भगवान विष्णु की पांच प्रसिद्ध कथाएं | vishnu bhagwan ki katha

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भगवान विष्णु की पहली कथा (vishnu bhagwan ki katha)

एक बार भृगु ऋषि ने जानना चाहा कि ब्रह्मा ,विष्णु और महेश में कौन सबसे श्रेष्ठ है ? वह बारी-बारी से सबके पास गये । ब्रह्मा और महेश ने भृगु को पहचाना तक नही , न ही आदर किया । इसके बाद भृगु विष्णु के यहा गये । विष्णु भगवान विश्राम कर रहे थे और माता लक्ष्मी उनके पैर दबा रही थी ।

भृगु ने पहुचते ही न कुछ कहा , न सुना और भगवान विष्णु की छाती पर पैर से प्रहार कर दिया । लक्ष्मी जी यह सब देखकर चकित रह गयी किन्तु विष्णु भगवान ने भृगु का पैर पकडकर विनीत भाव से कहा ” मुनिवर ! आपके कोमल पैर में चोट लगी होगी । इसके लिए क्षमा करे “।

लक्ष्मी जी को भगवान विष्णु की इस विन्रमता पर बड़ा क्रोध आया । वह भगवान विष्णु से नाराज होकर भू-लोक में आ गयी तथा कोल्हापुर में रहने लगी । लक्ष्मी जी के चले जाने से विष्णु भगवान को लगा कि उनका श्री और वैभव ही नष्ट हो गया और उनका मन बड़ा अशांत रहने लगा ।

लक्ष्मी जी को ढूढने के लिए वह श्रीनिवास के नाम से भू-लोक आये । घूमते घुमाते वेंकटचल पर्वत क्षेत्र में बकुलामाई के आश्रम में पहुचे । बकुलामाई ने उनकी बड़ी आवाभगत की । उन्हें आश्रम में ही रहने को कहा ।

एक दिन जंगल में एक मतवाला हाथी आ गया । आश्रमवासी डरकर इधर उधर भागने लगे । श्री निवास ने यह देखा तो धनुष बाण लेकर हाथी का पीछा किया । हाथी डरकर भागा और घने जंगल में अदृश्य हो गया । श्री निवास उसका पीछा करते करते थक गये थे ।

वह एक सरोवर के किनारे वृक्ष की छाया में लेट गये और उन्हें हल्की सी झपकी आ गयी । थोड़ी देर में शोर सुनकर वह जागे तो देखा कि चार -छ युवतिया उन्हें घेरे खडी है । श्रीनिवास को जागा हुआ देखकर वे डपटकर बोली “यह हमारी राजकुमारी पद्मावती का सुरक्षित उपवन है और यहा पुरुषो का आना मना है । तुम यहा कैसे और क्यों आये हो ?”।

श्रीनिवास कुछ जवाब दे इससे पहले ही उनकी दृष्टी वृक्ष की ओट से झांकती राजकुमारी की ओर गयी । श्रीनिवास पद्मावती को एकटक देखते रह गये । थोडा संयत होकर कहा “देवियों ! मुझे पता नही था , मै शिकार का पीछा करता हुआ यहाँ आया था ।

थक जाने पर मुझे नींद आ गयी इसलिए क्षमा करे “। श्रीनिवास आश्रम में तो लौट आये किन्तु बड़े उदास रहने लगे । एक दिन बकुलामाई ने बड़े प्यार से उनकी उदासी का कारण पूछा तो श्रीनिवास ने पद्मावती से भेंट होने की सारी कहानी कह सुनाई फिर कहा “उसके बिना मै नही रह सकता “

बकुलामाई बोली “ऐसा सपना मत देखो । कहा वह प्रतापी चोल नरेश आकाशराज की बेटी और कहा तुम आश्रम में पलने वाले एक कुल गोत्रहीन युवक । ” श्रीनिवास बोले “माँ ! एक उपाय है तुम मेरा साथ दो तो सब सम्भव है “। बकुलामाई ने श्रीनिवास का सच्चा प्यार देखकर हा कर दी । श्रीनिवास ज्योतिष जानने वाली औरत का वेश बनाकर राजा आकाश की राजधानी नारायणपुर पहुचे । उसकी चर्चा सुन पद्मावती ने भी उस औरत को महल बुलाकर अपना हाथ दिखाया।

