घमण्ड का पुतला ~ premchand ki kahani

घमण्ड का पुतला शाम हो गयी थी। मैं सरयू नदी के किनारे अपने कैम्प में बैठा हुआ नदी के मजे ले रहा था कि मेरे फटबाल ने दबे पांव पास आकर मुझे सलाम किया कि जैसे वह मुझसे कुछ कहना चाहता है। फुटबाल के नाम से जिस प्राणी का जिक्र किया गया वह मेरा अर्दली … Read more

आत्माराम ~ premchand ki kahani

आत्माराम वेदों-ग्राम में महादेव सोनार एक सुविख्यात आदमी था। वह अपने सायबान में प्रात: से संध्या तक अँगीठी के सामने बैठा हुआ खटखट किया करता था। यह लगातार ध्वनि सुनने के लोग इतने अभ्यस्त हो गये थे कि जब किसी कारण से वह बंद हो जाती, तो जान पड़ता था, कोई चीज गायब हो गयी। … Read more

अपनी करनी ~ premchand ki kahani

अपनी करनी आह, अभागा मैं! मेरे कर्मो के फल ने आज यह दिन दिखाये कि ।।अपमान भी मेरे ऊपर हंसता है। और यह सब मैंने अपने हाथों किया। शैतान के सिर इलजाम क्यों दूं, किस्मत को खरी-खोटी क्यों सुनाऊँ, होनी का क्यों रोऊ? जो कुछ किया मैंने जानते और बूझते हए किया। अभी एक साल … Read more

लैला ~ premchand ki kahani

लैला यह कोई न जानता था कि लैला कौन है, कहां है, कहां से आयी है और क्या करती है। एक दिन लोगों ने एक अनुपम सुंदरी को तेहरान के चौक में अपने डफ पर हाफिज की एक गजल झूम-झूम कर गाते सुना – रसीद मुजरा कि ऐयामें गम न ख्वाहद मांद, चुनां न मांद, … Read more

दण्ड ~ premchand ki kahani

दण्ड संध्या का समय था। कचहरी उठ गयी थी। अहलकार चपरासी जेबें खनखनाते घर जा रहे थे। मेहतर कूड़े टटोल रहा था कि शायद कहीं पैसे मिल जायें। कचहरी के बरामदों में सांडों ने वकीलों की जगह ले ली थी। पेड़ों के नीचे मुहर्रिरों की जगह कुत्ते बैठे नजर आते थे। इसी समय एक बूढा … Read more

मंदिर और मस्जिद ~ premchand ki kahani

मंदिर और मस्जिद चौधरी इतरतअली ‘कड़े के बड़े जागीरदार थे। उनके बुजुर्गों ने शाही जमाने में अंग्रेजी सरकार की बड़ी-बड़ी खिदमत की थीं। उनके बदले में यह जागीर मिली थी। अपने सुप्रबन्धन से उन्होंने अपनी मिल्कियत और भी बढ़ा ली थी और अब इस इलाके में उनसे ज्यादा धनी-मानी कोई आदमी न था। अंग्रेज हुक्काम … Read more

सैलानी बंदर ~ premchand ki kahani

सैलानी बंदर जीवनदास नाम का एक गरीब मदारी अपने बन्दर मन्नू को नचाकर अपनी जीविका चलाया करता था। वह और उसकी स्त्री बुधिया दोनों मन्नू का बहुत प्यार करते थे। उनके कोई सन्तान न थी, मन्न् ही उनके स्नेह और प्रेम का पात्र था दोनों उसे अपने साथ खिलाते और अपने साथ सुलाते थे: उनकी … Read more

स्वांग ~ premchand ki kahani

स्वांग राजपूत खानदान में पैदा हो जाने ही से कोई सूरमा नहीं हो जाता और न नाम के पीछे ‘सिंह की दुम लगा देने ही से बहादुरी आती है। गजेन्द्र सिंह के पुरखे किस जमाने में राजपूत थे इसमें सन्देह की गुंजाइश नहीं। लेकिन इधर तीन पुश्तों से तो नाम के सिवा उनमें रापूती के … Read more

गुल्ली-डंडा ~ premchand ki kahani

गुल्ली-डंडा  हमारे अंग्रेजी दोस्त माने या न मानें मैं तो यही कहँगा कि गुल्ली-डंडा एसब खेलों का राजा है। अब भी कभी लड़कों को गुल्ली-डंडा खेलते देखता है, तो जी लोट-पोट हो जाता है कि इनके साथ जाकर खेलने लगें। न लान की जरूरत, न कोर्ट की, न नेट की, न थापी की। मजे से … Read more

झाँकी ~ premchand ki kahani

झाँकी कई दिन से घर में कलह मचा हुआ था। माँ अलग मुँह फुलाए बैठी थी , स्त्री अलग। घर की वायु में जैसे विष भरा हुआ था। रात को भोजन नहीं बना, दिन को मैंने स्टोव पर खिचड़ी डाली: पार खाया किसी ने नहीं। बच्चों को भी आज भूख न थी। छोटी लड़की कभी … Read more