सभी प्रदोष व्रतों के लिए प्रसिद्ध कथाएं | pradosh vrat katha

Rate this post

pradosh vrat katha in hindi, pradosh vrat ki katha, प्रदोष व्रत कथा, som pradosh vrat katha, ravi pradosh vrat katha, mangal pradosh vrat katha, budh pradosh vrat katha, guru pradosh vrat katha, shani pradosh vrat katha, ravi pradosh vrat katha

प्रदोष व्रत पर एक नजर (pradosh vrat)

हिन्दू धर्म के अनुसार, प्रदोष व्रत कलियुग में अति मंगलकारी और शिव कृपा प्रदान करनेवाला होता है। माह की त्रयोदशी तिथि में सायं काल को प्रदोष काल कहा जाता है। मान्यता है कि प्रदोष के समय महादेव कैलाश पर्वत के रजत भवन में इस समय नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। जो भी लोग अपना कल्याण चाहते हों यह व्रत रख सकते हैं। प्रदोष व्रत को करने से सब प्रकार के दोष मिट जाता है। सप्ताह के सातों दिन के प्रदोष व्रत का अपना विशेष महत्व है।

प्रदोष व्रत के विषय में, कि यदि :

  • रविवार के दिन प्रदोष व्रत आप रखते हैं तो सदा नीरोग रहेंगे। 
  • सोमवार के दिन व्रत करने से आपकी इच्छा फलित होती है। 
  • मंगलवार कोप्रदोष व्रत रखने से रोग से मुक्ति मिलती है और आप स्वस्थ रहते हैं।
  • बुधवार के दिन इस व्रत का पालन करने से सभी प्रकार की कामना सिद्ध होती है। 
  • बृहस्पतिवार के व्रत से शत्रु का नाश होता है। शुक्र प्रदोष व्रत से सौभाग्य की वृद्धि होती है। 
  • शनि प्रदोष व्रत से पुत्र की प्राप्ति होती है।

यह जानकारी विकिपीडिया से ली गयी है अधिक जानकारी के लिए विकिपीडिया पेज देखें।


रवि प्रदोष व्रत कथा (ravi pradosh vrat katha)

एक ग्राम में अति दीन ब्राह्मण निवास करता था। उसकी साध्वी स्त्री प्रदोष व्रत किया करती थी। उसे एक ही पुत्ररत्न था। एक समय की बात है, वह पुत्र गंगा स्नान करने के लिए गया। दुर्भाग्यवश मार्ग में चोरों ने उसे घेर लिया और वे कहने लगे कि हम तुम्हें मारेंगे नहीं, तुम अपने पिता के गुप्त धन के बारे में हमें बतला दो।

बालक दीनभाव से कहने लगा कि बंधुओं! हम अत्यंत दु:खी दीन हैं। हमारे पास धन कहाँ है?
तब चोरों ने कहा कि तेरे इस पोटली में क्या बंधा है?
बालक ने नि:संकोच कहा कि मेरी माँ ने मेरे लिए रोटियां दी हैं।

यह सुनकर चोरों ने अपने साथियों से कहा कि साथियों! यह बहुत ही दीन-दु:खी मनुष्य है अत: हम किसी और को लूटेंगे। इतना कहकर चोरों ने उस बालक को जाने दिया।

बालक वहाँ से चलते हुए एक नगर में पहुंचा। नगर के पास एक बरगद का पेड़ था। वह बालक उसी बरगद के वृक्ष की छाया में सो गया। उसी समय उस नगर के सिपाही चोरों को खोजते हुए उस बरगद के वृक्ष के पास पहुंचे और बालक को चोर समझकर बंदी बना राजा के पास ले गए। राजा ने उसे कारावास में बंद करने का आदेश दिया।