राजकुमारी के हस्त रेखा देखकर वह बोली “राजकुमारी ! कुछ दिन पहले तुम्हारी भेंट तुम्हारे सुरक्षित उद्यान में किसी युवक से हुयी थी । तुम दोनों की दृष्टि मिली थी । उसी युवक से तुम्हारी शादी का योग बनता है । ”

पद्मावती की माँ धरणा देवी ने पूछा “यह कैसे हो सकता है ?”

ज्योतिषी औरत बोली “ऐसा ही योग है । ग्रह कहते है कोई औरत अपने बेटे के लिए आपकी बेटी मांगने स्वयं आयेगी ”

दो दिन बाद सचमुच ही बकुलामाई एक तपस्विनी के वेश में राजमहल आयी । उसने अपने युवा बेटे के साथ पद्मावती के विवाह की चर्चा की । राजा आकाश में बकुलामाई को पहचान लिया । उन्होंने पूछा “वह युवक है कौन ? ”

बकुलामाई बोली “उसका नाम श्री निवास है । वह चन्द्र वंश में पैदा हुआ है । मेरे आश्रम में रह रहा है । मुझे माँ की तरह मानता है ”

राजा आकाश ने कुछ सोचकर उत्तर देने के लिए कहा । बकुलामाई के चले जाने पर आकाश ने राज पुरोहित को बुलाकर सारी बात बताई । राज पुरोहित ने गणना की । फिर सहमति देते हुए कहा ” महाराज ! श्रीनिवास में विष्णु जैसा देवगुण है लक्ष्मी जैसी आपकी बेटी के लिए यह बड़ा सुयोग्य है ”

राजा आकाश ने तुरंत बकुलामाई के यहा अपनी स्वीकृति के साथ विवाह की लग्न पत्रिका भेज दी । बकुलामाई ने सुना तो वह चिंतित हो उठी । श्री निवास से बोली “बेटा ! अब तक तो विवाह की ही चिंता थी । अब पैसे न होने की चिंता है । मै वराहस्वामी के पास जाती हु । उनसे पूछती हु कि क्या किया जाए ?”

बकुलामाई श्रीनिवास को लेकर वराह्स्वमी के पास गयी और श्रीनिवास के विवाह के लिए धन की समस्या बताई तो वराह स्वामी ने आठो दिग्पालो ,इंद्र ,कुबेर ,ब्रह्मा , शंकर आदि देवताओ को अपने आश्रम में बुलवाया और फिर श्रीनिवास को बुलाकर कहा “तुम स्वयम इन्हे अपनी समस्या बताओ । ”

श्रीनिवास ने देवताओ से कहा “मै चोल नरेश राजा आकाश की बेटी पद्मावती से विवाह करना चाहता हु । मेरी हैसियत राजा के अनुरूप नही है मेरे पास धन नही है , मै क्या करू ?”

इंद्र ने कुबेर से कहा “कुबेर ! इस काम के लिए तुम श्रीनिवासन को ऋण दे दो ”

कुबेर ने कहा “ऋण तो दे दूंगा पर उसे यह वापस कब और कैसे करेंगे , इसका निर्णय होना चाहिये ?”

श्रीनिवास बोले “इसकी चिंता मत कीजिये । कलियुग के अंत तक मै सब ऋण चूका दूंगा ”

कुबेर ने स्वीकार कर लिया । सब देवताओ की साक्षी में श्रीनिवास के ऋण पत्र लिख दिया । उस धन से श्री निवास और पद्मावती का विवाह बड़ी धूमधाम से हुआ । तभी नारद ने कोल्हापुर जाकर लक्ष्मी को बताया “विष्णु ने श्रीनिवास के रूप में पद्मावती से विवाह कर लिया है । दोनों वेंकटाचलम् पर्वत पर रह रहे है । ”

यह सुनकर लक्ष्मी जी को बड़ा दुःख हुआ । वह सीधे वेंकटाचलम पहुची । विष्णु जी की सेवाम एम् लगी पद्मावती को भला बुरा कहने लगी “श्रीनिवास ! विष्णु रूप मेरे पति है । तूने इनके साथ विवाह क्यों किया ?”

