ! तुम्हारा जीवन तो अब खतरे में पड़ रहा है इसलिए तुम्हे कोई उपाए करना चाहिए।” 
 
कछुआ कहता है –
 
“हाँ मित्र तुम सही कह रहे हो इस तालाब में अब कीचड़ के आलावा अब कुछ नहीं रहा इस कारण मेरा जीवन कठिन हो गया है। तुम मेरे लिए कोई ऐसा तालाब ढूंढो जिसमे पानी हो और मैं वहां अपना जीवन व्यतीत कर सकूँ।”
 
दोनों हंस तालाब ढूंढ लेते हैं पर जहा वह तालाब होता है वह कछुआ चलकर नहीं पहुँच पाता। 
 
दोनों हंसो ने तालाबों के बारे में कछुए को बताया कि वह बहुत दूर है तुम वहां चलकर नहीं पहुँच सकते। 
 
कछुआ कहता है –
 
“मित्रो मैं एक तरीके से उस तालाब तक पहुँच सकता हूँ अगर तुम मुझे उड़ा कर ले जाओ। “
 
हंसों ने कहा –
 
“मित्र ! यह कैसे संभव है ?
 
कछुए कहता है –
 
“तुम दोनों अपनी चोंच में एक लकड़ी के टुकड़े को दोनों हिस्सों से पकड़ लेना मैं उसे बिच में से पकड़ लूंगा और तुम मुझे उड़ा कर ले जाना। “
 
हंसो ने कहा –
 
“मित्र ! हम ऐसा ही करेंगे पर आपको उस समय चुप रहना होगा। “
 
कछुए ने कहा –
 
“ठीक है जैसा तुम कहो।” 
 
दोनों हंस लकड़ी को अपने मुँह में पकड़ लेते हैं और कछुआ भी लकड़ी को मुँह में पकड़ लेता है। हंस उसको लेकर उड़ जाते हैं। उड़ते हुए बिच में एक गांव आता है गांव के लोग हंसों और कछुए को देख कर कहते हैं –
 
“वो देखो दो हंस अपने मुँह में कुछ अजीब चीज लटका कर ले जा रहे हैं।”
पुरे गांव में हलचल मच जाती है और वहां के नागरिक उसे अलग अलग तरह वस्तु बताते हैं जिससे कछुए जो गुस्सा आ  जाता है और वह बोल उठता है –
 
“अरे मूर्खो ….. 
 
वह अपनी बात पूरी भी नहीं पाता कि निचे जा गिरता है और  मृत्यु को प्राप्त होता है।  
 

शिक्षा 

“जो अपनों की बात नहीं मानता उसके साथ लकड़ी से गिरे कछुए जैसा होता है।”

 

1.10 तीन मछलियों की कहानी (stories from panchatantra in hindi)

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तीन मछलियों की कहानी

एक तालाब में तीन मछलियाँ अपने परिवार सहित ख़ुशी-ख़ुशी रहती थी। तीनो मछलियों के पूर्वज भी उसी तालाब में रहा करते थे। एक दिन कुछ मछुआरे श्याम के समय मछलियां मार कर उस तालाब के पास से गुजरे और तालाब की ओर देखने लगे उस तालाब में बहुत सी अन्य मछलियां भी रहती थी, मछुआरों ने उन्हें देख कर कहा –

“मित्र! यह तालाब मछलियों का भरा पड़ा है इसलिए हम कल का भोजन इसी तालाब से पकड़ेंगे।”

तीनो मछलियों ने यह बात सुन ली सुनते जैसे उनके ऊपर आसमान से बिजली टूट कर गिर पड़ी और कहने लगी –

“क्या तुमने मछुआरों की बात सुनी, वह कल हमारे तालाब से मछलियां मार कर ले जायेंगे जिससे हमारा नमो निशान मिट जायेगा।” 

तीनो में से एक मछली ने सलाह बनाई कि हम इस तालाब से दूसरे तालाब में अपने परिवार के साथ चलीं जाएँगी और उसने जाकर अपनी दोनों मित्र मझलियों से यह बात कही। उनमे से एक मछली ने उस मझली की बात मान ली पर एक ने कहा-

 “तुम बिलकुल गलत कह रही हो हमें अपने पूर्वज के पुश्तैनी घर को छोड़कर नहीं जाना चाहिए और अगर हमारी मृत्यु ही नजदीक आ रही है तो दूसरे तालाब में जाने से भी हम नहीं बचेंगी।”

दोनों मछलियां अपने परिवार के साथ दूसरे तालाब में चलीं जाती है लेकिन एक मछली उनके साथ नहीं जाती। 

अगले दिन मछुआरे आकर उस तालाब को उस मछली सहित खाली कर देते हैं और उन दोनों मछलियों की दूसरे तालाब में जाने से जान बच जाती है। 

शिक्षा 

 

शुभ अथवा अशुभ, किसी भी उपाय से संकट में पड़ी अपनी जान बचानी चाहिए, और जान बचने के बाद ही धर्म के बारे में सोचना चाहिए। 

और भी 

जिस समय प्राण संकट में हो उस समय जो व्यक्ति मोह-माया के चक्कर में फंसता है उसकी जान चली जाती है, और जान चली जाने पर मोह-माया का कोई उपयोग नही रहता।  

1.11 चिड़िया और हाथी की कहानी (hindi stories for kids-panchatantra in hindi)

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चिड़िया और हाथी की कहानी

चिड़िया का एक जोड़ा एक वृक्ष में घोंसला बनाकर रहा करता था। समय के साथ चिड़िया ने उसी घोसले में अंडे दिए। कुछ समय बाद कड़ी धुप से परशान से एक हाथी उस वृक्ष की छांव में आकर बैठ गया और सो गया। चिड़िया यह देखती रही।  कुछ देर बाद जब हाथी नींद से जागा तो उसने मस्त होकर पेड़ की एक डाली तोड़ डाली जिससे उस चिड़िया के अंडे निचे गिरकर टूट गए पर किसी तरह चिड़िया की जान बच गई। 

चिड़िया दुखी होकर रोने लगी। जब भी चिड़िया को वो दुर्घटना याद आती तो वह अपने आपको रोने से नहीं रोक पाती थी। एक दिन उसके प्रिय मित्र कठफोड़वे ने उसे रोते हुए देख लिया और उसके दुखी होने का कारण पूछा –

चिड़िया ने कहा –

“प्रिय! एक दुष्ट हाथी ने मेरे अंडो को फोड़ दिया अब मैं उससे बदला लेना चाहती हूँ जिससे मेरे बच्चों के मरने से पैदा हुआ मेरा दुःख दूर हो सके, अगर तुम मेरे सच्चे मित्र हो तो मेरा इस कार्य में साथ दो।”

कठफोडवे ने जवाब दिया –

“यह भी कोई पूछने योग्य बात है मैं तुम्हारा सच्चा मित्र हूँ इसलिए उस हाथी को मारने के लिए तुम्हारा साथ जरूर दूंगा मेरी एक मक्खी मित्र है जो बहुत ही होशियार है वह हाथी को मारने में हमारा साथ देगी।”

कठफोड़वा और चिड़िया दोनों मक्खी के पास जाते हैं और कठफोड़वा कहता है –

“मित्र ! ये चिड़िया मेरी परम मित्र है इसके अण्डे एक हाथी ने फोड़ दिए हैं इसलिए यह उस हाथी से बदला लेना चाहती है।”

मक्खी कहती है-

“ठीक है मैं तुम्हारी सहायता अवश्य करुँगी हम मिलकर मेरे परम मित्र मेंढक के पास चलते हैं वह हाथी को मारने के लिए हमें उचित सलाह देगा।

सभी मेढक के पास जाकर उसके आगे खड़े हो जाते हैं और पूरी बात बताते हैं। 

इसपर मेढ़क कहता है –

“ठीक हैं मैं इस काम में तुम्हारी सहायता जरूर करूँगा, मक्खी! तुम दोपहर के समय हाथी के कान में जाकर मधुर संगीत गाना जिससे उसकी आंख लग जाये और कठफोड़वा उसी समय उसकी आंखे फोड़ डालेगा और जिस समय उसे प्यास लगेगी तो वह अँधा होकर अपने कानो से आवाज सुनता हुआ तालाब की तरफ आएगा मैं बड़े से गड्ढे के पास अपने परिवार से साथ जोर जोर से बोलने लगूंगा, वह समझेगा कि वही तालाब है हाथी गड्ढे में जा गिरेगा।”

मेढ़क की योजना के अनुसार बिलकुल ऐसा ही किया गया पहले मक्खी ने दोपहर में जाकर उसके कानो में मधुर संगीत गुनगुनाया, कठफोड़वे ने पीछे से आकर उसकी आंखे फोड़ डाली, प्यास के मारे हाथी मेढक की आवाज सुनकर गड्ढे में गिरकर मर गया। 


शिक्षा 

निःसार वस्तुओं का समूह भी अजेय बन जाता है। तिनकों से बटे रस्से से हाथी भी बंध जाता है। 

अर्थात : अगर मनुष्य कोई भी कार्य समूह में करता है और योजना बनाकर कार्य करता है तो असंभव कार्य भी संभव बन जाता है।  


और पढ़ें (मित्रभेद) पंचतंत्र की कहानियां 

 

 

2 मित्रसम्प्राप्ति  की कहानियां (Panchatantra Stories in Hindi)

 

2.1 साधु और चूहे की कहानी (panchatantra stories in hindi language)

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साधु और चूहे की कहानी
एक नगर में बहुत पुराना शिव का मंदिर था। उसमे एक सन्यासी रहा करता था जो दिन में भिक्षा मांग कर अपना गुजरा करता था। भीख मांगने के बाद उसके पास बहुत खान पान की चीजें इकठ्ठा हो जाती थी जिसे वह भिक्षा पात्र में रख कर मंदिर में एक ऊँचे घूंट पर लटका देता था जिससे कोई चुरा न सके। वह भिक्षा में दी गयी चीज़ों से मंदिर में मजदूरों से साफ सफाई करवाता था और मजदूरी के तौर पर उन्हें भिक्षा में प्राप्त चीज़ें देता और खुद भी खाता था।
उसी मंदिर में एक चूहा भी रहता था जो ऊँचे खूंटे से लटकी हुई भिक्षा की चीजों को चुरा लेता था। सन्यासी उस चूहे से बहुत दुखी था। एक दिन उस सन्यासी के पास उसका एक पुराना मित्र आया और दिन भर अपने हाल और इधर उधर की बातें एक दूसरे को सुनाने के बाद वह रात को सोने के लिए लेट गए। वह सन्यासी चूहे से अपनी भिक्षा की चीजों को बचने के लिए सोते सोते भिक्षा पात्र को एक डंडे से हिलाता रहता था। सन्यासी का मित्र उससे बाते कर रहा था पर वह उस चूहे के ध्यान में और डंडे से भिक्षा पात्र हिलता हुआ यह जानने के कोशिश करता कि आखिर वो चूहा कैसे इतनी ऊंचाई से मेरी भिक्षा की चीजों को चोरी कर लेता है। इस कारण वह उसकी बातों पर ध्यान नहीं दे रहा था। 
सन्यासी का मित्र बोला-
 “तू मेरा सच्चा मित्र नहीं है क्योंकि तू मेरी बातों का जवाब नहीं देता इसलिए मैं किसी दूसरे मंदिर में जा रहा हूँ।”
इस पर ब्राह्मण कहता है –
“अरे मित्र नहीं, मेरा तुम्हारे सिवा कोई नहीं है। मैं तुम्हारी बातों पर ध्यान इसलिए नहीं दे पा रहा हूँ, क्योंकि एक दुष्ट चूहा मेरे भिक्षा पात्र में से चीज़ों की चोरी कर लेता है और मैं समझ नहीं पा रहा कि वो चूहा कैसे इतनी ऊँची झलांग लगा कर भिक्षा पात्र में घुस जाता है।” 
सन्यासी के मित्र ने कहा –
“हम कल उस चूहे के बिल को ढूंढेंगे।”
दोनों उसके बिल को ढूंढ़ते हैं और उन्हें बिल मिल जाता है। वो दोनों बिल खोदकर देखते हैं तो उन्हें उसके बिल में बहुत सारा भोजन मिलता हैं जो उस चूहे ने इक्कठा कर लिया था और चूहे कि पूरी जिंदगी खाने पर भी वह खत्म न हो। 
इस पर सन्यासी ने कहा –
इस चूहे के अंदर इतना सारा आत्मविश्वाश इस भोजन के कारण  भर गया है और तभी यह इतनी ऊँची झलांग लगा पाता है। अगर हम इस भोजन को यहाँ से उठा ले तो अवश्य ही यह देखकर चूहे को झटका लगेगा और  उसका आत्मविश्वाश टूट जायेगा जिसके कारन वह झलांग नहीं लगा पायेगा। 
सन्यासी और उसके मित्र ने ऐसा ही किया दोनों ने चूहे द्वारा इक्कठा किया भोजन बिल से निकाल दिया। जब चूहा अपने बिल में वापिस लोटा तो वह भोजन वहां न पाकर बहुत दुखी हुआ और जब दुबारा सन्यासी के भिक्षा पात्र में से चीजें उठाने के लिए गया तब उससे ऊँची झलांग नहीं लगाई जा रही थी जिससे यह स्पष्ट हो गया कि वह आत्मविश्वास होने के कारन ही इतनी ऊँची झलांग लगा पाता था कि खूंटे से टंगे भिक्षा पात्र तक पहुंच सके। 

शिक्षा 

संसाधन और अधिक धन होने पर आत्मविश्वाश में कभी कमी नहीं आती लेकिन अगर हमारे पास धन या संसाधन नहीं हैं तो आत्मविश्वाश टूट जाता है। 