ब्राह्मणी का लड़का जब घर नहीं लौटा, तब उसे अपने पुत्र की बड़ी चिंता हुई। अगले दिन प्रदोष व्रत था। ब्राह्मणी ने प्रदोष व्रत किया और भगवान शंकर से मन-ही-मन अपने पुत्र की कुशलता की प्रार्थना करने लगी।

भगवान शंकर ने उस ब्राह्मणी की प्रार्थना स्वीकार कर ली। उसी रात भगवान शंकर ने उस राजा को स्वप्न में आदेश दिया कि वह बालक चोर नहीं है, उसे प्रात:काल छोड़ दें अन्यथा तुम्हारा सारा राज्य-वैभव नष्ट हो जाएगा।

प्रात:काल राजा ने शिवजी की आज्ञानुसार उस बालक को कारावास से मुक्त कर दिया गया। बालक ने अपनी सारी कहानी राजा को सुनाई।

सारा वृत्तांत सुनकर राजा ने अपने सिपाहियों को उस बालक के घर भेजा और उसके माता-पिता को राजदरबार में बुलाया। उसके माता-पिता बहुत ही भयभीत थे। राजा ने उन्हें भयभीत देखकर कहा कि आप भयभीत न हो। आपका बालक निर्दोष है। राजा ने ब्राह्मण को 5 गांव दान में दिए जिससे कि वे सुखपूर्वक अपना जीवन व्यतीत कर सकें। इस तरह ब्राह्मण आनन्द से रहने लगा। शिव जी की दया से उसकी दरिद्रता दूर हो गई।


 सोम प्रदोष व्रत कथा ( som pradosh vrat katha)

एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी, उसके पति का स्वर्गवास हो गया था। उसके घर बार कुछ नही बचा, इसलिए सुबह से अपने पुत्र के साथ भीख मांगने निकल पड़ती थी। इस तरह से ही वह स्वयं व पुत्र का पेट पालती थी। एक दिन घर आते समय ब्राह्मणी को एक बालक घायल अवस्था में मिला, ब्राह्मणी उसे अपने घर ले आई।

लड़का विदर्भ का राजकुमार था, शत्रु सैनिकों ने उसके राज्य पर आक्रमण किया और उसके पिता को बंदी बनाकर उसके राज्य पर अधिकार कर लिया, इसलिए वह मारा-मारा फिर रहा था। राजकुमार ब्राह्मण-पुत्र के साथ ब्राह्मणी के घर रहने लगा। एक दिन अंशुमति नामक एक गंधर्व कन्या ने राजकुमार को देखा और उस पर मोहित हो गई।

अगले दिन वह अपने माता-पिता को राजकुमार से मिलाने लाई। कुछ दिनों बाद अंशुमति के माता-पिता को शंकर भगवान ने स्वप्न में आदेश दिया कि राजकुमार और अंशुमति का विवाह कर दिया जाए, उन्होंने वैसा ही किया।

वह विधवा ब्राह्मणी प्रदोष व्रत करती थी। उनके प्रदोष व्रत का ही प्रभाव था कि राजकुमार ने गंधर्वराज की सेना की सहायता से विदर्भ से शत्रुओं को भगाया और अपने पिता का राज्य पुनः प्राप्त किया, और सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करने लगा। राजकुमार ने ब्राह्मणी के पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बना लिया।

ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के कारण शंकर भगवान की कृपा से जैसे राजकुमार और ब्राह्मणी पुत्र के दिन सुधर गए, वैसे ही शंकर भगवान अपने हर भक्तों पर कृपा बनाए रखते हैं और सबके दिन संवर जाते हैं।


मंगल प्रदोष व्रत कथा (mangal pradosh vrat katha)

किसी समय की बात है एक गॉंव में एक बुढिया (वृद्धा) रहती थी। उसके एक ही पुत्र होने के कारण वह दिन रात हनुमान जी की सेवा करती। और अपने पुत्र को सही सलामत बनाऐ रखने की कामना करती रहती थी। वह बुढिया प्रतिरोज हनुमान जी की सेवा करती किन्‍तु मंगलवार के दिन तो पूजा-पाठ को विशेष महत्‍व देती थी। एक दिन हनुमान जी ने सोचा की यह वृद्धा रोज मेरी सेवा करती है क्‍यों न मैं इसकी परीक्षा लॅू।