दोनों ने वाक् युद्ध होने लगा तो श्री निवास को बड़ा दुःख हुआ । वे पीछे हटे और पत्थर की मूर्ति के रूप में बदल गये । जब दोनों देवियों ने यह देखा तो उन्हें बड़ा दुःख हुआ कि श्रीनिवास तो अब किसी के न रहे ।

इतने में शिला विग्रह से आवाज आयी “देवियों मै इस स्थान पर वेंकटेश्वर स्वामी के नाम से , अपने भक्तो का अभीष्ट पूरा करता रहूँगा । उनसे प्राप्त चढावे के धन द्वारा कुबेर के कर्ज का ब्याज चुकाता रहूँगा इसलिए तुम दोनों मेरे लिए आपस में झगड़ा मत करो ”

यह वाणी सुनते ही लक्ष्मी जी और पद्मावती दोनों ने सिर झुका लिया । लक्ष्मी कोल्हापुर आकर महालक्ष्मी के रूप में प्रतिष्टित हो गयी और पद्मावती तिरुनाचुर में शिला विग्रह हो गयी । आज भी तिरुपति क्षेत्र में तिरुमला पहाडी पर भगवान वेंकटेश्वर स्वामी के दर्शन हेतु भक्तगणों से इसी भाव से शुल्क लिया जाता है । उनकी पूजा पुष्प मिष्टान आदि से न होकर धन द्रव्य से होती है । इसी धन से भगवान श्री कृष्ण वेंकटेश्वर स्वामी कुबेर का कर्ज चूका रहे है ।


भगवान विष्णु की दूसरी कथा (vishnu bhagwan ki katha)

एक शहर में एक बहुत बड़ा साहूकार रहा करता था। साहूकार बहुत ही ईमानदार और दानवीर था। साहूकार जहाजों में अपने माल को दूसरे देश में बेचकर पैसे कमाता था और यही कर करके उस साहूकार ने बहुत सारा धन एकत्र कर लिया था और जितना उसने धन कमाया था, उसे थोड़ा धन दान में दिया करता था।

लेकिन साहूकार का विवाह जिस स्त्री से हुआ था, वह साहूकार से बहुत विपरीत थी। साहूकार को दान देना बहुत पसंद था लेकिन साहूकार की पत्नी बहुत ही कंजूस थी। वह एक रुपया भी किसी को नहीं दिया करती थी। कुछ समय पश्चात जब साहूकार अपने व्यापार के सिलसिले से दूसरे देश गया था तब साहूकार के घर पर बृहस्पति देव साधु का रूप लेकर भिक्षा मांगने के लिए साहूकार की पत्नी के पास गए।

साहूकार की पत्नी से भिक्षा मांगने लगे साहूकार की पत्नी ने बृहस्पति देव से कहा कि हे, ब्राह्मण में दान दे दे कर बहुत थक चुकी हूं और मुझसे अब यह नहीं किया जाता है।आप मुझे कोई ऐसा उपाय बताएं जिससे मेरा सारा धन बर्बाद हो जाए और मैं खुशी-खुशी अपना जीवन व्यतीत कर सकूं।

बृहस्पति देव साहूकार की पत्नी की बात सुनकर साहूकार की पत्नी से बोले, तुम तो बहुत ही विचित्र कन्या हो। तुम्हारे पास तो इतना सारा धन है। उसके बाद भी तुम इस धन से दुखी हो। अगर तुम्हारे पास कुछ ज्यादा ही धन आ गया है तो, तुम उनको नेक कामों में लगाओ। तुम तुम कुंवारी कन्याओं का विवाह करवाओ। बच्चों के लिए विद्यालय खुलवाओ और बड़े-बड़े बाग बगीचे खुलवाओ, जिससे तुम्हें ऐसा करने से स्वर्ग की प्राप्ति हो सकती है।

