तीन अहोई अष्टमी व्रत कथाएं जिन्हे पढ़ने से मिलती है सुख समृद्धि | ahoi ashtami vrat katha

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एक नजर में अहोई माता व्रत

अहोई अष्टमी का व्रत कार्तिक कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन किया जाता है। पुत्रवती महिलाओं के लिए यह व्रत अत्यन्त महत्वपूर्ण है। माताएँ अहोई अष्टमी के व्रत में दिन भर उपवास रखती हैं और सायंकाल तारे दिखाई देने के समय होई का पूजन किया जाता है। तारों को करवा से अर्घ्य भी दिया जाता है। यह होई गेरु आदि के द्वारा भीत पर बनाई जाती है अथवा किसी मोटे वस्त्र पर होई काढकर पूजा के समय उसे भीत पर टांग दिया जाता है।

अहोई के चित्रांकन में अधिकतर आठ कोष्ठक की एक पुतली बनाई जाती है। उसी के पास साही तथा उसके बच्चों की आकृतियाँ बना दी जाती हैं। करवा चौथ के ठीक चार दिन आगे अष्टमी तिथि को देवी अहोई माता का व्रत किया जाता है। यह व्रत सन्तान की लम्बी आयु और सुखमय जीवन की कामना से पुत्रवती महिलाएं करती हैं। कार्तिक मास की अष्टमी तिथि को कृष्ण पक्ष में यह व्रत रखा जाता है इसलिए इसे अहोई अष्टमी के नाम से भी जाना जाता है।

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पहली अहोई अष्टमी व्रत कथा (ahoi ashtami vrat katha)

प्राचीन काल में किसी नगर में एक साहूकार रहता था। उसके सात लड़के थे। दीपावली से पहले साहूकार की स्त्री घर की लीपापोती हेतु मिट्टी लेने खदान में गई और कुदाल से मिट्टी खोदने लगी।

दैवयोग से उसी जगह एक सेह की मांद थी। सहसा उस स्त्री के हाथ से कुदाल बच्चे को लग गई जिससे सेह का बच्चा तत्काल मर गया। अपने हाथ से हुई हत्या को लेकर साहूकार की पत्नी को बहुत दुख हुआ परन्तु अब क्या हो सकता था! वह शोकाकुल पश्चाताप करती हुई अपने घर लौट आई।

कुछ दिनों बाद उसका बेटे का निधन हो गया। फिर अकस्मात् दूसरा, तीसरा और इस प्रकार वर्ष भर में उसके सभी बेटे मर गए। महिला अत्यंत व्यथित रहने लगी। एक दिन उसने अपने आस-पड़ोस की महिलाओं को विलाप करते हुए बताया कि उसने जानबूझ कर कभी कोई पाप नहीं किया। हाँ, एक बार खदान में मिट्टी खोदते हुए अंजाने में उसके हाथों एक सेह के बच्चे की हत्या अवश्य हुई है और तत्पश्चात उसके सातों बेटों की मृत्यु हो गई।

यह सुनकर पास-पड़ोस की वृद्ध औरतों ने साहूकार की पत्नी को दिलासा देते हुए कहा कि यह बात बताकर तुमने जो पश्चाताप किया है उससे तुम्हारा आधा पाप नष्ट हो गया है। तुम उसी अष्टमी को भगवती माता की शरण लेकर सेह और सेह के बच्चों का चित्र बनाकर उनकी अराधना करो और क्षमा-याचना करो। ईश्वर की कृपा से तुम्हारा पाप धुल जाएगा।

साहूकार की पत्नी ने वृद्ध महिलाओं की बात मानकर कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की अष्टमी को उपवास व पूजा-याचना की। वह हर वर्ष नियमित रूप से ऐसा करने लगी। तत्पश्चात् उसे सात पुत्र रत्नों की प्राप्ती हुई। तभी से अहोई व्रत की परम्परा प्रचलित हो गई।


दूसरी अहोई अष्टमी व्रत कथा (ahoi ashtami vrat katha)