यह सोचकर हनुमान जी अपना साधु रूप धारण करके उस बुढिया के घर आ गऐ और जोर से आवाज लगाते हुए कहा की मैं हनुमान भक्‍त हॅू। जब उस बुढि़या मॉं ने आवाज सुनी तो वह तुरन्‍त घर से बाहर आई और साधु को हाथ जोड़कर प्रणाम किया। और कहा बताइऐ साधु महाराज मैं आपकी क्‍या सेवा कर सकती हॅू।

इस पर हनुमान जी बोले की मुझे बहुत देर से भुख सता रही क्‍या आप मुझे भोजन करा सकती है। यह सुनकर उस वृद्धा से साधु महाराज को अन्‍दर आने को कहा और आसन बिछा दिया। किन्‍तु इस पर साधु ने कहा की हे माता जहा मैं बैठूगा वहा पर आप थोड़ा से लीप दो। तो उस बुडिया ने लीप दिया। यह देखकर हनुमान जी ने पुन: कहा की मेरे और भी काम मैं क्‍या तुम कर दोगी।

उस बुढि़या ने कहा की बताइऐ महाराज ऐसे करके हनुमान जी ने उस वृद्धा को अपने वचनो में बांध लिया। और कहा की तुम अपने बेटे को बुलाओ। और उसकी पीठ पर आग जलाकर मेरे लिए भोजन पकाओ। उस साधु की बात सुनकर वह बहुत ज्‍यादा परेशान हो गई किन्‍तु उसने वचन दिया था।

वह बहुत मजबूर हो गई और अपने बेटे को बुलाई और जमीन पर लीटाकर उसकी पीठ पर आग जलाकर भोजन पकाया। और साधु महाराज के पास आ गई। बुढि़या को देखकर हनुमान जी बोले की भोजन बन गया। वृद्धा ने कहा की बन गया साधु महाराज आप जीम लीजीऐ। तब हनुमान जी ने कहा की पहले तुम अपने बेटे को बुलाओ वह भी साथ खाना खाऐगा।

उस साधु की बात सुनकर बुढि़या बोली हे महाराज आप कैसी बाते कर रहे है मेरो बेटा को अग्नि से जलकर मर गया। वह भोजन करने कैसे आऐगा। तब साधु ने कहा की हे माता आप आवाज तो लगाऐ। और उस बुढिया ने अपने बेटे को आवाज लगाते हुऐ कहा की बेटा आ जाओ और भोजन ग्रहण कर लो। उसका बेटा वहा आया और वह अपने बेटे को जीवित देखकर बहुत खुश हुई तथा साथ आर्श्‍चय चकित रह गई।

तब वह वृद्धा उस साधु के चरणों में अपना सिर रखकर बोली की आप कोई साधारण पुरूष नही है। कृपा करके मुझे अपना रूप बताईऐ। तब हनुमान जी अपने रूप में आ गऐ। स्‍वयं हनुमान जी को देखकर वह वृद्धा बहुत खुश हुई और उन्‍हे प्रणाम किया। हनुमान जी ने कहा की हे माता मैं तुम्‍हारी इस सेवा और भक्ति से प्रसन्‍न हू मांगो क्‍या मांगती हो। तब उसने कहा की हे भगवान मैं तो मेरी पुत्र की सलामती चाहती हॅू। जिसके बाद हनुमान जी उसे आशीर्वाद देते हुऐ उनको धने दौलस सब प्रदान कर गऐ। और उसके सभी कष्‍टो को दूर कर दिया।