लेकिन साहूकार की पत्नी तो निहायती कंजूस थी। उसने बृहस्पति देव की बात को अस्वीकार दिया और कहने लगी मैं अपना धन किसी को नहीं दूंगी।

बृहस्पति देव ने साहूकार की पत्नी से कहा कि अगर तुम्हारी यही मनोकामना है, तो तुम एक काम करना तुम साथ बृहस्पतिवार को अपने घर को गोबर से लीपना। अपने बालों को पीली मिट्टी से धोना और बाल धोते समय स्नान करना। साहूकार से अपनी हजामत करवाना और अपने घर में मांस का सेवन करना और अपने कपड़े धोना ऐसा करने से तुम्हारा सारा धन समाप्त हो जाएगा और तुम अपना जीवन खुशी खुशी व्यतीत कर पाओगी।

साहूकार की पत्नी ने बृहस्पति देव की बात मान कर सारे कार्य करने लगी जो जो बृहस्पति देव ने साहूकार की पत्नी से करने के लिए कहे थे। जैसे ही मात्र तीन गुरुवार ही हुए थे साहूकार के पास सारा धन समाप्त हो गया और तीन दिन में ही साहूकार की पत्नी मर गई। जब साहूकार दूसरे देश से वापस अपने घर आया तब उसने देखा कि उसके घर में तो सब कुछ बर्बाद हो चुका है। उसके पास एक भी रुपए नहीं बचे हैं और उसके बच्चे बहुत जोर से रो रहे हैं। उसकी पत्नी भी मर चुकी है।

तब साहूकार ने अपने बच्चों से कहा कि तुम चिंता मत करो। हम लोग दूसरे देश पर रहेंगे जाकर वहां अपना जीवन यापन करेंगे। साहूकार अपने बच्चों को लेकर एक दूसरे शहर चला गया।

वहां पर वह रोजाना लकड़ी काटकर बाजार में जाकर बेचता और उससे कुछ धन कमाकर घर लेकर आता और ऐसा करते-करते अपना जीवन व्यतीत करने लगा। एक दिन जब साहूकार लकड़ियां काटकर अपने घर गया तो, उसके बच्चों ने कहा कि पिताजी मुझे दही खाने का बहुत मन कर रहा है। आप मेरे लिए दही ले आइए लेकिन साहूकार के पास तो दही खरीदने के लिए भी पैसे नहीं थे।

लेकिन साहूकार ने अपने बच्चों से कहा कि तुम चिंता मत करो। मैं तुम्हारे लिए दही लाऊंगा और ऐसा कह कर वहां से चला गया। साहूकार थोड़ी दूर जाने के पश्चात एक पेड़ के नीचे बैठ गया और वहां पर जोर जोर से रोने लगा और अपनी दशा पर विचार करने लगा।

तभी वहां पर बृहस्पति देव एक साधु का वेश लेकर आए और साहूकार से कहने लगे तुम क्यों रो रहे हो? तब साहूकार ने कहा कि ब्राह्मण देव आप को तो सब पता है और ब्राह्मण को अपनी सारी कहानी बता दी।

जिसके बाद बृहस्पति देव ने साहूकार से कहा कि यह सब तुम्हारी पत्नी ने किया था। तुम्हारी पत्नी ने बृहस्पति देव का अपमान किया था, जिसके कारण तुम्हारा सारा धन नष्ट हो गया है और तुमको ऐसे कष्ट भोगने पड़ रहे हैं लेकिन तुम चिंता मत करो।

मैं तुमको एक उपाय बता रहा हूं जिसको करने से तुम्हारे जीवन फिर से सही हो जाएगा। तब साहूकार ने ब्राह्मण से कहा कि आप मुझे बताइए कि मुझे क्या करना है? ब्राह्मण ने बताया कि तुम गुरुवार के दिन बृहस्पति देव की पूजा पाठ कर दो। पैसों की गुड़ और चने लाकर और एक लोटे में जल भरकर उसमें शक्कर डालकर प्रसाद बना लो और उस प्रसाद को बृहस्पति देव का पाठ करने के बाद सभी में बांट दो और खुद भी उस प्रसाद को ग्रहण कर लो। ऐसा करने से तुम्हारे सारे कष्ट दूर हो जाएंगे।