2.2 ब्राह्मणी और तिलों की कहानी (short panchatantra stories in hindi)

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ब्राह्मणी और तिलों की कहानी

 

एक नगर में ब्राह्मण और और उसकी पत्नी रहा करते थे। वे गरीब थे जिस कारन ब्राह्मण भिक्षा मांग कर अपनी रोजी रोटी कमाता था। एक दिन ब्राह्मण अपनी पत्नी से कहने लगा-

“प्रिय ! आज दक्षिणायन संक्रांति है जो भी इस दिन दान करता है वह अनत फल पाता है इसलिए तू किसी ब्राह्मण को दान दे देना और मैं भी नगर में दान मांगने के लिए जा रहा हूँ।”

इसपर ब्राह्मण की पत्नी क्रोधित होकर कहती है –

“अरे दरिद्र, कभी भी तूने मुझे अच्छा भोजन नहीं कराया, अच्छे कपडे पहनने को नहीं दिए और गहनों की तो बात ही छोड़ दो।”

ब्राह्मण जवाब देता है –

“प्रिय ! भगवान जितना भी जिस किसी को देता है उसे वह ख़ुशी ख़ुशी स्वीकार करना चाहिए इसलिए तुम दान अवश्य देना।” 

ब्राह्मण की पत्नी ने उसकी बात मान ली और ब्राह्मण दान मांगने के लिए चला गया। ब्राह्मण की पत्नी ने दान देने के लिए सोचा कि घर में तिल पड़े हैं मैं उन्हें अच्छे से साफ करके उनके लड्डू बना कर दान दूंगी इसलिए वह तिलों को पानी में धो कर और छांट कर सूखने के लिए धुप में रख देती है। 

थोड़ी ही देर बाद वहां एक कुत्ता आ जाता है और तिलों में पेशाब कर देता है। ब्राह्मणी सोचती है कि अब मैं इन्हे दान में नहीं दे सकती इसलिए नगर में जा कर इन छंटे हुए तिलों  के बदले में मैं बिना छंटे हुए तिल लेलूँगी। वह एक घर में तिल बदलने के लिए चली गयी और उस घर की गृहणी से कहने लगी कृपया करके आप इन छंटे हुए तिलों के बदले मुझे बिना छंटे तिल दे दो। 

गृहणी उसके हाथ से बदलने के लिए तिल ले लेती है तभी अंदर से उसका शास्त्रों का ज्ञाता पुत्र आया। ब्राह्मणी का पति भी उसी घर में दान लेने के लिए आया हुआ था। उसका पुत्र बोला माँ ये तिल न लो, बिना कारणवश कोई छंटे हुए तिल बिना छंटे हुए तिलों से नहीं बदलता। निश्चय ही इसके पीछे कोई कारन है। इस प्रकार उस ब्राह्मणी के तिल बदले नहीं जा सके।  

 

शिक्षा 

 

इस कहानी से हमें यह शिक्षा मिलती है कि कम मूल्य पर अगर कोई बहुत अधिक मूल्यवान वस्तु दे तो उसके पीछे कोई कारन होता है जैसे ब्राह्मणी के तिलों में कुत्ते ने पेशाब कर दिया था और वो उन साफ तिलों को बिना साफ तिलों से बदलने चली गयी। 

2.3 शिकारी, सूअर और सियार की कहानी (panchatantra moral stories in hindi)

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शिकारी, सूअर और सियार की कहानी

एक बार पर्वतों भरे जंगल में एक शिकारी रहा करता था एक दिन वह शिकार की तलाश में निकल पड़ा। चलते चलते एक पहाड़ पर भागता  हुआ उसे एक सूअर दिखा जिसे मारने के लिए वह उसके पीछे  भागा और अपने धनुष पर तीर चढ़ा कर उसे कान तक खिंच लिया और सूअर की और वार किया। सूअर को वह तीर जख्मी कर गया जिससे सूअर गुस्से में आकर शिकारी की तरफ भागा और अपने तीखे दांतो के वार से शिकारी को मार दिया और जख्मी सूअर भी दर्द के मारे मर गया। 

तभी एक सियार वहां आता है जो सूअर और शिकारी को एक जगह मरे पड़े देख कर कहता है-

“आज तो मेरे भाग्य में बिना मेहनत के ही भोजन है निश्चय ही मैं इसे धीरे-धीरे खा कर अपने कईं दिन बताऊंगा।”

ऐसा विचार करके सियार उसे धीरे-धीरे खाने लगा और सूअर के पेट से तीर आर पर हो गया था जब उसे सूअर आधा खा लिया तो वह सोचता है कि यह मांस जल्दी ही सड़ जायेगा इसलिए मैं इसे थोड़ा ओर खा लेता हूँ। सियार उसे खाने के लिए आगे बढ़ता है कि ढोकर लगकर सूअर के ऊपर जा गिरता है और सूअर के पेट से आर पार तीर उसके गले से लेकर माथे तक आर पार हो जाता है। और वह उसकी मृत्यु का कारन बनता है। 

 

शिक्षा 

लालच हमेशा नुकसान का कारन बनता है। 

और पढ़ें मित्रसम्प्राप्ति पंचतंत्र की कहानियां 

 
 
 

3  काकुलुकीय की कहानियां (panchatantra stories in hindi )

 

3.1 गरुड़, उल्लू और कौए की कहानी  

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गरुड़, उल्लू और कौए की कहानी

 

एक बार जंगल में मोर, हंस, चिड़िया, तोता, मुर्गे, कोयल, उल्लू, कबूतर आदि की सभा लगी हुई थी। वो आपस में महत्वपूर्ण विषयों पर चर्चा कर रहे थे। उनमे से कुछ सदस्य कहते हैं- 

“अरे! गरुड़ देव हम सबका राजा है जो हमेशा वासुदेव की सेवा में व्यस्त रहते हैं। परन्तु ऐसे राजा का क्या फायदा जो शिकारियों से हमारी रक्षा न कर सके। इसलिए हमको विचार करके किसी दूसरे सूंदर पक्षी को राजा बनाना चाहिए।”

बाद में वे बहुत सूंदर उल्लू को देखते हैं जिसे देखकर वो कहते हैं-“उल्लू ही हम सबका राजा होगा और इस उल्लू का ही राजतिलक करो।”

उल्लू का राज्याभिषेक करने के लिए सात समुदरों का जल लाया जाता है, एक सौ आठ जड़ीबूटुयों की जड़ें लेकर उनकी सामग्री बनाई जाती है, सोने का घड़ा पानी से भरा गया और पडित, प्रधान आदि जोर-जोर से मन्त्रों का उच्चारण करने लगते हैं। सिंहासन सजाया जाता है। 

उल्लू सिंहासन पर बैठने ही वाला था कि कहीं से एक कौआ आ  जाता है और कहता है-“अरे! तुम सबने यह मेला किस खुशी में लगाया है।”

पक्षियों ने उसे देखा और आपस में कहने लगे – “कहा जाता है पक्षियों में कौआ सबसे बुद्धिमान होता है।”

एक महाजन कौए से कहते हैं – “पक्षियों में कोई भी पक्षियों का राजा नहीं है। इसलिए हम उल्लू को राजा बना रहें हैं। लेकिन तुम ठीक समय पर आये हो। मेरी इस कार्य में सहमति नहीं है अब तू अपने विचार रख।” 

कौआ कहता है- ” महाजनो अन्य बुद्धिमान और सुन्दर पक्षियों के होते हुए भी आप लोग दिन में न देखने वाले और बदसूरत इस उल्लू को राजा बना रहे हैं  मेरी इसमें सम्मति नहीं है और उल्लू को राजा बनाकर हमारा क्या फायदा होगा। 

एक राजा के होते हुए भी दूसरे को राजा नहीं बनाया जा सकता। कहा भी है कि “एक ही राजा पृथ्वी के लिए हितकारी होता है।”

फिर गरुड़ के होते हुए हम उसका नाम लेकर ही शत्रु पर विजय प्राप्त करते हैं। अंधे उल्लू का नाम लेने से तो चिड़िया भी नहीं डरती। 

 

शिक्षा 

 

किसी कुशल और कामयाब मालिक होते हुए किसी दूसरे अकुशल और असफल को मालिक नहीं बनाना चाहिए। कुशल और कामयाब के नाम मात्र लेने से ही काम बन जाते हैं परन्तुं अकुशल और असफल का नाम लेने से कुछ प्राप्त नहीं होता। 

3.2 हाथियों और खरगोशों की कहानी (short stories of panchatantra in hindi)

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हाथियों और खरगोशों की कहानी

 एक बार जंगल में चतुर्दंत नाम का एक हाथी रहता है वह सभी हाथियों में प्रमुख था। एक बार जंगल में बारिश न होने के कारन नदी, नाले, तालाब झीलें सुख गई। सभी हाथियों ने इक्कठा होकर चतुर्दंत से कहा -“महाराज! ऐसे में हम प्यास से मर जायँगे इसलिए आप किसी ऐसी जगह के बारे में बताएं जहाँ हम आराम से रह सके और पानी की कमी न हो।” 

चतुर्दंत ने कहा – “आप चिंता मत कीजिये मुझे एक ऐसी जगह के बारे में पता है जहाँ एक पानी का गड्ढा है जिसमे पानी कभी खत्म नहीं होता इसलिए तुम सब वही चलो।”

चतुर्दंत के कहने पर सभी हाथी वहां चले जाते हैं और गड्ढे में मनमाने तरीके से स्नान करके सूरज डूबने के बाद बहार आते हैं और ख़ुशी के मारे भाग दौड़ करते हैं।  वहां बहुत से खरगोशों की बिलें भी थी जो उनके कूदने के कारन टूट जाती हैं कुछ खरगोश दबकर मर जाते हैं, कुछ की हड्डियां टूट जाती है, कुछ मरने के हालत में पहुँच जाते हैं। 

 खरगोश इक्कठा होकर विचार करते हैं और कहते हैं- “अरे! इन हाथियों ने हमारे परिवार के लोगों को मार दिया कुछ घायल कर दिए हैं और हमारे बिल भी तोड़ दिए हैं और यह हर रोज यहाँ पानी पिने आएंगे और हमारा नामो निशान मिटा देंगे। इसलिए हमें यह स्थान छोड़ कर चले जाना चाहिए। 

प्रमुख खरगोश कहता है- “नहीं ऐसा नहीं करना चाहिए अपने बाप दादाओं की जमींन हमें झोडक़र नहीं  जाना चाहिए  इसलिए इन हाथियों को यहाँ से भगाने का कोई उपाय सोचो।”

उनमे से एक खरगोश कहता है -“हाथियों से युद्ध करके तो हम कभी भी नहीं जीत सकते लेकिन अगर हम उन्हें डराएं तो शायद वे हाथी यहाँ न आये।”

किसी दूसरे खरगोश ने कहा – “अगर ऐसी बात है तो लवकरण नाम के खरगोश को बुलाओ जो बाते बनाने में बहुत माहिर है और उसे दूत बनाकर उन हाथियों के पास भेजो।”

सभी की सम्मति से लवकरण को हाथी के पास भेज दिया जाता है और लवकरण हाथियों के रस्ते में ऊँचे स्थान पर घड़ा होकर हाथियों से कहता है- “दुष्ट हाथी तूने अपने लाभ के कारन हमारे परिवार के खरोशों की जान ली है और हमारे घरों को तोड़ दिया है।” 

 

हाथी उससे सवाल करता है – “अरे! तुम कौन हो ?”

खरगोश जवाब देता है – मैं चन्द्रमा पर रहने वाला खरगोश हूँ भगवान चंद्र ने मुझे तुम्हारे पास दूत बनाकर भेजा है और कहा है कि तुमने हमारे परिवार के खरगोशो को मार दिया है और माल की हानि पहुंचाई है इसलिए तुम अपने लिए किसी दूसरे स्थान की तलाश करो और यहाँ मत आना। 

हाथी ने कहा – “मैं भगवान चन्द्रमा की आज्ञा का पालन जरूर करूँगा परन्तु तू मुझे भगवान चंद्र से मिलवा।”

खरगोश ने कहा- ” ठीक है भगवान चंद्र जख्मी घरगोशों को सहानुभूति देने के लिए हैं इसलिए तुम उनसे मिल सकते हो।”

यह कहकर खरगोश हाथी को उसी गड्ढे के पास ले जाता है और हाथी को गड्ढे के पानी में पड़ता हुआ चन्द्रमा का प्रतिबिम्ब दिखाकर कहता है – “मेरे स्वामी अभी व्यस्त है इसलिए तुम उनसे यहीं से प्रणाम करके वापिस लोट जाओ और यहाँ कभी नहीं आना।”

हाथी चन्द्रबिम्ब को प्रणाम करके वहां से लोट जाता है और  वापिस कभी नहीं आता। 

 

शिक्षा 

 

बड़ों का नाम लेने से हमेशा बड़ी सिद्धि मिलती है   

3.3 कौआ, खरगोश और तीतर की कहानी (panchatantra stories for kids in hindi)

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कौआ, खरगोश और तीतर की कहानी

एक बार एक कौआ किसी पेड़ के ऊपर रहता था और उसी पेड़ के खोखले में एक तीतर भी रहा करता था। वह कौए का बहुत पक्का मित्र बन चूका था। दोनों सारा दिन अपना भोजन करने के बाद श्याम को उसी पेड़ में आकर बातें करते अपने दिन का हाल सुनाते कथाएं बतातें।  