माता पार्वती और भगवान शिव की बातचीत को साहूकार सुन रहा था, इसलिए उसे ना तो इस बात की खुशी थी और ना ही दुख। वह पहले की भांति शिवजी की पूजा करता रहा। कुछ समय के बाद साहूकार की पत्नी ने एक पुत्र को जन्म दिया। जब वह बालक ग्यारह वर्ष का हुआ तो उसे पढ़ने के लिए काशी भेज दिया गया। साहूकार ने पुत्र के मामा को बुलाकर उसे बहुत सारा धन देते हुए कहा कि तुम इस बालक को काशी विद्या प्राप्ति के लिए ले जाओ। तुम लोग रास्ते में यज्ञ कराते जाना और ब्राह्मणों को भोजन-दक्षिणा देते हुए जाना।

दोनों मामा-भांजे इसी तरह यज्ञ कराते और ब्राह्मणों को दान-दक्षिणा देते काशी नगरी निकल पड़े। इस दौरान रात में एक नगर पड़ा जहां नगर के राजा की कन्या का विवाह था, लेकिन जिस राजकुमार से उसका विवाह होने वाला था वह एक आंख से काना था। राजकुमार के पिता ने अपने पुत्र के काना होने की बात को छुपाने के लिए सोचा क्यों न उसने साहूकार के पुत्र को दूल्हा बनाकर राजकुमारी से विवाह करा दूं।

विवाह के बाद इसको धन देकर विदा कर दूंगा और राजकुमारी को अपने नगर ले जाऊंगा। लड़के को दूल्हे के वस्त्र पहनाकर राजकुमारी से विवाह करा दिया गया।


साहूकार का पुत्र ईमानदार था। उसे यह बात सही नहीं लगी इसलिए उसने अवसर पाकर राजकुमारी के दुपट्टे पर लिखा कि तुम्हारा विवाह तो मेरे साथ हुआ है लेकिन जिस राजकुमार के संग तुम्हें भेजा जाएगा वह एक आंख से काना है। मैं तो काशी पढ़ने जा रहा हूं। जब राजकुमारी ने चुन्नी पर लिखी बातें पढ़ी तो उसने अपने माता-पिता को यह बात बताई। राजा ने अपनी पुत्री को विदा नहीं किया फिर बारात वापस चली गई।

दूसरी ओर साहूकार का लड़का और उसका मामा काशी पहुंचे और वहां जाकर उन्होंने यज्ञ किया। जिस दिन लड़का 12 साल का हुआ उस दिन भी यज्ञ का आयोजन था लड़के ने अपने मामा से कहा कि मेरी तबीयत कुछ ठीक नहीं है। मामा ने कहा कि तुम अंदर जाकर आराम कर लो। शिवजी के वरदानुसार कुछ ही देर में उस बालक के प्राण निकल गए। मृत भांजे को देख उसके मामा ने विलाप करना शुरू किया।

संयोगवश उसी समय शिवजी और माता पार्वती उधर से जा रहे थे। पार्वती माता ने भोलेनाथ से कहा- स्वामी, मुझे इसके रोने के स्वर सहन नहीं हो रहा, आप इस व्यक्ति के कष्ट को अवश्य दूर करें।


जब शिवजी मृत बालक के समीप गए तो वह बोले कि यह उसी साहूकार का पुत्र है, जिसे मैंने 12 वर्ष की आयु का वरदान दिया था, अब इसकी आयु पूरी हो चुकी है लेकिन मातृ भाव से विभोर माता पार्वती ने कहा कि हे महादेव, आप इस बालक को और आयु देने की कृपा करें अन्यथा इसके वियोग में इसके माता-पिता भी तड़प-तड़प कर मर जाएंगे। माता पार्वती के पुन: आग्रह पर भगवान शिव ने उस लड़के को जीवित होने का वरदान दिया।