लेकिन तब साहूकार ने ब्राह्मण से कहा कि ब्राह्मण देव मेरे पास तो इतने रुपए भी नहीं है कि मैं अपने बच्चों को दही खिला सकूं, तो मैं यह पूजा की सामग्री कहां से लाऊंगा?तब ब्राह्मण ने कहा कि तुम चिंता मत करो। तुम अपनी लकड़ियां काटकर शहर में जाकर बेचो। जिससे तुम्हें पहले से कई गुना ज्यादा पैसे मिलेंगे। तुम उन पैसों से सब कुछ कर सकते हो।

जिसके बाद साहूकार ने ब्राह्मण देव की बात मानकर लकड़ियां काटने के लिए निकाला गया। लकड़ियां काटकर साहूकार बाजार में जाकर लकड़ियों को चौगुनी दामों पर भेज दिया और दही लेकर अपने घर चला गया। फिर साहूकार ने गुरुवार के दिन गुड़ और चना खरीद कर बृहस्पति देव की पूजा की और उनकी कथा सुनी तथा प्रसाद को सभी को बांटा लेकिन अगले ही गुरुवार को साहूकार बृहस्पति देव की पूजा पाठ करना भूल गया।

जिससे बृहस्पति देव साहूकार से बहुत नाराज हो गए। एक दिन शहर के राजा ने अपने महल में एक बहुत बड़े यज्ञ का आयोजन किया था और उसके लिए शहर के सभी लोगों को भोजन पर आमंत्रित किया था। सभी लोग राजा के यहां भोजन करके समय से चले गए थे लेकिन साहूकार और उसकी बेटी राजा के घर देरी से पहुंचे तो राजा ने साहूकार और उसकी बेटी को अपने महल के अंदर ले जाकर भोजन ग्रहण करवाया।

उसी समय अचानक से रानी का हार कहीं खो गया था तो, रानी को पूरा शक साहूकार और उसकी बेटी पर हुआ जिसके लिए रानी ने राजा से कहा कि यह साहूकार और उसकी बेटी ने मेरा हर चुराया है।

राजा ने साहूकार और उसकी बेटी को जेल में बंद करवा दियाने साहूकार और उसकी बेटी जेल में बंद होकर बहुत रोने लगे और तभी साहूकार ने बृहस्पति देव का आवाहन कियाने बृहस्पति देव साहूकार के आवाहन करते वहां प्रकट हो गए और उन्होंने साहूकार को बताया कि तुमने यह गलती की थी जिसकी वजह से तुमको यह सब भोगना पड़ता है।

बृहस्पति देव ने कहा कि तुम्हें जेल के बाहर दरवाजे पर दो रुपए पड़े मिलेंगे, जिससे तुम किसी से भी गुड और मुनक्का मंगवा कर बृहस्पति देव की पूजा करना। जिसे सब कुछ ठीक हो जाएगा, ऐसा कहकर बृहस्पति देव वहां से अंतर्ध्यान हो गए।

और उनके कहे अनुसार साहूकार को दरवाजे पर दो रुपए पड़े मिले। जिससे उसने जेल के बाहर जा रही महिला से कहा कि तुम मेरे लिए और मुनक्का ला सकती हो। मुझे बृहस्पति देव की पूजा करनी है लेकिन उस महिला ने मना कर दिया और कहने लगी कि मैं अपनी बहू के लिए गहने लेने जा रही हूं। मेरे पास अभी समय नहीं है और ऐसा कहकर वह स्त्री वहां से चली गई, जिसके बाद एक दूसरी महिला वहां से जा रही थी ।