एक दिन तीतर अपने दूसरे मित्रों के साथ पके हुए धान के देश में चला गया और उसे वहां कई दिन बीत गए कौआ उसका हर रोज बड़ी बेसबरी से इंतजार करता। बहुत दिन बिताने के बाद भी तीतर नहीं आया यह देख कौआ बहुत दुखी हुआ। कौए ने उसकी वापसी की उम्मीद यह समझ कर छोड़ दी कि शायद उसे किसी ने जाल में फंसा लिया होगा या किसी कारणवश उसकी मृत्यु हो गयी होगी। 

कुछ ही दिनों बाद उस पेड़ के खोखले में एक खरगोश रहने के लिए आ गया कौए ने उसे उसमे रहने से नहीं रोका। एक दिन अचानक वहां वह तीतर आ गया और खरगोश को वहां रहते देख उनमे झगड़ा हो गया। 

तीतर कहने लगता है -“अरे! खरगोश तूने मेरे घर में कब्जा क्यों किया है अब तू यहाँ से चला जा।”

खरगोश जवाब देता है – “क्या तुम जानते नहीं की नदी, नाले, कूप, पहाड़ आदि के घरों का यह नियम है कि जो भी इन पर कब्जा करता है ये उसी के हो जाते हैं। 

दोनों का झगड़ा बढ़ता ही चला गया और दोनों ने किसी ज्ञानी पुरुष के पास अपना न्याय करवाने के लिए चले गए। रस्ते में झगड़ते हुए जाते समय उनको एक बिल्ली ने देख लिया। यह देख बिल्ली हाथ में माला लिए, आंखे बंद किये जोर जोर से प्रवचन करने लगी।  

दोनों ने यह देखा और कहने लगे – “ये बिल्ली बहुत ही ज्ञानी लगाती है पर हमारे लिए दुश्मन भी है इसलिए हम दूर से ही उससे पूछते है। 

दोनों बिल्ली पूछते है- “स्वामी क्या आप हमें न्याय दे सकते हैं।”

बिल्ली कहती है -“बालको चिंता मत करो और मेरे पास आओ जिससे मैं तुम्हे विस्तारपूर्वक ज्ञान दे सकूँ। जिससे तुम न्याय पा सको। 

दोनों ने सोचा कि यह बिल्ली बहुत ही ज्ञानी है इसलिए यह हमें नहीं खायेगी। हमें इसके पास जाना चाहिए। यह विश्वाश करके दोनों बिल्ली के पास चले जाते हैं और मौका देख बिल्ली उनको झपट लेती है और दोनों को खा जाती है। 

 

शिक्षा 

नीच और लालची को अपना स्वामी बनाने वाले नष्ट हो जाते हैं  

3.4 किसान और सांप की कहानी (panchatantra stories in hindi with pictures)

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 किसान और सांप की कहानी

एक बार एक गांव में हरिदत्त नाम का एक किसान रहता था। वह खेती करता था। परन्तु उसके खेती करने के बाद भी उस खेती से वह कुछ नहीं कमा पता था। उसकी सारी फसल नस्ट हो जाती थी एक दिन जब वह खेतों में काम कर रहा था तब उसने गर्मी से व्याकुल अपने खेत के बीचों बिच के एक पेड़ के निचे काला सांप बैठा हुआ था। 

सांप को देखकर हरिदत्त ने सोचा कि “शायद यह मेरी इस जमीन का देवता है मैंने कभी इसपर ध्यान नहीं दिया इसलिए ही मेरी फसल हर बार नस्ट हो जाती हैं मुझे अवश्य ही इसकी पूजा करनी चाहिए।” 

हरिदत्त कहीं से भीख मांग कर दूध लाया और सांप के आगे रखकर कहने लगा – “हे देवता मैंने आज से पहले आपको नहीं देखा था इसलिए मैंने आपकी पूजा नहीं की।” 

यह कहकर हरिदत्त सांप के आगे दूध रखकर चला गया। अगले दिन जब हरिदत्त ने अपने खेत में आकर देखा तो सांप को दूध पिलाने वाले कटोरे में एक सोने की मोहर पड़ी थी। 

हरिदत्त हर रोज यही काम करता और उसे हर रोज एक मोहर प्राप्त होती थी। हरिदत्त एक दिन अपने लड़के को सांप को दूध पिलाने के काम पर लगा कर शहर किसी काम से चला गया। उसका लड़का कटोरे में दूध लेकर सांप की बाम्बी के पास रखकर आ गया लेकिन जब वह अगले दिन उसे दूध पिलाने के लिए गया तो उसने कटोरे में एक मोहर देखी। 

मोहर देखकर उसने सोचा “शायद इस सांप ने अपनी बाम्बी में बहुत सोने की मोहरें छिपा रखी हैं जिसे ये हमें हर रोज एक एक निकल कर देता हैं।  अगर मैं इसको मार दूँ तो सारी मोहरें एक साथ ले लूंगा।”

यह सोचकर उसने एक डंडे से दूध पिटे सांप पर हमला कर दिया। लेकिन भाग्यवश वह किसी तरह बच गया और अपने जहरीले दांतो से उसे डस लिया जिससे वह तुरंत ही मर गया। गांव वालों ने उसे मरा देखकर वही जला दिया। 

 अगले दिन जब वह शहर से वापिस आया तो गांव वालों ने उसे सारी बात बताई और हरिदत्त  ने सांप का समर्थन किया। लेकिन सांप बील जोड़कर चला जाता है और किसान की आमदनी भी बंद हो जाती है। 

 

शिक्षा 

किसान ने सांप का स्नेह से समर्धन तो किया पर उसे कुछ प्राप्त नहीं हुआ क्योंकि सांप तो जा चूका था। इसलिए कहते हैं “पहले टूटी और बाद में जोड़ी प्रीति स्नेह यानि प्यार से नहीं जुड़ती।  

3.5 तीन छलिये और ब्राह्मण की कहानी (panchatantra stories in hindi with moral values) 

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तीन झलियों और ब्राह्मण की कहानी (image by kidsgen.com)

एक बार एक नगर में मित्र शर्मा नाम का एक ब्राह्मण रहता था। एक दिन ठण्डी-ठंडी हवा चलने के साथ धीमी-धीमी बारिश हो रही थी। तभी वह एक गांव में यज्ञ पशु की भिक्षा मांगने के लिए एक गांव में गया। एक यजमान से उसने भिक्षा में एक बकरा प्राप्त किया।

 बकरा मित्रशर्मा के साथ जाने को तैयार नहीं था इसलिए उसने बकरे को अपने कंधे पर लाद लिया और अपने गांव की और चलने लगा चलते हुए वह एक वन में पंहुचा। जहाँ तीन झलिये उसे कन्धे पर बकरा लादे हुए देख कर कहते हैं –

“अरे! सुनो इस  ब्राह्मण को हम तीनो मिलकर ठगते हैं और बकरे को उसके पास से ले कर आराम से अपनी पेट पूजा करेंगे।”

यह कहकर वो तीनो सलह बना लेते हैं। 

ब्राह्मण को उनमे से एक रास्ते में मिलता है और कहता है – “हे ब्राह्मण तुम ये मूर्खता क्यों कर रहे हो, अपनी पीठ पर कुत्ते को लाद कर शान से ले जा रहे हो। ऐसा कहा जाता है कि कुत्ता एक ऐसा जानवर है जिसे स्पर्श नहीं करना चाहिए।”

ब्राह्मण गुस्से से कहता है – “अरे मुर्ख तू अँधा है क्या ? क्या तुझे मेरे पीठ पर लदा हुआ यह बकरा कुत्ता नजर आ रहा है। “

इसपर वह झलिया कहता है – “माफ़ कीजिये महाराज मुझे यह बकरा कुत्ता नजर आ रहा था।”

यह सुनकर ब्राह्मण आगे बढ़ जाता है। थोड़ी ही दूर जाने पर उसे दूसरा झलिया मिलता है और मित्रशर्मा से कहता है – “अरे मुर्ख तुम इस मरे हुए बझड़े को अपने कंधे पर लाद कर कहाँ ले जा रहे हो ?”

मित्रशर्मा को बहुत गुस्सा आ जाता है और गुस्से में वह कहता है- “अरे मुर्ख क्या तू भी अँधा है जो इस बकरे को मरा हुआ बाझड़ा बता रहा है।”

झलिया कहता है – “भगवान माफ़ कीजिये मैंने अज्ञानतावश ये कहा।” 

ब्राह्मण थोड़ा ओर आगे चलता है और उसे एक और झलिया मिलता है और कहता है- “अरे ब्राह्मण तुम ये क्या कर रहे हो गधे को अपने कंधे पर लाद कर ले जा रहे हो, यह तुम्हे शोभा नहीं देता।”

 ब्राह्मण को इतना गुस्सा आ जाता है कि वह उस बकरे को निचे फेंक देता है और अपने घर की तरफ भाग जाता है। तीनो झलिये उसे मिलकर मार कर खा जाते हैं।

 

शिक्षा 

नए नौकरों के काम से, अतिथियों के मीठी बातों से, स्त्रियों के झूठे रोने से और झलियों की कपटी बातों से संसार में कौन नहीं ठगा गया।   

 

3.6 सोने के हंस और राजा की कहानी (panchatantra short stories in hindi) 

Panchatantra Stories in Hindi
सोने के हंस और राजा की कहानी

एक नगर में चित्ररथ नाम का एक राजा रहता था उसके राज्य में एक ऐसा तालाब था। जिसमे सोने के हंस रहा करते थे और उसकी रखवाली वह अपने सिपाहियों से करवाता था। वह हंस छह महीने में एक बार अपने सोने के पंख तालाब में गिराया करते थे। जिससे राजा की आमदनी बढ़ती थी।

 एक दिन उसी तालाब में एक बहुत बड़ा सोने का पक्षी आ गया।  उसे सभी हंस कहने लगे – “अरे तुम्हे यहाँ नहीं आना चाहिए क्योंकि हमने यह तालाब अपने सोने के पंखो से खरीद लिया है।”

हंसो और बड़े पक्षी के बिच बात बढ़ जाती है और हंस उसे वहां से भगा देते हैं। 

बड़ा पक्षी राजा के पास जाकर कहता है -” हे राजा आपके तालाब में रहने वाले पक्षी ऐसा कह रहें हैं कि राजा हमारा क्या बिगाड़ लेगा। हम यहाँ किसी और पक्षी को बसने नहीं देंगे मैंने उन्हें कहा -“ऐसा मत कहो। मैं राजा से जाकर सब कह दूंगा।”

यह सुनकर राजा को गुस्सा आ जाता है और राजा अपने सिपाहियों को डण्डे लेकर उन्हें मारने के लिए भेज देता है।

हंस सिपाहियों के हाथो में डंडे लिए देख अपने मुख्य हंसों के साथ वहाँ से उड़ जाते हैं। 

 

शिक्षा 

जो अपने शरण में आये हुए प्राणियों पर कृपया नहीं करता उसकी सफलताएं सोने के हंसों की तरह उड़ जाती हैं। 

 3.7 कबूतर-कबूतरी और शिकारी की कहानी (panchatantra short stories in hindi with moral)

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कबूतर-कबूतरी और शिकारी की कहानी

एक बहुत घने जंगल में एक शिकारी रहता था जो चिड़िया आदि का शिकार करके अपना गुजरा करता था।  उसके सभी मित्र और रिश्तेदार उसे पापी समझ छोड़ कर चले गए थे। वह शिकार करने के लिए अपने पास एक जाल लाठी और पिंजरा रखता था। एक दिन वन में घूमते हुए उसे एक कबूतरी दिखी जिसने उसे मेहनत से पिंजरे में बंद कर दिया।  कबूतरी को बंद करने के बाद जंगल में बहुत तेज हवाएं अंधी चलने लगी।

 शिकारी बहुत डर गया और  ठण्ड के मारे कंपता हुआ एक पेड़ के निचे जा कर बैठ गया, जहाँ वह कबूतरी अपने कबूतर के साथ रहती थी। कबूतर बाहर निकल कर देखता है और शिकारी के हाथ में पिंजरा देखता है  जिसमे उसकी प्रेमिका कबूतरी होती है एक और उसे शिकारी पर गुस्सा आता है और वह यह सोचकर रोता भी है कि शिकारी ने प्रेमका को पकड़ लिया है और वो उसे अपना भोजन बना लेगा। तभी शिकारी ठण्ड के मारे कहता है- “अरे अगर यहाँ कोई जिव रहता है तो मेरी मदद करो।”

तभी पिंजरे में बंद कबूतरी पेड़ पर बैठे कबूतर से कहती है – “स्वामी इसकी रक्षा करो, घर हुए शत्रु को भी अपना अतिथि बनाना चाहिए। इसे अपना शत्रु न मानकर इसकी सेवा करो।”

कबूतर शिकारी के सामने आकर कहता है- “हे अतिथि बताईये मैं आपकी किस प्रकार सहायता कर सकता हूँ।”

शिकारी कहता है – “मुझे बहुत ठण्ड लग रही है इसलिए तुम मेरी सर्दी उतारने का कोई उपाय कर दो।”

यह सुनकर कबूतर लकड़ियां इकट्ठी करके आग जला देता है। शिकारी आग सेक कर अपनी ठण्ड उतार लेता है। कबूतर सोचता है “घर आये हुए अतिथि को घर से भूका नहीं भेजना चाहिए। पर मेरे पास तो खुद खाने के लिए एक दाना भी नहीं है तो मैं शिकारी को क्या खिलाऊं। कबूतर ने अपने प्राण दे कर उसे अपना मांस खिलाने का निश्चय किया।”

कबूतर जलती हुई आग में अपने घर की तरह घुस जाता है और अपने प्राण दे देता है। 

यह देखकर शिकारी सोचता है “मैं एक पापी हूँ। हमेशा पाप में पड़ा रहता हूँ और इसमें कोई शंका नहीं कि मुझे नरक ही मिलेगा।  शिकारी कबूतर का बलिदान देखकर पाप करने का काम छोड़ने और धर्म के रस्ते पर चलने का निश्चय कर लेता है और  पिंजरे में बंद कबूतरी को छोड़ देता है। कबूतरी अपने कबूतर के मरने का दुःख देख कर उसी आग में कूद कर अपनी जान दे देती है। 