शिवजी की कृपा से वह लड़का जीवित हो गया। शिक्षा पूरी करके लड़का मामा के साथ अपने नगर की ओर वापस चल दिया। दोनों चलते हुए उसी नगर में पहुंचे, जहां उसका विवाह हुआ था। उस नगर में भी उन्होंने यज्ञ का आयोजन किया। उस लड़के के ससुर ने उसे पहचान लिया और महल में ले जाकर उसकी खातिरदारी की और अपनी पुत्री को विदा किया।


इधर साहूकार और उसकी पत्नी भूखे-प्यासे रहकर बेटे की प्रतीक्षा कर रहे थे। उन्होंने प्रण कर रखा था कि यदि उन्हें अपने बेटे की मृत्यु का समाचार मिला तो वह भी प्राण त्याग देंगे परंतु अपने बेटे के जीवित होने का समाचार पाकर वह बेहद प्रसन्न हुए।

उसी रात भगवान शिव ने साहूकार के स्वप्न में आकर कहा- हे श्रेष्ठी, मैंने तेरे सोमवार के व्रत करने और व्रतकथा सुनने से प्रसन्न होकर तेरे पुत्र को लम्बी आयु प्रदान की है। इसी प्रकार जो कोई सोमवार व्रत करता है या कथा सुनता और पढ़ता है उसके सभी दुख दूर होते हैं और सभी मनोकामनाएं पूर्ण होती हैं।


बुध प्रदोष व्रत कथा (budh pradosh vrat katha)

बहुत पुरानी बात है एक पुरुष का नया नया विवाह हुआ था वह गौने के बाद पत्नि को लेने अपने ससुराल पहुंचा और उसने सास से कहा कि वह बुधवार के दिन ही अपनी पत्नि को लेकर जाएगा। उस पुरुष के सास ससुर, साले सालियों ने समझाया कि बुधवार को पत्नि को विदा कराकर ले जाना शुभ नहीं है। लेकिन वह पुरुष नहीं माना, विवश होकर सास ससुर ने अपने जमाई और पुत्री को भारी मन से विदा किया। पति पत्नि बैल गाड़ी में चले जा रहे थे।

एक नगर के बाहर निकलते ही पत्नि को प्यास लगी। पति लोटा लेकर पत्नि के लिए पानी लेने गए, जब वह पानी लेकर लौटा, तब उसने देखा की उसकी पत्नि पराये व्यक्ति द्वारा लाए लोटे से पानी पीकर हस हस कर बात कर रह थी। वह पराया पुरुष उस ही व्यक्ति की शक्ल सूरत वाला था। ऐसा देखकर वह व्यक्ति पराया व्यक्ति से आग बबूला होकर लड़ाई करने लगा। धीरे धीरे वहां कॉफी भीड़ एकत्रित हो गई और सिपाही भी आ गए।

सिपाही ने स्त्री से पूछा की सच सच बताओं की तुम्हारा पति इन दोनों में कौन है। लेकिन वह स्त्री चुप रही, क्योंकि दोनों ही व्यक्ति हमशक्ल थे। बीच रहा में अपनी पत्नि को लुटा देख कर वह व्यक्ति मन ही मन शंकर भगवान की प्रार्थना करने लगा। 

हे भगवान मुझे और मेरी पत्नि को इस मुसिबत से बचा लो। मैने अपनी पत्नि को बुधवार के दिन विदा कराकर जो अपराध किया है उसके लिए मुझे क्षमा कर दो। भविष्य में मैं ऐसी गलती कभी नही करूंगा। भगवान शिव उसकी प्रार्थना से भ्रवित हो गए और दूसरा व्यक्ति उसी समय कई अंतर ध्यान हो गया। इसके बाद वह अपनी पत्नि के साथ वह सही सलामत अपने नगर पहुंच गया। इसके बाद से दोनों पति पत्नि नियमपूर्वक बुधवार के दिन प्रदोष व्रत को करने लेगे। 


गुरु प्रदोष व्रत कथा (guru/brihaspati pradosh vrat katha)