साहूकार ने उस महिला से कहा कि तुम मेरे लिए गुड़ और चना सकती हो। मुझे बृहस्पति देव की पूजा करनी है। उस महिला ने साहूकार से कहा कि मैं अपने पुत्र के लिए कफन लेने जा रही थी लेकिन मैं तुम्हारा यह काम अवश्य करूंगी।

जिसके बाद वह महिला साहूकार से पैसे लेकर साहूकार के लिए गुड़ और चना लेने के लिए बाजार चली गई। गुड़ चना लेकर जब वह महिला साहूकार के पास आई तो साहूकार ने बृहस्पति देव की पूजा करना शुरू कर दिया और कथा कहना शुरू कर दिया। उस महिला ने भी बृहस्पति देव की कथा सुनी और कथा समाप्त होने के बाद साहूकार ने सभी को प्रसाद दिया। प्रसाद ले करवाई महिला अपने मरे हुए बेटे के पास जाने लगी। वहां पर सभी लोग उसके बेटे को श्मशान ले जाने के लिए तैयार थे।

तभी उस महिला ने साहूकार के दिए हुए प्रसाद को अपने बेटे के मुंह में डाल दिया, जिसके बाद उस महिला का मरा हुआ बेटा पुनः जीवित हो गया और पहली महिला जिसने बृहस्पति देव का अपमान किया था और उसने पूजा के लिए सामग्री लाने से मना कर दिया था, उसका बेटा जब घोड़ी पर बैठकर जा रहा था। तब घोड़ी ने एकदम से उछाल मारी और बेटे को जमीन में गिरा दिया और वह जमीन में गिरते ही मर गया। जिसके बाद महिला जोर जोर से रोने लगी और उसको भी अपनी गलती का आभास हो गया।

उसने तुरंत जेल में वापस जाकर साहूकार के साथ बृहस्पति देव पूजा की और साहूकार ने पूजा के बाद उस महिला को प्रसाद दिया। उसने प्रसाद को अपने बेटे के मुंह पर डाल दिया तो प्रसाद को खाकर उसका बेटा तुरंत जीवित हो गया।

एक दिन बृहस्पति देव राजा के सपने में आए और कहने लगे तुमने जिन साहूकार और उसकी पुत्री को जेल में बंद किया है वह निर्दोष है। उनको तुरंत छोड़ दो जिसके बाद राजा ने साहूकार और उसकी पुत्री को जेल से रिहा कर दिया और बृहस्पति देव की पूजा करने से साहूकार की सारी कठिनाइयां दूर हो गई। वह दोबारा से अमीर हो गया और खुशी-खुशी अपना जीवन व्यतीत करने लगा।

दोस्तों उम्मीद करते हैं आपको यह कहानी रोचक लगी होगी। ऐसे बहुत ही कहानियां है जो हमारी वेबसाइट में उपलब्ध हैं आप इन्हें पढ़ सकते हैं और अपने बच्चों आदि को पढ़ा कर उनका मनोरंजन करवा सकते हैं और इस कहानी को साझा कर हमारा हौसला अफजाई कर सकते हैं और कहानी से संबंधित यदि कोई भी प्रश्न है आपका तो, आप कमेंट बॉक्स के माध्यम से पूछ सकते हैं।


भगवान विष्णु की तीसरी कथा (vishnu bhagwan ki katha)

विष्णु ब्रह्मांड के रक्षक मानी जाती है। ब्रह्मा, विष्णु और शिव, मिलकर त्रिदेव कहलाते हैं। भगवान विष्णु को चार भुजाओं वाला और गुलाब कमल पर आसीन दिखाया जाता है। उनके एक हाथ में शंख रहता है जो पवित्र ध्वनि ‘ओम’का प्रतीक है। उनके दूसरे हाथ में सुदर्शन चक्र रहता है, जो समय के चक्र तथा नेक जीवन जीने की याद दिलाता है। तीसरे हाथ में कमल रहता है, जो गौरवशाली अस्तित्व का सूचक है। उनके चौथे हाथ में गदा रहती है।

