2.1 साधु और चूहे की कहानी (panchatantra stories in hindi language)

एक नगर में बहुत पुराना शिव का मंदिर था। उसमे एक सन्यासी रहा करता था जो दिन में भिक्षा मांग कर अपना गुजरा करता था। भीख मांगने के बाद उसके पास बहुत खान पान की चीजें इकठ्ठा हो जाती थी जिसे वह भिक्षा पात्र में रख कर मंदिर में एक ऊँचे घूंट पर लटका देता था जिससे कोई चुरा न सके। वह भिक्षा में दी गयी चीज़ों से मंदिर में मजदूरों से साफ सफाई करवाता था और मजदूरी के तौर पर उन्हें भिक्षा में प्राप्त चीज़ें देता और खुद भी खाता था।

उसी मंदिर में एक चूहा भी रहता था जो ऊँचे खूंटे से लटकी हुई भिक्षा की चीजों को चुरा लेता था। सन्यासी उस चूहे से बहुत दुखी था। एक दिन उस सन्यासी के पास उसका एक पुराना मित्र आया और दिन भर अपने हाल और इधर उधर की बातें एक दूसरे को सुनाने के बाद वह रात को सोने के लिए लेट गए। वह सन्यासी चूहे से अपनी भिक्षा की चीजों को बचने के लिए सोते सोते भिक्षा पात्र को एक डंडे से हिलाता रहता था। सन्यासी का मित्र उससे बाते कर रहा था पर वह उस चूहे के ध्यान में और डंडे से भिक्षा पात्र हिलता हुआ यह जानने के कोशिश करता कि आखिर वो चूहा कैसे इतनी ऊंचाई से मेरी भिक्षा की चीजों को चोरी कर लेता है।

इस कारण वह उसकी बातों पर ध्यान नहीं दे रहा था।  सन्यासी का मित्र बोला-  “तू मेरा सच्चा मित्र नहीं है क्योंकि तू मेरी बातों का जवाब नहीं देता इसलिए मैं किसी दूसरे मंदिर में जा रहा हूँ।” इस पर ब्राह्मण कहता है – “अरे मित्र नहीं, मेरा तुम्हारे सिवा कोई नहीं है। मैं तुम्हारी बातों पर ध्यान इसलिए नहीं दे पा रहा हूँ, क्योंकि एक दुष्ट चूहा मेरे भिक्षा पात्र में से चीज़ों की चोरी कर लेता है और मैं समझ नहीं पा रहा कि वो चूहा कैसे इतनी ऊँची झलांग लगा कर भिक्षा पात्र में घुस जाता है।”  सन्यासी के मित्र ने कहा – “हम कल उस चूहे के बिल को ढूंढेंगे।” दोनों उसके बिल को ढूंढ़ते हैं और उन्हें बिल मिल जाता है।

वो दोनों बिल खोदकर देखते हैं तो उन्हें उसके बिल में बहुत सारा भोजन मिलता हैं जो उस चूहे ने इक्कठा कर लिया था और चूहे कि पूरी जिंदगी खाने पर भी वह खत्म न हो।  इस पर सन्यासी ने कहा – इस चूहे के अंदर इतना सारा आत्मविश्वाश इस भोजन के कारण  भर गया है और तभी यह इतनी ऊँची झलांग लगा पाता है। अगर हम इस भोजन को यहाँ से उठा ले तो अवश्य ही यह देखकर चूहे को झटका लगेगा और  उसका आत्मविश्वाश टूट जायेगा जिसके कारन वह झलांग नहीं लगा पायेगा।  सन्यासी और उसके मित्र ने ऐसा ही किया दोनों ने चूहे द्वारा इक्कठा किया भोजन बिल से निकाल दिया। जब चूहा अपने बिल में वापिस लोटा तो वह भोजन वहां न पाकर बहुत दुखी हुआ और जब दुबारा सन्यासी के भिक्षा पात्र में से चीजें उठाने के लिए गया तब उससे ऊँची झलांग नहीं लगाई जा रही थी जिससे यह स्पष्ट हो गया कि वह आत्मविश्वास होने के कारन ही इतनी ऊँची झलांग लगा पाता था कि खूंटे से टंगे भिक्षा पात्र तक पहुंच सके। 

शिक्षा 

संसाधन और अधिक धन होने पर आत्मविश्वाश में कभी कमी नहीं आती लेकिन अगर हमारे पास धन या संसाधन नहीं हैं तो आत्मविश्वाश टूट जाता है। 

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