शिकारी दुखी होता हुआ जंगल में आगे बढ़ जाता है। कुछ दिन बाद वह जंगल में लगी आग में अपने पापों के जीवन को नष्ट कर देता है क्योंकि उसने धर्म का पालन करते हुए अपने प्राण त्यागे इसलिए उसे स्वर्ग की प्राप्ति होती है। 

 

शिक्षा 

घर में आये हुए शत्रु का भी अतिथि के समान सत्कार करो, प्राण देकर भी उसकी तृप्ति करो।  

 

3.8 ब्राह्मण चोर और राक्षस की कहानी (panchatantra stories in hindi audio)

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ब्राह्मण चोर और राक्षस की कहानी image by www.indradhanush2020.blogspot.com
एक गांव में एक गरीब ब्राह्मण था।  वह गांव से भिक्षा मांग कर अपना गुजरा करता था। उसके पास सर्दी और गर्मी के लिए भी पर्याप्त कपडे नहीं थे। एक दिन जब वह भिक्षा मांगने के लिए गांव गया तो एक यजमान ने उसे बैलों की जोड़ी भिक्षा में दी। ब्राह्मण ने भी उसे उन्हें भिक्षा मांग-मांग कर घी और अन्य सामान से उन्हें बहुत तगड़े बना दिया। 
लेकिन ब्राह्मण के घर से गुजरते हुए एक चोर ने उन्हें देख कर सोचा- “इन बैलों को मैं आज रात चोरी करूँगा और इन्हे बेचकर बहुत धन कमाऊंगा।”
चोर रात में ब्राह्मण के घर को निकल पड़ता है लेकिन रस्ते में उसे एक लाल आँखों वाला, लम्बी नाक वाला, बड़े-बड़े दांतो वाला और सुखी हुयी चमड़ी वाला बहुत तगड़ा राक्षस दिखाई पड़ता है।
 चोर उससे डर जाता है वह भागने ही वाला होता है कि राक्षस उससे पूछता है – “अरे! तुम कहाँ जा रहे हो।” चोर डरता हुआ कहता है- “मैं ब्राह्मण के घर बैलों की चोरी करने के लिए जा रहा हूँ।” 
राक्षस कहता है -“तुम डरो मत हम एक ही काम करते है तुम बैल चुरा लेना और मैं ब्राह्मण को खा लूंगा इसलिए हम इकट्ठा चलते हैं।”
दोनों ब्राह्मण के घर पहुँच जाते हैं और राक्षश कहने लगता है -“पहले मुझे ब्राह्मण को खाने दो, अगर बैलों की चोरी  करते समय आवाज हुयी तो वह जाग जायेगा और मुझे भगा देगा।”
चोर कहता है – “नहीं पहले मुझे बैलों की चोरी करने दो अगर ब्राह्मण को खाते समय तुमसे कोई गलती हो गयी तो वह उठ जायेगा और हमें भगा देगा।”
दोनों में शत्रुओं की तरहं लड़ाई हो जाती है और शोर-शराबे से ब्राह्मण जाग जाता है। राक्षश को देख वह अपने देवता के मन्त्रों के उच्चारण लगता है, मंत्रो की शक्ति से राक्षस भाग जाता है और चोर को तो वह डंडे से ही डरा कर भगा देता है। 
 

शिक्षा 

आपस में लड़ते हुए शत्रु हितकारी होते हैं जैसे चोर और राक्षस ब्राह्मण के शत्रु थे अगर वो एक साथ काम करते तो शायद सफलता प्राप्त करते पर आपस में लड़कर उन दोनों के बिच से ब्राह्मण फायदा उठा गया। 

3.9 राजा के पुत्र के पेट में रहने वाले सांप की कहानी (panchtantra ki kahaniya in hindi online)

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राजा के पुत्र के पेट में रहने वाले सांप की कहानी (www.hindiguideindia.blogspot.com)
एक नगर में देवशक्ति नाम का राजा रहता था।   उसके पुत्र के पेट में किसी तरह सांप चला गया।  सांप राजा के पुत्र के पेट में ही अपना बिल बनाकर रहने लगा। उसके कारण उसका शरीर दिन प्रतिदिन कमजोर होता जा रहा था। बहुत  उपचार करने के बाद भी उसका स्वस्थ नहीं सुधर रहा था। यह देख राजपुत्र अपना राज्य छोड़ कर किसी दूसरे राज्य में चला गया और वहां के एक मंदिर में भिखारी की तरह रहने लगा।
उस राज्य के राजा की दो पुत्रियां थी। वे दोनों जब भी अपने पिता को प्रणाम करती तो प्रणाम कहते हुए पहली पुत्री कहती है – “महाराज! आपकी जय हो। आपकी  कृपया से इस राज्य में सुख हैं। 
दूसरी लड़की प्रणाम करते समय कहती है – “महाराज आपके कर्मो का फल भगवन आपको दे। 
दूसरी पुत्री का प्रणाम सुनकर राजा को गुस्सा आ जाता था। एक दिन राजा ने क्रोध में आकर मंत्री से कहा – “इस कटु वचन बोलने वाली लड़की को किसी गरीब परदेशी के साथ भेज दो।”
मंत्रियों ने उस लड़की का विवाह मदिंर में रहने वाले उसी राजपुत्र से करवा दिया जिसके पेट में सांप रहता था। वह लड़की अपने पतिधर्म के अनुसार राजपुत्र की बहुत सेवा करती थी। 
दोनों ने उस राज्य को छोड़ दिया थोड़ी ही दूर जाने पर वह आराम करने के लिए एक तालाब के किनारे ठहरे। वह लड़की राजपुत्र को तालाब के किनारे छोड़ कर खाने पिने का सामान लेने  लिए गयी।  जब वह वापिस लोटी तो उसने दूर से देखा कि  उसका पति एक बाम्बी  के पास सोया हुआ है और उसके मुहं से एक काला  सांप निकल कर बाम्बी से निकले सांप के साथ बाते कर रहा था। 
बाम्बी से निकला सांप कहता है- “अरे दुष्ट! तू क्यों इस सुन्दर राजकुमार के जीवन को बर्बाद कर रहे हो।” पेट वाला सांप कहता है – “तू भी तो इस बिल में स्वर्ण कलश को दूषित कर रहे हो। ” 
बाम्बी वाला सांप कहता है – “तू समझता है कि तुझे कोई राजकुमार के पेट में मार नहीं सकता ? कोई भी व्यक्ति उबली हुयी राई देकर तुझे मार सकता है।” 
पेट वाला सांप बोला – “तुझे भी तो तेरे बिल में गरम तेल डालकर मार सकता है।”
इस तरह बात चित करते हुए  वह एक दूसरे के भेद खोल देते हैं। वह लड़की उनकी सुनी हुयी बातों को जानकर उन्हें उसी प्रकार मार देती है। परिणामस्वरूप उसके पति का स्वास्थ्य भी ठीक हो जाता है और स्वर्ण कलश मिलने से वे धनवान भी बन जाते हैं। 
दोनों राजकुमार के देश चले जाते है और अपनी सारी कहानी बतातें हैं राजकुमार के माता पिता उनका स्वागत करते हैं। 
 

शिक्षा 

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि कभी भी अपने घर के भेद  किसी दूसरे को नहीं बताने चाहिए। भेद बताने से भारी हानि को झेलना पड़ सकता है। 

3.10 चुहिया और मुनि की कहानी (panchtantra ki kahaniyan)

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चुहिया और मुनि की कहानी (image by www.gajabdunia.com)

 गंगा नदी किनारे एक तपसियों का आश्रम था। यह एक बहुत ही तेजस्वी मुनि रहते थे।  वह मुनि एक नदी के किनारे जल लेकर आचमन कर रहे थे कि एक बाज़ के पंजे से छूट कर एक चुहिया उनके हाथों में जा गिरी। मुनिवर ने उस चुहिया को पीपल के पते पर रखा और गंगा में स्नान किया। मुनिवर ने देखा कि अभी चुहिया में अभी प्राण बाकि थे। मुनिवर ने सोचा कि मेरे पास कोई भी संतान नहीं है इसलिए मैं इसे अपनी शक्तियों से कन्या बनाकर इसे पालूंगा।

मुनिवर ने चुहिया को अपने तप से कन्या बना दिया  पत्नी से कहा -” प्रिय! इस कन्या को तुम अपनी संतान की तरह पालो।” मुनि की पत्नी ने उस  कन्या को अपनी संतान की तरह पाल कर विवाह के योग्य बना दिया और मुनिवर से कहने लगी – “स्वामी हमारी पुत्री अब विवाह के योग्य हो गयी है इसलिए इसका विवाह कीजिये।”

मुनिवर ने कहा -“मैं अभी सूर्य देव को बुलाकर अपनी पुत्री का विवाह उससे करा दूंगा। यदि मेरी पुत्री को  होगा तो वह उनसे विवाह कर लेगी। 

मुनि ने सूर्य देव को बुलाकर अपनी पुत्री से पूछा पुत्री क्या तुम्हे सरे जहान को रौशनी देने वाला सूर्य देव पसंद हैं ? कन्या ने कहा- “पिता जी यह तो आग जैसे गरम है जिनके साथ मैं अपनी जिंदगी नहीं गुजार सकती इसलिए इनसे अच्छा कोई वर बुलाइये।”

मुनि ने सूर्य से पूछा – “आप ही मुझे अपने अच्छा कोई वर बताईये।” सूर्य ने कहा – “मुझसे अच्छे मेघ हैं जो मुछे  ढककर प्राणियों को ठंडक महसुस करवाते हैं।”

मुनि ने मेघ को बुलाया और अपनी पुत्री को दिखाकर पूछा- “पुत्री क्या तुम्हे ये पसंद हैं ?” कन्या ने जवाब दिया -“पिता जी यह तो बहुत काले हैं इसलिए इनसे भी अच्छे कोई वर ढूंढिए।”

मुनि ने मेघ से पूछा – “आप ही बताईये कि मेरी पुत्री के लिए आपसे अच्छा वर कौन हो सकता है ?” मेघ ने जवाब दिया कि-“मुझसे अच्छे तो पवन हैं जो मुझे उड़ाकर हर दिशा में ले जाते हैं।”

मुनि ने पवन को बुलाया और अपनी पुत्री की स्वीकृति ली। कन्या ने कहा -“पिता जी यह तो बहुत चंचल हैं इसलिए मैं इनसे विवाह नहीं कर सकती।” मुनि ने पवन से पूछा कि- “आपसे अच्छा वर मेरी पुत्री के कौन हो सकता है ?” पवन ने जवाब दिया- “मुझसे अच्छे तो पर्वत है जो बड़े से बड़े तूफान और आंधी को भी रोक सकता है।” 

मुनि ने पर्वत को बुलाकर अपनी पुत्री से पूछा- “पुत्री क्या तुम्हे ये पसंद हैं ?” कन्या जवाब देती है- “पिता जी ये तो बहुत  बड़े शरीर वाले और बहुत कठोर हैं इसलिए इनसे भी अच्छा कोई वर ढूंढिए।”

मुनि ने पर्वत से पूछा – “आप ही बताएं कि मेरी पुत्री के लिए आपसे भी अच्छा वर कौन है ?” पर्वत ने कहा – “मुझसे अच्छा तो चूहा है जो मुझे भी तोड़कर अपना बिल बना लेता है।”

मुनिवर ने चूहे को बुलाया और अपनी पुत्री से पूछा- “क्या तुम्हे यह पसंद है ?” राजकन्या ने  चूहे को बड़ी ध्यान से देखा उसे देखते ही कन्या को उसमे अपनापन लगा और प्रथम दृष्टि में ही कन्या ने उसे पसंद कर लिया  और अपने पिता से बोली- “मुझे चुहिया बनाकर मूषक राज के साथ भेज दें।” 

मुनि ने अपने तपोबल से चुहिया बना दिया और उसका विवाह चूहे से कर दिया। 

 

शिक्षा 

इस कहानी से हमें  शिक्षा मिलती है कि अपनी जात वाले सभी को प्रिय होते हैं। हर एक व्यक्ति अपनी जात वाले व्यक्ति में अपनापन पाता है।

और पढ़ें मित्रसम्प्राप्ति पंचतंत्र की कहानियां

4. ळब्दप्रनाश की कहानियां

4.1 सांप और मेढकों की कहानी (panchtantra ki kahaniya in hindi)

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सांप और मेढकों की कहानी

एक बार एक कुएं में गंगदत्त नाम का एक मेंढक रहा करता था। वह उसी कुए में मौजूद अपने रिश्तेदारों से बहुत परेशान था। इसलिए वह एक दिन कुए से बाहर आ गया और सोचने लगा कि अपने रिश्तेदारों से अपने अपमान का बदला किस प्रकारलिया जाये। तभी उसे चलतेचलते एक सांप का बिल दीखता है।

मेंढक ने सोचा कि मैं इस बिल में रहने सांप को अपना मित्र बनाकर अपने रिश्तेदारों का नाश करवा दूंगा। यह सोचकर वह सांप के बिल के आगे खड़े होकर जोर जोर से कहने लगा- “मित्र मैं तेरे द्वार पर तेरा मित्र बनाने आया हूँ ” सांप ने यह सुन सोचा कि अवश्य ही मुझे फासने के लिए कोई मुझे आवाज लगा रहा है। डर के मारे सांप अंदर से ही कहता है -“मुझे विश्वास नहीं होता कि एक सांप और किसी दूसरे जिव की मित्रता भी हो सकती है।” 