पुराने समय की बात है दतिया नामक नगर में एक सेठ चंद्रभान रहता था। उसकी पत्नी का नाम चंद्रिका था जो बहुत गुणवती, सुंदर तथा चरित्रवान थी। उसके कई संतानें हुईं मगर सभी की छोटी आयु में ही मृत्यु हो जाती थी। संतानों के इस तरह मरते रहने के कारण पति-पत्नी बहुत दुखी थे तथा उन्हें चिंता थी कि उनकी मृत्यु के पश्चात उनका वंश कौन चलाएगा।

एक दिन दोनों ने सोचा कि हम सब कुछ त्याग कर जंगलों में निवास करें और यह सोच कर वे सब कुछ छोड़ कर जंगल की ओर चल पड़े। चलते-चलते पति-पत्नी बद्रिका आश्रम के पास शीतल कुंड के समीप पहुंचे और वहां जाकर प्राण त्यागने का मन बना लिया और अन्न-जल त्याग कर बैठ गए।

इसी तरह बैठे कई दिन बीत गए तो सातवें दिन आकाशवाणी हुई कि तुम अपने प्राण मत त्यागो। यह दुख तुम्हें पिछले जन्म के पाप कर्मों से मिला है। ऐ सेठ, अब तू अपनी पत्नी से आने वाले कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि को व्रत करवाना जिसके प्रभाव से अहोई देवी प्रकट होंगी।

तुम उनसे अपने पुत्रों की दीर्घ आयु मांगना। व्रत के दिन तुम राधा कुंड में स्नान करना। कार्तिक मास की कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि पर चंद्रिका ने बड़ी श्रद्धा से अहोई देवी का व्रत रखा और रात को सेठ ने राधा कुंड में स्नान किया। जब सेठ स्नान करके वापस आ रहा था तो रास्ते में अहोई देवी ने दर्शन दिए और बोली मैं तुम पर बहुत प्रसन्न हूं। तुम मुझ से कोई भी वर मांगो। अहोई देवी के दर्शन करके सेठ अति प्रसन्न हुआ और उसने कहा कि मां मेरे बच्चे छोटी आयु में ही स्वर्ग सिधार जाते हैं इसलिए उनकी दीर्घायु का वर दें।

अहोई देवी ने कहा कि ऐसा ही होगा और अंतर्ध्यान हो गईं। कुछ समय पश्चात सेठ के यहां पुत्र पैदा हुआ और बड़ा होकर विद्वान, शक्तिशाली और प्रतापी हुआ।’’

इस महिमा के कारण ही अहोई माता के व्रत का प्रभाव बना।

उस दिन कार्तिक कृष्ण पक्ष की आठवीं तिथि थी इसलिए सभी माताएं इस दिन व्रत रखती हैं तथा विधि अनुसार पूजा आराधना करते हुए अपने बच्चों की दीर्घायु की कामना करती हैं। 


तीसरी अहोई अष्टमी व्रत कथा (ahoi ashtami vrat katha)

दंतकथा के अनुसार एक बार एक औरत अपने 7 पुत्रों के साथ एक गाँव में रहती थी। एक दिन कार्तिक महीने में वह औरत मिटटी खोदने के लिए जंगल में गयी। वहाँ  पर उसने गलती से एक पशु के शावक की अपनी कुल्हाड़ी से हत्या कर दी।
उस घटना के बाद उस औरत के सातों पुत्र एक के बाद एक मृत्यु को प्राप्त हो गए। इस घटना से दुखी हो कर उस औरत ने अपनी कहानी गाँव की हर एक औरत को सुनाई। एक बड़ी औरत ने उस औरत को यह सुझाव दिया की वह माता अहोई अष्टमी की आराधना करे।

पशु के शावक की सोते हुए हत्या के पश्चाताप के लिए उस औरत ने शावक का चित्र बनाया और माता अहोई अष्टमी के चित्र के साथ रख कर उनकी पूजा करने लगी। उस औरत ने 7 वर्षों तक अहोई अष्टमी का व्रत रखा और आखिर में उसके सातों पुत्र फिर से जीवित हो गए।

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