बहुत तेज गति से उड़ने वाला गरुड़ उनका वाहन है। उन्हें अधिकतर अपने निवास क्षीरसागर मैं कुंडली मारे शेषनाग पर आराम करते दिखाया जाता है। देवी लक्ष्मी उनकी पत्नी है।

माना जाता है कि विष्णु के दस अवतार हैं, जिनमें सबसे अधिक लोकप्रिय राम और कृष्ण हुए हैं। विष्णु को अपना दसवां अवतार अभी लेना है। उनका दसवां अवतार तब होगा, जब दुनिया में अधर्म पूरी तरह से बढ़ जाएगा।


भगवान विष्णु की चौथी कथा (vishnu bhagwan ki katha)

एक बार दुर्वासा ऋषि ने इंद्र को हार भेंट किया।  इंद्र ने हार पर  विशेष ध्यान नहीं दिया। और अपने हाथी एरावत के दांत पर उसे रख दिया। एरावत ने उसे नीचे गिरा दिया। यह देख कर दुर्वासा क्रोधित हो गए। दुर्वासा ने इंद्र और सभी देवताओं को सारी शक्ति को देने का श्राप दे दिया।

श्राप के कारण इंद्र और अन्य देवता अपनी शक्ति खो बैठे और असुरों के साथ युद्ध में हारने लगे। बाली के नेतृत्व में असुरों ने पूरे ब्रह्मांड पर अधिकार कर लिया। जब कोई रास्ता नहीं बचा तो इंद्र ने विष्णु से सहायता मांगी।

विष्णु ने  देवताओं को उनकी शक्ति वापस दिलाने की एक योजना बनाई।  उन्होंने देवताओं से समुद्र मंथन करके अमृत निकालने को कहा, जिसे पीकर में अमर हो सकते थे और अपनी शक्ति वापस पा सकते थे।

देवता तो शक्तिहीन हो चुके थे,  इसलिए समुद्र मंथन के लिए उन्होंने असुरों से सहायता मांगी। देवताओं और असुरों ने मिलकर समुद्र मंथन शुरू किया। विशाल पर्वत मंदराचल को मछली बना कर मंथन किया जाने लगा, लेकिन भारी पर्वत समुद्र में डूबने लगा। पर्वत को डूबने से बचाने के लिए विष्णु ने कछुए का रूप रख लिया और पर्वत को अपनी पीठ पर रख लिया।   विष्णु के कछुए के रूप में आने को ही उनका दूसरा अवतार “कूर्म अवतार” कहां जाता है।

मंदराचल को थामने के लिए सहारा मिल गया तो विशाल नाम वासुकी को रस्सी की तरह लपेट कर मंथन शुरू किया गया। एक और से देवता और दूसरी ओर से असुर नाक को खींचने लगे।

समुंद्र मंथन शुरू हुआ तो भारी लहरें उठने लगी। उससे बहुत तीव्र विश “हलाहल” भी निकला।

देवता डर गए क्योंकि नीला विश पूरे विश्व को नष्ट कर सकता था।

वे सब मिलकर शिव जी भगवान से रक्षा की विनती करने लगे। शिव जी ने प्रकट होकर सारे विश को पीलिया। इस विश  को उन्होंने गले से नीचे नहीं उतारा, बल्कि गले में ही रोक लिया। तभी से उनका गला नीला हो गया और वे नीलकंठ कहलाने लगे।

मंथन शुरू हुआ तो समुद्र से बहुत सारे रतन, आभूषण और उपहार निकलने लगे। इच्छा पूरी करने वाली गाय कामधेनु; धन की देवी लक्ष्मी;  इच्छा पूरी करने वाला पेड़ कल्पवृक्ष; और अंत में हाथों में अमृत कलश और आयुर्वेद लिए धनवंतरी निकले।