यहाँ सुनकर गंगदत्त कहता है -“तुम्हारा कहना सही है तू मेरा दुश्मन जरूर है, परन्तु मैं अपने रिश्तेदारों से परेशान होकर तुम्हारा मित्र बनने आया हूँ ताकि तुम मेरे साथ रहकर मेरे रिश्तेदारों को खा कर खत्म कर दे। 

यह सुनकर सांप सोचता है कि इसमें मेरा ही फायदा है मैं  बिना मेहनत करके मेंढको को खाता रहूँगा। यह सोचकर सांप मेढक से पूछता है- “तू कहाँ रहता है ?” गंगदत्त कहता है- “मैं कुए में रहता हूँ तू भी उसी में रहना।” सांप कहता है -“तू तो ऊँची ऊँची झलांग लगा कर कुए में घुस जाता है पर मैं तो बिना पैरों का रेंगने वाला जिव हूँ, मैं कुए में कैसे घुसूंगा ?” मेढक कहता है -“तू इसकी चिंता मत कर मैं किसी तरह तुझे उसमे घुसा दूंगा और धीरे-धीरे तू सभी मेंढकों को खा लेना। 

मेंढक ने किसी तरह सांप को कुए में घुसाया और सांप धीरे-धीरे गंगदत्त के सभी रिश्तेदारों को खा गया। लेकिन सांप सभी मेंढक खाने के बाद गंगदत्त से कहता है- “मित्र मैंने तेरे सभी रिश्तेदारों को खा लिया है पर अब मैं कैसे अपना पेट भरूंगा।” मेंढक ने कहा -“मैं तुम्हारे लिए दूसरे मेंढकों का इंतजाम करता हूँ। गंगदत्त मेंढक किसी तरह मेढकों का इंतजाम करके सांप को खिला देता है अगले दिन सांप फिर गंगदत्त को कहता है- “अरे मित्र ये मेंढक भी समाप्त हो गए इसलिए तुम और मेंढको का इंतजाम करो।

 अगले दिन जब गंगदत्त को सांप के लिए भोजन नहीं मिला तो सांप ने उसके पुत्र को ही खा डाला। गंगदत्त सांप को अपना मित्र बनाकर बहुत पछताया और अपने पुत्र के मरने का शोक करने लगा। सांप ने कहा – “मित्र आज तो मेरी भूक मिट गई तू कल मेरे लिए दूसरे मेंढकों का इंतजाम करना।” मेंढक ने सोचा कि एक दिन ऐसा आएगा जब सारे मेंढक समाप्त हो जायेंगे और ये मुझे खा जायेगा। यह सोचकर मेढक ने सांप से छुटकारा पाने का एक उपाय सोचा और मेढकने सांप से कहा – “तू चिंता मत कर मैं अभी कुए से बाहर जाकर कल के लिए मेढकों का इंतजाम करके लाता हूँ।” यह कहकर मेंढक अपनी जान बचाकर वहां से चला जाता है और कभी भी उस कुए में वापिस नहीं आता। 

 

शिक्षा 

 

जो अपने से बलवान शत्रु को अपना मित्र बनाता है उसका अपना ही नुकसान होता है जैसे मेढक ने सांप को अपना मित्र बनाया और सांप उसके पुत्र को ही खा गया। 

4.2 शेर और गधे की कहानी (panchtantra ki kahani in hindi by vishnu sharma)

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शेर और गधे की कहानी (image by www.nriol.com)

 एक जंगल में करालकेसर नाम का एक शेर  रहता था। उसके साथ हमेशा उसका सेवक धूसरक नाम का सियार भी रहा करता था। एक बार शेर की लड़ाई एक हाथी से हो गयी जिसमे वह इतना जख्मी हो गया कि उससे चला भी नहीं जा रहा था। शेर और सियार का भूख के मारे बुरा हाल था। 

शेर ने अपनी जान की परवाह करते हुए सियार से कहा -“सुन सेवक तू किसी ऐसे जिव को मेरे पास लेकर आ जिसे मैं आसनी से मार सकूँ और मुझे ज्यादा मेहनत न करनी पड़े। ”  शेर का आदेश सुनकर सियार किसी ऐसे जानवर को ढूंढने के लिए जंगल से होता हुआ एक गांव में पहुंचा। गांव में पहुंचकर उसे एक गधा दिखाई दिया। जो बहुत उदास सा नजर आ रहा था। सियार ने उससे जाकर पूछा – “अरे भाई तुम बड़े दिन बाद दिखाई दिए हो ।”

इसपर गधा कहता है -“अरे भाई एक धोबी मेरे ऊपर बोझा ढोता  है और खाने के लिए कुछ भी नहीं देता।” इसपर सियार कहता है-“भाई तुम चिंता मत करो मैं तुम्हारी बिरादरी की तीन दूसरी कन्याएँ को जंगल में हरी-हरी पन्ना जैसी घास के मैदान में ले गया। जहाँ वह बोझा ढोने से बच गई और आज अपना जीवन  आराम से जी रहीं है। उनमे से एक विवाह योग्य हो गई है मैं उसका विवाह तुम्हारे साथ करवा दूंगा जिससे तुम बिना बोझा ढोये अपना जीवन आराम से व्यतीत कर सकते हो।”

यह सुनकर गधा सियार के साथ जाने को तैयार हो गया। दोनों जंगल में बातें करते हुए चलते हैं तभी वह शेर के पास पहुँच जाते है। जख्मी शेर गधे को देख उसपर झपटा मारने की कोशिश करता है पर भाग्यवश गधा बच निकलता है और गधे को भागते वक्त शेर का पंजा लग जाता है। 

सियार शेर को कहता है -“तुम कैसे शेर हो जो खुद चलकर आए हुए जानकर को भी अपना शिकार नहीं बना पाए।” यह सुनकर शेर शर्मीली से मुस्कान के साथ कहता है -“अरे मैं तैयार नहीं था इसलिए वह बचकर चला गया।” सियार कहता है- “अच्छा ठीक है मैं एक बार ओर प्रयास करके उसे तुम्हारे पास लाता हूँ।” शेर ने कहा -” वह तुम्हारे साथ नहीं आएगा क्योंकि वह डर गया है।”

इसपर सियार कहता है -“तुम उसकी चिंता मत करो।” यह कहकर सियार फिर से गधे के पास चला जाता है और उसे गधा वहीँ पर घास चरता हुआ दिखाई देता है। गधा सियार को देखकर कहता है -“अरे भाई तुम मुझे अच्छी जगह ले गए।  अगर मैं वहां से नहीं भागता तो जीवन समाप्त हो जाता। पता नहीं वो कौन सा जीव था जिसका इतना भारी पंजा मेरी पीठ पर पड़ा। “

सियार जवाब देता है – “अरे भाई वह वही कन्या थी जो उत्साह से तुम्हे मिलने के लिए उठी और तुम्हे भागता देख अपने पंजे से रोकने के कोशिश की। वह कन्या बहुत दुखी है क्योंकि तुम वहां से भाग आये हो इसलिए तुम मेरे साथ चलो। अगर तुम मेरे  साथ नहीं गए तो वह अपने प्राण त्याग देगी इसलिए तुम  मेरे साथ चलो।”

सियार की बात सुनकर वह गधा उसके साथ दोबारा जंगल की और चल दिया और गधे को इस बार शेर ने नहीं छोड़ा वह मारा गया।  शेर गधे को मार कर स्नान करने के लिए चला गया। पीछे से सियार ने गधे का दिल और कान खा डाला। शेर वापिस आकर देखता है कि गधे के शरीर में कान और दिल नहीं है। यह देख शेर कहता है- “दुष्ट तूने मेरे भोजन को जूठा कर दिया।”

 इसपर सियार कहता है – “स्वामी नहीं मैंने आपका भोजन जूठा नहीं किया। बल्कि इसमें कान और दिल नहीं था तभी तो यह जाकर दोबारा वापिस आ गया। 

यह सुनकर शेर को सियार बात पर यकीं हो गया और दोनों ने भोजन का आनद लिया। 

 

शिक्षा 

 

यह जानते हुए भी कि काम का बुरा परिणाम होगा, कोई उसे करता है तो वह मनुष्य गधा ही होता है।  

4.3 कुम्हार और राजा की कहानी (panchatantra hindi kahaniya)

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कुम्हार और राजा की कहानी (image by panchatantra.org)

किसी नगर में एक बार कुम्हार रहा करता था। एक बार वह नशे में ठोकर खाकर टूटे हुए धारधार घड़े के ऊपर जा गिरा। जिससे टूटे हुए खड़े की कोर उसके माथे में जा घुसी और वह लहूलुहान हो गया बड़ी मुश्किल से उठकर किसी तरह अपनी मलहम पट्टी करवाई। लेकिन किसी कारन से उसका वह जख्म बिगड़ गया और फ़ैल गया। भाग्य वश बहुत दिन बाद उसका जख्म तो ठीक हो गया लेकिन उसका निशान उसके माथे पर रह गया। 

एक समय उस राज्य में काल पड रहा था वह भूखा प्यासा व्याकुल होकर बहुत से राज सेवकों के साथ दुसरे राज्य में जाकर किसी राजा का सेवक बन गया। उस राजा ने उस कुम्हार के माथे पर घाव देखा और सोचा- “शायद यह कोई शूरवीर आदमी होगा, किसी युद्ध में लड़ते हुए उसके माथे पर यह निशान पड़ गया होगा।” इसके बाद राजा उसकी राजपूतों से भी ज्यादा इज्जत करने लगा। सभी राजपूत भी उससे जलने लगे परन्तु राजा के डर से उससे कुछ कहते नहीं थे। 

एक दिन जब युद्ध का मौका आया तब राजा सभी शूरवीरों का सम्मान करने लगा, लड़ाई के घोड़े त्यार होने लगे, रथ तैयार होने लगे, हाथियों को तैयार किया जाने लगा। तब बड़ा पद दिए हुए कुम्हार को राजा ने अलग बुलाया और पूछा – “हे राजपूत क्या तुम्हारे माथे पर यह घाव हथियारों से लगा है ?” 

कुम्हार कहता है -“महाराज! यह किसी हथियार का घाव नहीं बल्कि मैं शराब पीकर अपने घर में रखे हुए टूटे घड़े पर गिर पड़ा जिससे नुकीला घड़े का टुकड़ा मेरे सर में घुस गया। जिससे यह निशान पड़ गया।” यह सुनकर राजा ने कहा – “मुर्ख कुम्हार तूने मेरे साथ छल किया है इसलिए तू यहाँ से चला जा। इसपर कुम्हार कहता है – “महाराज ऐसा मत कीजिये आप युद्ध में मेरा सहस देखना।” राजा कहता है – “भले ही तुझमे युद्ध के सभी गुण हैं परन्तु तू फिर भी कुम्हार ही है।” यह कहकर राजा ने उसे अपने राज्य से निकल दिया। 

 

शिक्षा 

इस कहानी से यह शिक्षा मिलती है कि अपने स्वार्थ के लिए कभी-कभी झूठ का सहारा भी लेना चाहिए।  

 4.4 ब्राह्मण  पति पत्नी  की कहानी (panchtantra ki kahaniyan hindi mein)

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ब्राह्मण  पति

एक बार एक नगर में ब्राह्मण  पति पत्नी रहते थे। ब्राह्मण अपनी पत्नी से बहुत अधिक प्रेम करता था।  ब्राह्मणी भी अपने पति के परिवार से लड़ने झगड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ती थी। एक दिन तंग होकर ब्राह्मण ने अपनी पत्नी को लेकर अपना परिवार छोड़ दूसरे राज्य जाने की सलाह बनाई। वह दूसरे राज्य जाने के लिए निकल पड़े। रस्ते में उसकी पत्नी को प्यास लगती है और वह कहती है – “प्रिय मुझे प्यास सता रही है कृपया पानी का इंतजाम कर दो।”  ब्राह्मण अपनी पत्नी को एक पेड़ के निचे बिठा कर पानी की तलाश में चला जाता है। 

वह पानी ढूंढ कर ले आता है लेकिन जब अपनी पत्नी को देखता है तो बहुत आश्चर्य चकित हो जाता है क्योंकि वह मर जाती है। ब्राह्मण उससे बहुत प्यार करता था इसलिए जोर-जोर से रोने लगा। तभी आसमान  से एक भविष्यवाणी होती है “ब्राह्मण अगर तू अपने प्राणो का आधा भाग अपनी पत्नी को दे देगा तो वह जीवित हो जायेगा ब्राह्मण ने कहा -“ठीक है अपने प्राणो का आधा भाग मैं अपनी पत्नी को दे दूंगा।” यह कहते ही उसकी पत्नी जीवित हो उठती है और वो खुसी-खुसी आगे बढ़ जाते हैं। आगे चलकर वह एक बगीचे में पहुँचते है -“और ब्राह्मण कहता है -“प्रिय मैं तुम्हारे लिए भोजन का इंतजाम करने के लिए जा रहा हूँ इसलिए तुम यहीं रुको।” यह कहकर ब्राह्मण खाना लाने के लिए चला जाता है। 

तभी ब्राह्मणी को एक लंगड़ा मगर बहुत ही सूंदर व्यक्ति नजर आता है। ब्राह्मणी पहली ही नजर में उसे पसंद करने लग जाती है और उससे कहती है – “प्रिय मैं तुम्हारे साथ जिंदगी बिताना चाहती हूँ।” इसपर वह लंगड़ा व्यक्ति कहता है -“हे ब्राह्मणी तुम मेरे साथ रहकर क्या करोगी मैं तो ठीक से चल भी नहीं पाता इसलिए तुम अपना विचार बदल लो।” बहुत समझाने पर भी वह ब्राह्मणी उसी लंगड़े के साथ जीवन बिताने का फैसला  करती है। 

इतने में ब्राह्मण खाना लेकर आ जाता है और अपनी पत्नी के साथ बैठकर खाने लगता है। उसी समय ब्राह्मणी कहती है -“पतिदेव इस पंगु को देखो जब आप घर से बाजार करेंगे  तब मेरा मन नहीं लगा करेगा इसलिए आप इसे अपने साथ ले चलिए।

ब्राह्मण कहता हैं – ” हे प्रिय! मेरी तो अपने को पालने की औकात नहीं है फिर मैं इसे कैसे पालूंगा।” लेकिन ब्राह्मणी के  बहुत मनाने पर ब्राह्मण उसे अपने साथ ले जाने को तैयार हो जाता है। जब ब्राह्मण कुए पर बैठा होता है तो वह ब्राह्मणी उसे मुक्का मारकर अंदर गिरा देती है और लंगड़े व्यक्ति के चल न पाने से वह उसे पेटी में डालकर सिर पर रखकर राज्य की तरफ चल देती है। 

आगे राज्य में चोरों के बचाव से राजा ने पहरा लगाया होता है। पहरेदार उसे देख उस राज्य का न जान राजा के पास पेश करते हैं। राजा उसकी पेटी खुलवाकर देखता है तो उसमे से लंगड़ा व्यक्ति निकलता है। राजा पूछता है -“यह क्या है ?”