एक बार इन्द्र और वृत्रासुर की सेना में घनघोर युद्ध हुआ। देवताओं ने दैत्य-सेना को पराजित कर नष्ट-भ्रष्ट कर डाला। यह देख वृत्रासुर अत्यन्त क्रोधित हो स्वयं युद्ध को उद्यत हुआ। आसुरी माया से उसने विकराल रूप धारण कर लिया। सभी देवता भयभीत हो गुरुदेव बृहस्पति की शरण में पहूंचे।
बृहस्पति महाराज बोले- पहले मैं तुम्हे वृत्रासुर का वास्तविक परिचय दे दूं।

वृत्रासुर बड़ा तपस्वी और कर्मनिष्ठ है। उसने गन्धमादन पर्वत पर घोर तपस्या कर शिव जी को प्रसन्न किया। पूर्व समय में वह चित्ररथ नाम का राजा था। एक बार वह अपने विमान से कैलाश पर्वत चला गया। वहां शिव जी के वाम अंग में माता पार्वती को विराजमान देख वह उपहास पूर्वक बोला- हे प्रभो! मोह-माया में फंसे होने के कारण हम स्त्रियों के वशीभूत रहते हैं। किन्तु देवलोक में ऐसा दृष्टिगोचर नहीं हुआ कि स्त्री आलिंगनबद्ध हो सभा में बैठे।

चित्ररथ के यह वचन सुन सर्वव्यापी शिव शंकर हंसकर बोले- हे राजन! मेरा व्यावहारिक दृष्टिकोण पृथक है। मैंने मृत्युदाता कालकूट महाविष का पान किया है, फिर भी तुम साधारण जन की भांति मेरा उपहास उड़ाते हो!

माता पार्वती क्रोधित हो चित्ररथ से संबोधित हुई- अरे दुष्ट! तूने सर्वव्यापी महेश्‍वर के साथ ही मेरा भी उपहास उड़ाया है। अतएव मैं तुझे वह शिक्षा दूंगी कि फिर तू ऐसे संतों के उपहास का दुस्साहस नहीं करेगा, अब तू दैत्य स्वरूप धारण कर विमान से नीचे गिर, मैं तुझे शाप देती हूं।

जगदम्बा भवानी के अभिशाप से चित्ररथ राक्षस योनि को प्राप्त हो गया और त्वष्टा नामक ऋषि के श्रेष्ठ तप से उत्पन्न हो वृत्रासुर बना।

गुरुदेव बृहस्पति आगे बोले- वृत्तासुर बाल्यकाल से ही शिव भक्त रहा है। अतः हे इन्द्र तुम बृहस्पति प्रदोष व्रत कर शंकर भगवान को प्रसन्न करो। देवराज ने गुरुदेव की आज्ञा का पालन कर बृहस्पति प्रदोष व्रत किया। गुरु प्रदोष व्रत के प्रताप से इन्द्र ने शीघ्र ही वृत्रासुर पर विजय प्राप्त कर ली और देवलोक में शान्ति छा गई।


शनि प्रदोष व्रत कथा (shani pradosh vrat katha)

शनि प्रदोष व्रत कथा के अनुसार प्राचीन काल में एक नगर सेठ थे। सेठजी के घर में हर प्रकार की सुख-सुविधाएं थीं लेकिन संतान नहीं होने के कारण सेठ और सेठानी हमेशा दुःखी रहते थे। काफी सोच-विचार करके सेठजी ने अपना काम नौकरों को सौंप दिया और खुद सेठानी के साथ तीर्थयात्रा पर निकल पड़े।

अपने नगर से बाहर निकलने पर उन्हें एक साधु मिले, जो ध्यानमग्न बैठे थे। सेठजी ने सोचा, क्यों न साधु से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा की जाए। सेठ और सेठानी साधु के निकट बैठ गए। साधु ने जब आंखें खोलीं तो उन्हें ज्ञात हुआ कि सेठ और सेठानी काफी समय से आशीर्वाद की प्रतीक्षा में बैठे हैं।