अमृत बाहर आते ही असुरों ने कलर्स छीन लिया। देवता और असुरों के बीच भीषण युद्ध हुआ। अंत में, विष्णु ने सुंदर युवती मोहिनी का रूप धारण करके असुरों को ललचाया और उनसे अमृत छीन लिया। असुरों से अमृतसर विष्णु ने अपने पंखों वाले सारथी गरुड़ को दे दिया। गरुड़ ने जब कलश थामा तो कुछ अमृत छलक पड़ा। इससे अमृत की कुछ बूंदें उज्जैन, नासिक, इलाहाबाद और हरिद्वार में गिरी। कहते हैं कि इन बूंदों से भूमि पवित्र हो गई और हर साल कुंभ मेले में श्रद्धालु इन शहरों में आकर अपने पाप धोते हैं।

देवता अमृत पाकर अमर हो गए। हालाकी कुछ  अतुल भी अमृत की बूंदें  चखने में सफल हो गए थे, इसलिए  वे  भी अमर हो गए। दो असुर, राहु और केतु अपना वेश बदलकर देवताओं के बीच बैठ गए। सूर्य और चंद्रमा ने उन्हें पहचान लिया और विष्णु से उनकी शिकायत कर दी। विष्णु ने सुदर्शन चक्र से उनके सिर काट दिए। तब तक  अमृत उनके गले के नीचे नहीं उतर पाया था।  इसलिए  उनके सिर तो अमर हो गए लेकिन शेष धर मर गया। इसी का बदला लेने के लिए राहु और केतु हर साल सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहण के दौरान सूर्य और चंद्रमा को निकल लेते हैं।


भगवान विष्णु की पाँचवी कथा (vishnu bhagwan ki katha)

पौराणिक कथाओं में त्रिदेव यानी ब्रह्मा, विष्णु और महेश का जिक्र मिलता है। ब्रह्माजी को सृष्टि का रचयिता माना जाता है। वहीं, विष्णुजी को जगत का पालनहार और महेश यानी शिवजी को संहारक माना जाता है। शिव को असुर और अधर्मियों का वध करने के लिए जाना जाता है। एक बार भगवान विष्णु को इस असुरों का वध करने के लिए एक दिव्य अस्त्र की जरूरत पड़ी, तो उन्होंने शिव की तपस्या शुरू की। विष्णु ने तपस्या के दौरान शिव को अपने नेत्र यानी अपनी एक आंख भेंट कर दी। शिव इससे प्रसन्न हुए और विष्णु को सुदर्शन चक्र भेंट किया। पढ़ें ये रोचक पौराणिक कहानी।

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार एक बार धरती पर राक्षसों का अत्याचार बढ़ गया। असुरों की दृष्टि स्वर्ग पर अधिकार जमाने पर टिकी थी। इससे भयभीत होकर स्वर्ग के सभी देव विष्णुजी के पास पहुंचे। उन्होंने धरती और स्वर्ग लोक को राक्षसों से मुक्त करने की गुहार लगाई। विष्णुजी को पता था कि इसका समाधान शिव के पास है।

भगवान विष्णु ने शिव की तपस्या आरंभ की। वे शिवजी के हजार नाम जपते और हर नाम के साथ एक कमल का फूल चढ़ाते। शिवजी ने विष्णुजी की परीक्षा लेनी चाही। वे विष्णुजी के समक्ष पहुंचे और चुपके  से एक कमल का फूल चुरा लिया। विष्णु जी अपनी तपस्या में लीन थे, उन्हें इस बात का पता नहीं चला। जब उन्होंने आखिरी नाम जपा, तो उनके पास कमल का फूल नहीं था। अगर वे फूल नहीं चढ़ाते तो उनकी पूरी तपस्या भंग हो जाती।

विष्णुजी ने तुरंत अपनी एक आंख निकाली और शिवजी को अर्पित कर दी। शिव विष्णुजी की तपस्या से प्रसन्न हुए और उनसे वरदान मांगने को कहा। तब विष्णुजी ने राक्षसों के संहार के लिए एक अचूक शस्त्र मांगा। शिवजी ने उन्हें सुदर्शन चक्र दिया, जिसका वार कभी खाली नहीं जाता था। इसके बाद विष्णुजी ने सुदर्शन चक्र से अत्यंत खूंखार राक्षसों सो मार गिराया और इस धरती को अधर्मियों के प्रकोप से बचाया।

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