ब्राह्मणी बोलती है- “यह मेरे पति हैं यह चल नहीं सकते इसलिए  इन्हे पेटी में डालकर यहाँ लाई हूँ।” यह सुनकर राजा उसे जाने देता है। लेकिन ब्राह्मण को कोई भला व्यक्ति कुए से निकाल  देता है और उसकी जान बच जाती है।

 ब्राह्मण राजा के पास जाकर कहता है -“महाराज ये झूठ बोल रही है ये मेरी पत्नी है।” ब्राह्मणी कहती है -“महाराज मैं इसे अपना पति नहीं मानती।” यह सुनकर ब्राह्मण राजा से कहता है-“महाराज इसके पास  मेरी एक चीज है जिसके सभी देवता शाक्षी हैं, उसे इससे दिला दीजिये  मैं यहाँ से चला जाऊंगा।” ब्राह्मणी ने डर के मारे कहा – “हाँ मैं तुम्हारी वह चीज दे दूंगी बस इतना कहते ही ब्राह्मणी मर जाती है।” राजा आश्चर्यचकित होकर कहता है -“यह क्या?” इसके बाद ब्राह्मण ने राजा को सारी  बात बताई।

 

शिक्षा 

बहुत अधिक सूंदर स्त्री का विश्वाश न करें 

4.5 गधे और धोबी की कहानी (panchtantra ki kahaniyan in hindi)

Panchatantra Stories in Hindi
गधे और धोबी की कहानी

एक  नगर में शुद्धपट नाम का एक धोबी रहा करता था। उसके पास एक गधा भी था जिसके ऊपर वह बोझा ढोता था। लेकिन उसे चारा न मिल पाने के कारण से गधा बहुत कमजोर और दुबला हो गया। उससे अब बोझ भी नहीं ढोया जाता। धोभी को एक दिन जंगल में जाते हुए मरा हुआ शेर मिला था जिसकी खाल उसने उतार कर अपने पास रख ली। 

धोबी ने सोचा कि शेर की खाल मैं अपने गधे को पहना कर रात में खेतों में छोड़ दूंगा और पहरेदार इसे शेर समझकर डर के मारे कुछ नहीं कहेंगे। धोभी की यह चाल चल गई। धोभी गधे को शेर की खाल पहनता और खेतों में छोड़ देता। गधा घास चर-चर के बहुत तगड़ा हो गया पर गांव के लोग उससे बहुत परेशां थे कि गधे ने उनकी सारी फसलें बरबाद कर दी। 

एक दिन जब धोबी ने उसे खेतों में शेर की खाल पहनाकर छोड़ दिया। जब गधा खेतों में घास चर रहा था तब पास ही के गांव से गधे की आवाजें आयी। गधा अपने आप को रोक न पाया और गधे ने जोर से आवाज निकली। पहरेदार समझ चुके थे कि यह शेर की खाल पहने गधा है। पहरेदारों ने गधे को इतना मारा कि वह बिचारा मर ही गया। 

 

शिक्षा 

 

जो भी अपने अच्छे खास काम के चलते फालतू की बात करता करता है वह शेर की खाल पहने और भयंकर नजर आते गधे की तरह मारा जाता है। 

4.6 स्त्री, ठग और सियारन की कहानी (panchtantra ki kahani in hindi)

Panchatantra Stories in Hindi
स्त्री, ठग और सियारन

एक गांव में किसान पति पत्नी रहा करते थे। किसान बहुत वृद्ध हो गया था पर उसकी पत्नी अभी जवान थी। पति के वृद्ध होने के कारन उसकी पत्नी का चरित्र दूषित हो गया। पूरा गांव उसके खराब चरित्र के बारे में जानता था। लेकिन उनके पास धन की कमी नहीं थी। यह जान एक ठग ने उस स्त्री से आकर कहा -“प्रिय तुम्हारा पति बहुत वृद्ध हो गया है इसलिए तुम मेरे साथ विवाह करके दूसरे राज्य में आराम से रहना और अपने साथ धन भी ले आना।”

ठग के मन में उसका धन लुटने की इच्छा थी। स्त्री ने उसकी बात मान ली। अगले ही दिन वह अपना धन लेकर उसके बताये स्थान पर पहुंची और उसके साथ दूसरे राज्य की और रुख करने लगी। रास्ते में जाते समय एक बहुत लम्बी चौड़ी नदी आयी। नदी देख ठग ने सोचा कि मेरे पास यह अच्छा मौका है। यह सोचकर वह स्त्री से कहने लगा- “प्रिय! तुम धन की पोटली मुझे दे दो मैं पहले यह पोटली नदी पार रखकर आता हूँ बाद में तुम्हे लेता चलूँगा इसलिए तुम यहीं मेरा इंतजार करो। ठग नदी पार करके सारा धन अपने साथ ले गया। वह इस्त्री उसका इंतजार करने लगी। लेकिन जब बहुत देर हो गई तब उस स्त्री को विश्वाश हो गया कि वह ठग मेरा धन लेकर चला गया और मैं ठगी गयी। 

तभी वह स्त्री एक सियारन को आते देखती है जिसके मुंह में मांस का टुकड़ा होता है। सियारन को नदी किनारे एक मछली दिखती है। सियारन उत्सुकता वश उस मछली को पकड़ने के चक्कर में मांस का टुकड़ा मुँह से गिरा देती है और मछली पकड़ने के लिए उस ओर भागती है। मछली सियारन को देख गहरे पानी में चली जाती है। इतने में एक गिद्ध आकर वह मांस का टुकड़ा उठा कर ले जाता है। सियारन दोनों ओर से खाली रह जाती है। 

वह स्त्री उसे देख हंसकर कहती है मेरी हालत तो इस सियारन जैसी हो गई है मैं न इधर की रही न उधर की। 

 

शिक्षा 

अपनों को छोड़ जो स्त्रियां दूसरों के पास जाती हैं वह परायों से भी ठगी जाती हैं।  

4.7 घंटे और ऊंट की कहानी (panchatantra hindi story)

Panchatantra Stories in Hindi
घंटे और ऊंट की कहानी

एक गांव में उज्ज्वलक नाम का एक बढाई (लकड़ी का काम करने वाला) रहता था। वह अपनी गरीबी से बहुत परेशान था इसलिए वह किसी दूसरे देश जाकर धन कमाना चाहता था। ऐसा ही हुआ वह दूसरे देश जाने के लिए एक जगले से जा रहा था। वह देखता है कि एक ऊंटनी अपने झुण्ड से अलग होकर और अपने प्रसव से पीड़ित होकर बच्चे को जन्म दे रहे थी। बच्चे को जन्म देने के बाद वह उस ऊंटनी और उसके बच्चे को लेकर अपने घर वापिस लोट जाता है। घर लौटकर वह उस ऊंटनी को खूंटे से बांध कर जंगल में पत्ते लेने के लिए चला जाता है और कोमल-कोमल पत्ते ऊंटनी के लिए लाता है। ऊंटनी पत्तों को खाकर अपनी पीड़ा से मुक्त हो जाती है। 

बढ़ई हर रोज ऐसा ही करता जिससे ऊंटनी बहुत तगड़ी हो गई और उसका बच्चा भी बहुत तगड़ा हो गया। ऊंट का बच्चा कहीं खो न जाये इसलिए बढ़ई ने उसके गले में एक घंटा बांध दिया।जब भी वह रास्ता भटक जाता तो बढ़ई घंटे की आवाज सुनकर उसे वापिस ले आता। बढ़ई ऊंटनी के दूध से अपना और अपने बच्चों का गुजारा करता था और कुछ दूध बेच देता। एक दिन उसने सोचा कि मुझे अपने कार्य में तरक्की करनी चाहिए और एक ऊंटनी को ओर खरीदना चाहिए। यह सोचकर वह अपनी पत्नी से कहता है -“प्रिय इस काम में बहुत फायदा है इसलिए अगर मैं एक ओर ऊंटनी को खरीद कर लाऊँ तो हमारा कारोबार बढ़ जायेगा।” 

यह कहकर वह एक ओर  ऊंटनी को खरीदने के गुजरात देश चला जाता है और दूसरी ऊंटनी को खरीद कर लाता है। इस तरह उसके पास बहुत से ऊंटों का झुण्ड हो गया और वह दूध बेच-बेच का बहुत धनवान हो गया। बढ़ई ने ऊंटो के झुण्ड को जंगल में चराने के लिए एक मजदुर को रख लिया वह हर साल उसे एक ऊंट का बच्चा और हर रोज दूध पिने के लिए तनख्वाह के तौर पर देता था। 

ऊंटनी का वह बच्चा जिसके गले में बढ़ई  ने घंटा लटका दिया था, वह अपने आप को उनसे अलग समझता और अपने आप सबसे समझदार समझ झुण्ड से अलग घास चरता। देर से वापिस आता। एक दिन ऊंटों के झुण्ड ने उसे कहा -“अरे!  झुंड से अलग होकर घास चरना बहुत खतरनाक हो सकता है इसलिए झुण्ड के साथ ही घास चरा करो।”

उस घंटे वाले ऊंट ने उनकी बात नहीं मानी। एक दिन शेर ने उस घंटे की आवाज सुनी और देखा कि किसी ऊँट के गले में घण्टा डला हुआ है। एक दिन वह ऊंट का बच्चा अपने आप को विशेष दिखाने के लिए सबसे अलग घास चरता है और रास्ता भटक जाता है। बहुत कोशिश करने के बाद भी उसे रास्ता नहीं मिलता। यह देख शेर उसे झपट लेता है और वह मारा जाता है। 

 

शिक्षा 

अच्छे व्यक्तियों की सलाह को न मानकर और दूसरे व्यक्तिओं से विशेष बनने की कोशिश करने वाला मारा जाता है। 

 

और पढ़ें ळब्दप्रनाश पंचतंत्र की कहानियां

 

5 अपरीक्षितकारक की कहानियां (Panchatantra Stories in Hindi)

 

5.1 ब्राह्मण और नेवले की कहानी (पंचतंत्र की कहानियां हिंदी में)

Panchatantra Stories in Hindi
ब्राह्मण और नेवले की कहानी
एक बार एक ब्राह्मण के घर उसके पुत्र के जन्म होने के साथ-साथ एक नकुली ने भी नेवले को जन्म दिया। ब्राह्मणी और ब्राह्मण ने नेवले को अपने पुत्र के साथ साथ ही पाला। नेवला भी ब्राह्मण के पुत्र को बहुत प्रेम करता था और वो दोनों आपस में खेलते रहते थे। किन्तु ब्राह्मण की पत्नी के मन में यह शंका बनी रहती थी कि  कभी वह नेवला अपने जानवर रूप के कारन उसे काट न खाये। 
एक दिन वह ब्राह्मणी अपने पति को अपने बच्चे के पास तालाब पर पानी भरने के लिए यह सोच कर गई कि कहीं नेवला उसके बच्चे को काट न खाये। जब वह पानी भरने के लिए तालाब पर चली गयी तो ब्राह्मण यह सोच कर भिक्षा मांगने के लिए चला गया कि नेवला और उसका पुत्र जन्म से ही साथ साथ हैं और एक दूसरे को अपना भाई समझते हैं। 
दुर्भग्य वश ब्राह्मण के जाने के बाद एक काला जहरीला भयानक सांप निचे लेटे हुए उसके पुत्र की और बढ़ने लगा। नेवले ने उस बालक को अपना भाई मान सांप के साथ लड़ाई की और उसके टुकड़े-टुकड़े कर डाले। नेवले के मुंह पर खून लग गया और वह यह सोचकर, तालाब कि ओर गई ब्राह्मणी की ओर बढ़ा, कि वह उसकी प्रसंसा करगी। 
रस्ते से ब्राह्मणी पानी लेकर आ रही थी कि नेवले को खून में लथ-पथ देख उसके मन में वही विचार आया कि कहीं नेवले ने उसके पुत्र को खा न लिया हो। ब्राह्मणी ने यह सोच कर पानी से भरा मटका नेवले के सर पर दे मारा। जिसकी चोट नेवला पल भर भी सहन न कर पाया और वो तुरंत मर गया। 
ब्राह्मणी भागती हुई अपने घर पहुंची और अपने बच्चे को सही सलामत पाया और पास में ही सांप के टुकड़े-टुकड़े पाए। तब ब्राह्मणी को नेवले की वीरता का ज्ञान हुआ। 
ब्राह्मणी बहुत पछताई और बहुत भावुक हो गई थोड़ी ही देर में उसका पति भी वहां आ गया। अपनी पत्नी को दुखी देख वह भी दुखी हो गया परन्तु अपने बच्चे को सही सलामत देख वे खुश भी थे। 
 