साधु ने सेठ और सेठानी से कहा कि मैं तुम्हारा दुःख जानता हूं। तुम शनि प्रदोष व्रत करो, इससे तुम्हें संतान सुख प्राप्त होगा। साधु ने सेठ-सेठानी प्रदोष व्रत की विधि भी बताई और शंकर भगवान की निम्न वंदना बताई।
हे रुद्रदेव शिव नमस्कार ।
शिवशंकर जगगुरु नमस्कार ॥
हे नीलकंठ सुर नमस्कार ।
शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार ॥
हे उमाकांत सुधि नमस्कार ।
उग्रत्व रूप मन नमस्कार ॥
ईशान ईश प्रभु नमस्कार ।
विश्‍वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार ॥

दोनों साधु से आशीर्वाद लेकर तीर्थयात्रा के लिए आगे चल पड़े। तीर्थयात्रा से लौटने के बाद सेठ और सेठानी ने मिलकर शनि प्रदोष व्रत किया जिसके प्रभाव से उनके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ और खुशियों से उनका जीवन भर गया।


अन्य प्रचलित कथाएं

पहली प्रदोष व्रत कथा (pradosh vrat katha)

एक बार किसी एक नगर में एक साहूकार था। उसके घर में पैसों की कोई कमी नहीं थी, लेकिन कोई संतान न होने के कारण वह बहुत दुखी रहता था। संतान प्राप्ति के लिए वह हर सोमवार को व्रत रखता था और शिव पूरी भक्ति के साथ मंदिर जाते थे और भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते थे। उसकी भक्ति देखकर एक दिन मां पार्वती प्रसन्न होकर साहूकार की इच्छा पूरी करने के लिए भगवान शिव से अनुरोध किया।

पार्वती जी के आग्रह पर भगवान शिव ने कहा कि हे पार्वती, इस संसार में हर प्राणी को उसके कर्मों का फल मिलता है और जिसके भाग्य में जो हो उसे भोगना ही पड़ता है लेकिन पार्वती जी ने साहूकार की भक्ति देखकर उसकी मनोकामना पूर्ण करने की इच्छा व्यक्त की। माता पार्वती के आग्रह पर शिवजी ने साहूकार को पुत्र-प्राप्ति का वरदान तो दिया लेकिन उन्होंने बताया कि यह बालक 12 वर्ष तक ही जीवित रहेगा।


दूसरी प्रदोष व्रत कथा (pradosh vrat katha)

बहुत प्रसिद्ध अमृत जो किसी को भी हमेशा के लिए जीवित करने की क्षमता रखता था उसे समुद्र मंथन से निकाला गया था। देवता और असुर उस मंथन में शामिल थे, जिसने अमृत के साथ-साथ एक बहुत शक्तिशाली जहर पैदा किया, जो पूरे ब्रह्मांड को नष्ट करने की क्षमता रखता था।

इस जहर को नष्ट करना था लेकिन किसी को भी इसके लिए कोई समाधान नहीं मिला। अंत में, भगवान शिव उनके बचाव में आए और उन्होंने जहर हलाहल पिया। इससे उसके गले में दर्द होने लगा। विष के प्रभाव को शांत करने के लिए, देवी पार्वती ने भगवान शिव के गले में अपना हाथ रखा और उन्हें कष्टों से मुक्त किया।

देवताओं और असुरों ने त्रयोदशी तिथि को भगवान शिव को धन्यवाद दिया। माना जाता है कि भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने नंदी बैल के सींगों के बीच नृत्य किया है। जिस समय शिव अत्यंत प्रसन्न थे वह प्रदोष काल या त्रयोदशी तिथि का गोधूलि काल था। तब से दोनों चंद्र नक्षत्रों की हर त्रयोदशी तिथि 13 वें दिन)को प्रदोष व्रत के रूप में मनाया जाता है।

Leave a Comment

Shares