शिक्षा 

बिना सोचे समझे कोई कार्य नहीं करना चाहिए। जो भी बिना सोचे समझे कार्य करता है तो उसे ब्राह्मणी जैसे दुःख का सामान करना पड़ सकता है।

 

5.2 मूर्ख वैज्ञानिकों की कहानी (panchatantra stories in hindi short)

 

Panchatantra Stories in Hindi
मूर्ख वैज्ञानिकों की कहानी 

एक नगर में चार मित्र रहते थे। उनमें से तीन बड़े वैज्ञानिक थे, किन्तु बुद्धि रहित थे; चौथा वैज्ञानिक नहीं था, किन्तु बुद्धिमान् था। चारों ने सोचा कि विद्या का लाभ तभी हो सकता है, यदि वे विदेशों में जाकर धन-संग्रह करें। इसी विचार से वे विदेश-यात्रा को चल पड़े। कुछ दूर जाकर उनमें से सबसे बड़े ने कहा – “हम चारों विद्वानों में एक विद्याशून्य है, वह केवल बुद्धिमान् है। धनोपार्जन के लिए और धनिकों की प्रसन्नता प्राप्त करने के लिए विद्या आवश्यक है। विद्या के चमत्कार से ही हम उन्हें प्रभावित कर सकते हैं। अत: हम अपने धन का कोई भी भाग इस विद्याहीन को नहीं देंगे। वह चाहे तो घर वापस चला जाए।”

दूसरे ने इस बात का समर्थन किया। किन्तु तीसरे ने कहा- “यह बात उचित नहीं है। बचपन से ही हम एक-दूसरे के सुख-दु:ख के समभागी रहे हैं। हम जो भी धन कमाएँगे, उसमें इसका हिस्सा रहेगा। अपने-पराए की गणना छोटे दिलवालों का काम है। उदार चरित्र व्यक्तियों के लिए सारा संसार ही अपना कुटुम्ब होता है। हमें उदारता दिखलानी चाहिए।”

उसकी बात मानकर चारों आगे चल पड़े। दूर जाकर उन्हें जंगल में एक शेर का मृत शरीर मिला। उसके अंगप्रत्यंग बिखरे हुए थे। तीनों विद्याभिमानी युवकों ने कहाजाओ, हम अपनी विज्ञान की शिक्षा की परीक्षा करें। विज्ञान के प्रभाव से हम इस मृत शरीर में नया जीवन डाल सकते हैं।

यह कहकर तीनों उसकी हड्डियाँ बटोरने और बिखरे हुए अंगों को मिलाने में लग गए। एक ने अस्थिसंजय किया, दूसरे ने चर्म, माँस, रुधिर संयुक्त किया, तीसरे ने प्राणों के संचार की प्रक्रिया शुरू की। इतने में विज्ञानशिक्षा से रहित, किन्तु बुद्धिमान् मित्र ने उन्हें सावधान करते हुए कहा- “ज़रा ठहरो। तुम लोग अपनी विद्या के प्रभाव से शेर को जीवित कर रहे हो। वह जीवित होते ही तुम्हें मारकर खा जाएगा।”

वैज्ञानिक मित्रों ने उसकी बात को अनसुना करदिया। तब वह बुद्धिमान् बोला- “यदि तुम्हें अपनी विद्या का चमत्कार दिखलाना ही है, तो दिखलाओ। लेकिन एक क्षण ठहर जाओ, मैं वृक्ष पर चढ़ जाऊँ।” यह कहकर वह वृक्ष पर चढ़ गया।

इतने में तीनों वैज्ञानिकों ने शेर को जीवित कर दिया। जीवित होते ही शेर ने तीनों पर हमला कर दिया। तीनों मारे गए।

 

शिक्षा 

शास्त्रों में कुशल होना ही पर्याप्त नहीं है। लोक-व्यवहार को समझने और लोकाचार के अनुकूल काम करने की बुद्धि भी होनी चाहिए, अन्यथा लोकाचारहीन विद्वान भी मूर्ख पण्डितों की तरह उपहास के पात्र बनते हैं

 

5.3 चार मूर्ख ब्राह्मणों की कहानी (panchatantra short stories in hindi with moral)

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चार मूर्ख ब्राह्मणो की कहानी  (image by childmoralstories.blogspot.com)

 

एक स्थान पर चार ब्राह्मण रहते थे। चारों विद्याभ्यास के लिए कान्यकुब्ज गए। निरन्तर बारह वर्ष तक विद्या पढ़ने के बाद वे सम्पूर्ण शास्त्रों के पारंगत विद्वान हो गए। किन्तू व्यवहार बुद्धि से चारों खाली थे। विद्याभ्यास के बाद चारों स्वदेश के लिए लौट पड़े। कुछ दूर चलने के बाद रास्ता दो तरफ था ।-किस मार्ग से जाना चाहिए-इसका कोई भी निश्चय न करने पर वहीं बैठ गए। इसी समय वहाँ से एक मृत वैश्य बालक की अर्थी निकली। अर्थी के साथ बहुत से महाजन भी थे। ‘महाजन’ नाम से उनमें से एक को कुछ याद आ गया। उसने पुस्तक के पन्ने पलटकर देखा तो लिखा था : महाजनो येन गत:स पन्थाः, अर्थात् जिस मार्ग से महाजन जाए,वही मार्ग है। पुस्तक लिखे को ब्रह्म-वाक्य मानने वाले चारों पण्डित महाजनों के पीछे श्मशान की ओर चल पड़े।

थोड़ी दूर पर श्मशान में उन्होंने एक गधे को खड़ा देखा। गधे को देखते उन्हें शास्त्र की यह बात याद आ गई: राजद्वारे श्मशाने च यस्तिष्ठति स बान्धवः, अर्थात् राजद्वार और श्मशान में जो खड़ा हा, वह भाई होता है। फिर क्या था, चारों ने उस श्मशान में खड़े गधे को भाई बना लिया। कोई उसके गले से लिपट गया, तो कोई उसके पैर धोने लगा।

इतने में एक ऊँट उधर से गुजरा । उसे देखकर सब विचार में पड़ गए। यह कौन है। बारह वर्ष तक विद्यालय की चारदीवारी में रहते हुए उन्हें पुस्तक के अतिरिक्त संसार की किसी वस्तु का ज्ञान नहीं था। ऊँट को वेग से भागे हुए देखकर उनमें से एक को पुस्तक में लिखा यह वाक्य याद आ गया :धर्मस्य त्वरिता गति:अर्थात् धर्म की गति में बड़ा वेग होता है उन्हें निश्चय गया कि वेग से जानेवाली यह वस्तु अवश्य धर्म है। उसी समय उनमें से एक याद आया : इष्टं धर्मेण योजयेत्, अर्थात् धर्म का संयोग इष्ट से करा दे। 

उनकी समझ में इष्ट बान्धव था और ऊँट था धर्म; दोनों का संयोग कराना उन्होंने शास्त्रोक्त मान लिया। बस खींचखाँचकर उन्होंने ऊँट के गले में गधा गाँध दिया। वह गधा एक धोबी का था। उसे पता लगा तो वह भाग आया। उसे अपनी ओर आता देखकर चारों शास्त्रपारंगत पण्डित वहाँ से भाग खड़े हुए।

थोड़ी दूर पर एक नदी थी। नदी में पलाश का एक पत्ता तैरता हुआ आ रहा था। इसे देखते ही उनमें से एक को याद आ गया : आगमिष्यति यत्पत्रं तदस्मांस्तारयिष्यति, अर्थात् जो पत्ता तैरता हुआ आएगा वही हमारा उद्धार करेगा। उद्धार की इच्छा से वह मूर्ख पण्डित पत्ते पर लेट गया। पत्ता पानी में डूब गया तो वह भी डूबने लगा।

केवल उसकी शिखा पानी से बाहर रह गई। इसी तरह बहते-बहते जब वह दूसरे मूर्ख पण्डित के पास पहुंचा तो उसे एक और शास्त्रोक्त वाक्य याद आ गया : सर्वनाशे समुत्पन्ने अर्ध त्यजति पण्डित:, अर्थात् सम्पूर्ण का नाश होते देखकर आधे को बचा ले और आधे का त्याग कर दे ।- यह याद आते ही उसने बहते हुए पूरे आदमी का आधा भाग बचाने के लिए उसकी शिखा पकड़कर गरदन काट दी। उसके हाथ में केवल सिर का हिस्सा आ गया। देह पानी में बह गई।

उन चार के अब तीन रह गए। गाँव पहुँचने पर तीनों को अलग-अलग घरों में ठहराया गया। वहाँ उन्हें जब भोजन दिया गया तो एक ने सेमियों को यह कहकर छोड़ दिया। : दीर्घसूत्री विनश्यति, अर्थात दीर्घ तन्तुवली वस्तु नष्ट हो जाती है। दूसरे को रोटियाँ दी गईं तो उसे याद आ गया :अतिविस्तार-विस्तीर्ण तद्भवेन्न चिरायुषम्, अर्थात् बहुत फैली हुई वस्तु आयु को घटाती है-तीसरे को छिद्रवाली वाटिका दी गई तो उसे याद आ गया : छिद्रेष्वना बहुली भवन्ति, अर्थात छिद्रवाली वस्तु में बहुत अनर्थ होते हैं। परिणाम यह हुआ कि तीनों की जगहँसाई हुई और तीनों भूखे भी रहे।

 

शिक्षा

 

ज्ञान तो हर कोई ग्रहण कर लेता है परन्तु उसे सही समय पर कैसे प्रयोग करना है जो यह जानता है वही सच्चा ज्ञानी होता है।

 

5.4 मेंढक और मछलियों की कहानी (panchatantra short stories in hindi with moral)

 

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मेंढक और मछलियों की कहानी (image by panchatantra.org)

एक तालाब में दो मछलियाँ रहती थीं। एक थी शतबुद्धि (सौ बुद्धियोंवाली) दूसरी थी सहस्रबुद्धि (हजार बुद्धिवाली)। उस तालाब में एक मेढक भी रहता था । उसका नाम था एकबुद्धि। उसके पास एक ही बुद्धि थी। इसलिए उसे बुद्धि पर अभिमान नहीं था। शतबुद्धि और सहस्रबुद्धि को अपनी चतुराई पर बड़ा अभिमान था।

एक दिन संध्या समय तीनों तालाब के किनारे बातचीत कर रहे थे। उसी समय उन्होंने देखा कि कुछ मछियारे हाथों में जाल लेकर वहाँ आए। उनके जाल में बहुत-सी मछलियाँ फँसकर तड़प रही थीं। तालाब के किनारे आकर मछियारे आपस में बात करने लगे। एक ने कहा:

-इस तालाब में खूब मछलियाँ हैं। पानी भी कम है। कल हम यहाँ आकर मछलियाँ पकड़ेंगे।

सबने उसकी बात का समर्थन किया। कल सुबह यहाँ आने का निश्चय करके मछियारे चले गए। उनके जाने के बाद सब मछलियों ने सभा की। सभी चिन्तित थे कि मैं सुबह होने से पहले ही इस जलाशय को छोड़कर अपनी पत्नी के साथ दूसरे जलाशय में चला जाऊँगा । यह कहकर वह मेढक, मेढकी को लेकर तालाब से चला गया।

दूसरे दिन अपने वचनानुसार वे मछियारे वहाँ आए। उन्होंने तालाब में जाल बिछा दिया। तालाब की सभी मछलियाँ जाल में फंस गईं। शतबुद्धि और सहस्रबुद्धि ने बचाव के लिए बहुत–से पैंतरे बदले, किन्तु मछियारे भी अनाड़ी न थे। उन्होंने चुन-चुनकर सब मछलियों को जाल में बाँध लिया। सबने तड़प-तड़प कर प्राण दिए।

संध्या समय मछियारों ने मछलियों से भरे जाल को कन्धे पर उठा लिया। शतबुद्धि और सहस्रबुद्धि बहुत भारी मछलियाँ थीं। इसीलिए उन्होंने शतबुद्धि को कन्धे पर और सहस्रबुद्धि को हाथों पर लटका लिया था। उनकी दुरवस्था देखकर एकबुद्धि मेढक ने अपनी मेढकी से कहा :

-देख प्रिये! मैं कितना दूरदर्शी हूँ। जिस समय शतबुद्धि कन्धों पर और सहस्रबुद्धि हाथों में लटकी जा रही है, उस समय मैं एकबुद्धि इस छोटे-से जलाशय में निर्मल जल में सानन्द विहार कर रहा हूँ। इसलिए मैं कहता हूँ कि विद्या से बुद्धि का स्थान ऊँचा है,और बुद्धि में भी सहस्रबुद्धि की अपेक्षा एकबुद्धि होना अधिक व्यावहारिक है।

यह कहानी पूरी होने के बाद चक्रधर ने पूछा :

ने भी उसका समर्थन करते हुए कहाबुद्धिमान् के लिए संसार में सब कुछ सम्भव है। जहाँ वायु

और प्रकाश की भी गति नहीं होती, वहाँ बुद्धिमानों की बुद्धि पहुँच जाती है। किसी के कथनमात्र से हम अपने पूर्वजों की भूमि को नहीं छोड़ सकते। अपनी जन्मभूमि से जो सुख होता है वह स्वर्ग में भी नहीं होता। भगवान् ने हमें बुद्धि दी है, भय से भागने के लिए नहीं, बल्कि भय का युक्तिपूर्वक सामना करने के लिए।

तालाब की मछलियों को तो शतबुद्धि और सहस्रबुद्धि के आश्वासन पर भरोसा हो गया, लेकिन एकबुद्धि मेढक ने कहा-मित्रों! मेरे पास तो एक ही बुद्धि है, वह मुझे यहाँ से भाग जाने की सलाह देती है। इसीलिए

मैं सुबह होने से पहले ही इस जलाशय को छोड़कर अपनी पत्नी के साथ दूसरे जलाशय में चला जाऊँगा । यह कहकर वह मेढक, मेढकी को लेकर तालाब से चला गया।

दूसरे दिन अपने वचनानुसार वे मछियारे वहाँ आए। उन्होंने तालाब में जाल बिछा दिया। तालाब की सभी मछलियाँ जाल में फंस गईं। शतबुद्धि और सहस्रबुद्धि ने बचाव के लिए बहुत–से पैंतरे बदले, किन्तु मछियारे भी अनाड़ी न थे। उन्होंने चुन-चुनकर सब मछलियों को जाल में बाँध लिया। सबने तड़प-तड़प कर प्राण दिए।

संध्या समय मछियारों ने मछलियों से भरे जाल को कन्धे पर उठा लिया। शतबुद्धि और सहस्रबुद्धि बहुत भारी मछलियाँ थीं। इसीलिए उन्होंने शतबुद्धि को कन्धे पर और सहस्रबुद्धि को हाथों पर लटका लिया था। उनकी दुरवस्था देखकर एकबुद्धि मेढक ने अपनी मेढकी से कहा :

-देख प्रिये! मैं कितना दूरदर्शी हूँ। जिस समय शतबुद्धि कन्धों पर और सहस्रबुद्धि हाथों में लटकी जा रही है, उस समय मैं एकबुद्धि इस छोटे-से जलाशय में निर्मल जल में सानन्द विहार कर रहा हूँ। इसलिए मैं कहता हूँ कि विद्या से बुद्धि का स्थान ऊँचा है,और बुद्धि में भी सहस्रबुद्धि की अपेक्षा एकबुद्धि होना अधिक व्यावहारिक है।

 

शिक्षा

एक व्यावहारिक बुद्धि हजार अव्यावहारिक बुद्धि से अच्छी है। यानि अगर व्यक्ति को हजार वेदों का ज्ञान है और बहुत अधिक शिक्षा उसने ग्रहण की है परन्तु वह उसे व्यवहार में नहीं ला सकता या उसे समय पर प्रयोग नहीं कर सकता, तो उससे बेहतर तो वह व्यक्ति है जिसको ज्यादा ज्ञान नहीं पर जितना उसके पास ज्ञान है वह उसे व्यवहार में अच्छे तरीके से और समय पर व्यवहार में लाता है। 

5.5 गधे की कहानी  (Panchatantra Stories In Hindi) 

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गधे की कहानी

एक गाँव में उद्धत नाम का गधा रहता था। दिन में धोबी का भार ढोने के बाद रात को वह स्वेच्छा से खेतों में घूमा करता था। सुबह होने पर वह स्वयं धोबी के पास आ जाता था।

रात को खेतों में घूमते-घूमते उसकी जान-पहचान एक गीदड़ से हो गई। गीदड़ मैत्री करने में बड़े चतुर होते हैं। गधे के साथ गीदड़ भी खेतों में जाने लगा। खेत की बाड़ को तोड़कर गधा अन्दर चला जाता और वहाँ गीदड़ के साथ मिलकर कोमल-कोमल ककड़ियाँ खाकर सुबह अपने घर आ जाता था।

एक दिन गधा उमंग में आ गया। चाँदनी रात थी। दूर तक खेत लहलहा रहे थे। गधे ने कहा-मित्र! आज कितनी निर्मल चाँदनी खिली है। जी चाहता है, आज खूब गीत गाऊँ। मुझे सब राग-रागिनियाँ आती हैं। तुझे जो गीत पसन्द हो, वही गाऊँगा। भला, कौन सा गाऊँ,तू ही बता।

गीदड़ ने कहा-मामा! इन बातों को रहने दो। क्यों अनर्थ बखेरते हो? अपनी मुसीबत आप बुलाने से क्या लाभ? शायद, तुम भूल गए कि हम चोरी से खेत में आए हैं। चोर को तो खाँसना भी मना है, और तुम ऊँचे स्वर से राग-रागिनी गाने की सोच रहे हो। और शायद तुम यह भी भूल गए कि तुम्हारा स्वर मधुर नहीं है। तुम्हारी शंखध्वनि दूर-दूर तक जाएगी। इन खेतों के बाहर रखवाले सो रहे हैं। वे जाग गए तो तुम्हारी हड्डियाँ तोड़ देंगे। कल्याण चाहते हो तो इन उमंगों को भूल जाओ; आनन्दपूर्वक अमृत जैसी मीठी ककड़ियों से पेट भरो। संगीत का व्यसन तुम्हारे लिए अच्छा नहीं है।

गीदड़ की बात सुनकर गधे ने उत्तर दिया-मित्र! तुम वनचर हो, जंगलों में रहते हो, इसीलिए संगीत-सुधा का रसास्वादन तुमने नहीं किया है। तभी तुम ऐसी बात कह रहे हो। गीदड़ ने कहा-मामा! तुम्हारी बात ही ठीक सही, लेकिन तुम संगीत तो नहीं जानते, केवल गले से ढींचू-ढींचू करना ही जानते हो।

गधे को गीदड़ की बात पर क्रोध तो बहुत आया किन्तु क्रोध को पीते हुए गधा बोला-गीदड़! यदि मुझे संगीत विद्या का ज्ञान नहीं तो किसको होगा? मैं तीनों ग्रामों,सातों स्वरों,इक्कीस मूर्छनाओं,उनचास तालों,तीनों लयों और तीन मात्राओं के भेदों को जानता हूँ। राग में तीन यति विराम होते हैं, नौ रस होते हैं। छत्तीस राग-रागनियों का मैं पण्डित हूँ। चालीस तरह के संचारी-व्यभिचारी भावों को भी मैं जानता हूँ। तब भी तू मुझे रागी नहीं मानता। कारण, कि तू स्वयं राग-विद्या से अनभिज्ञ है।गीदड़ ने कहा-मामा! यदि यही बात है तो मैं तुझे नहीं रोकूँगा। मैं खेत के दरवाज़े पर खड़ा चौकीदारी करता हूँ,तू जैसा जी चाहे, गाना गा।

गीदड़ के जाने के बाद गधे ने अपना अलाप शुरू कर दिया। उसे सुनकर खेत के रखवाले दाँत पीसते हुए भागे आए। वहाँ आकर उन्होंने गधे को लाठियों से मार-मारकर ज़मीन पर गिरा दिया। उन्होंने उसके गले में साँकली भी बाँध दी। गधा भी थोड़ी देर कष्ट में तड़पने के बाद उठ बैठा। गधे का स्वभाव है कि वह बहुत जल्दी कष्ट की बात भूल जाता है। लाठियों की मार की याद मुहूर्त-भर ही उसे सताती है।

गधे ने थोड़ी देर में साँकली तुड़ा ली और भागना शुरू कर दिया। गीदड़ भी उस समय दूर खड़ा तमाशा देख रहा था। मुसकराते हुए वह गधे से बोला-क्यों मामा! मेरे मना करते-करते भी तुमने अलापना शुरू कर दिया! इसीलिए तुम्हें यह दण्ड मिला। मित्रों की सलाह का ऐसा तिरस्कार करना उचित नहीं है।
 

शिक्षा

मित्र की अच्छी सलाह मानो।

 

5.6 ब्राह्मण और सत्तुओं की कहानी (Panchatantra Stories In Hindi)

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Panchatantra Stories in Hindi

एक नगर में कोई कंजूस ब्राह्मण रहता था। उसने भिक्षा से प्राप्त सत्तुओं में से थोड़े-से खाकर शेष से एक घड़ा भर लिया था। उस घड़े को उसने रस्सी से बाँध खूंटी से लटका दिया और उसके नीचे पास ही खटिया डालकर उस पर लेटे-लेटे विचित्र सपने लेने लगा और कल्पना के हवाई घोड़े दौड़ाने लगा।

उसने सोचा कि देश में अकाल पडेगा तो इन सत्तुओं का मुल्य सौ रुपये हो जाएगा। उन सौ रुपयों से मैं दो बकरियाँ लूँगा । छ: महीने में उन दो बकरियों से कई बकरियाँ बन जाएँगी। उन्हें बेचकर एक गाय लंगा । गौओं के बाद भैंस लूंगा । और फिर घोडे ले लूंगा। घोड़े को महंगे दामों में बेचकर मेरे पास बहुत-सा सोना हो जाएगा। सोना बेचकर मैं बहुत बड़ा घर बनाऊँगा। मेरी संपत्ति को देखकर कोई भी ब्राह्मण अपनी रूपवती कन्या का विवाह मुझसे कर देगा।

वह मेरी पत्नी बनेगी। उससे जो पुत्र होगा। उसका नाम मैं सोमशर्मा रखूंगा। जब वह घुटनों के बल चलना सीख जाएगा तो मैं पुस्तक लेकर घड़शाला के पीछे की दीवार पर बैठा हुआ उसकी बाल-लीलाएँ देखूगा । उसके बाद सोमशर्मा मुझे देखकर माँ की गोद से उतरेगा और मेरी ओर आएगा तो मैं उसकी माँ को क्रोध से कहूँगा।-अपने बच्चे को सँभाल । वह गृह-कार्य में व्यस्त होगी, इसलिए मेरा वचन न सुन सकेगी, तब मैं उठकर उसे पैर की ठोकर से मारूँगा। यह सोचते ही उसका पैर ठोकर मारने के लिए ऊपर उठा। वह ठोकर सत्तू भरे घड़े को लगी। घड़ा चकनाचूर हो गया। कंजूस ब्राह्मण के स्वप्न भी साथ ही चकनाचूर हो गए।

 

शिक्षा

हवाई किले मत बांधो यानी कि जो पाना असंभव है उसे सोच कर अपना समय व्यस्त न करो।

 

बंदरों की कहानी (panchatantra stories in hindi with moral)

एक नगर के राजा चन्द्र के पुत्रों को बन्दरों से खेलने का व्यसन था। बन्दरों का सरदार भी बड़ा चतुर था। वह सब बन्दरों को नीतिशास्त्र पढ़ाया करता था। सब बन्दर उसकी आज्ञा का पालन करते थे। राजपुत्र भी उस बन्दरों के सरदार वानरराज को बहुत मानते थे।

 

उसी नगर के राजगृह में छोटे राजपुत्र के वाहन के लिए कई मेढ़े भी थे। उनमें से एक मेढ़ा बहुत लोभी था। वह जब जी चाहे तब रसोई में घुसकर सब कुछ खा लेता था। रसोइए उसे लकड़ी से मारकर बाहर निकाल देते थे।

 

वानरराज ने जब यह कलह देखा तो वह चिन्तित हो गया। उसने सोचा,यह कलह किसी दिन सारे बन्दर-समाज के नाश का कारण हो जाएगा। कारण यह कि जिस दिन नौकर इस मेढ़े को जलती लकड़ी से मारेगा, उसी दिन यह मेढ़ा घुड़साल में घुसकर आग लगा देगा। इससे कई घोड़े जल जाएँगे। जलने के घावों को भरने के लिए बन्दरों की चर्बी की माँग पैदा होगी। तब,हम सब मारे जाएंगे।

 

इतनी दूर की बात सोचने के बाद उसने बन्दरों को सलाह दी कि वे अभी से राजगृह का त्याग कर दें। किन्तु उस समय बन्दरों ने उसकी बात नहीं सुनी । राजगृह  में उन्हें मीठे-मीठे फल मिलते थे। उन्हें छोड़कर वे कैसे जाते!

 

 उन्होंने वानरराज से कहा कि बुढ़ापे के कारण तुम्हारी बुद्धि मन्द पड़ गई है। हम राजपुत्र के प्रेम-व्यवहार और अमृतसमान मीठे फलों को छोड़कर जंगल में नहीं जाएँगे।

 

वानरराज ने आँखों में आँसू भरकर कहा-मूर्यो! तुम इस लोभ का परिणाम नहीं जानते। यह सुख तुम्हें बहुत महंगा पडेगा! यह कहकर वानरराज स्वयं राजगृह छोड़कर वन में चला गया।

 

उसके जाने के बाद एक दिन वही बात हो गई जिससे वानरराज ने वानरों को सावधान किया था। वह लोभी मेढ़ा जब रसोई में गया तो नौकर ने जलती लकड़ी उसपर फेंकी। मेढ़े के बाल जलने लगे। वहाँ से भागकर वह अश्वशाला में घुस गया। उसकी चिनगारियों से अश्वशाला भी जल गई। कुछ घोड़े आग से जलकर वहीं मर गए। कुछ रस्सी तुड़ाकर शाला से भाग गए।

 

तब राजा ने पशुचिकित्सा में कुशल वैद्यों को बुलाया और उन्हें आग से जले घोड़ों की चिकित्सा करने के लिए कहा। वैद्यों ने आयुर्वेदशास्त्र देखकर सलाह दी कि जले घावों पर बन्दरों की चर्बी की मरहम बनाकर लगाई जाए। राजा ने मरहम बनाने के लिए सब बन्दरों को मारने की आज्ञा दी। सिपाहियों ने सब बन्दरों को पकड़कर लाठियों और पत्थरों से मार दिया।

 

शिक्षा

लालच बुद्धि पर परदा डाल उसे ढक देता है।

 
 

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