बुद्ध पूर्णिमा या बुद्ध जयंती की पूरी जानकारी | buddha purnima in hindi.

 

 buddha purnima in hindi.

महात्मा बुद्ध का जन्म 

भारत में मनाए जाने वाले प्रसिद्ध त्योहारों में बुद्ध पूर्णिमा बड़ा महत्वपूर्ण पर्व माना जाता आज से लगभग अढाई हजार वर्ष पूर्व वैशाख मास की पूर्णिमा को कपिलवस्तु में राजा शाला घर महात्मा बुद्ध का जन्म हुआ। उनकी माता का नाम महामाया था। राजा ने पुत्र का नाम सिद्धार्थ रखा।

 

 

(बुद्ध पूर्णिमा या बुद्ध जयंती क्यों मनाई जाती है)

यही सिद्धार्थ आगे चलकर महात्मा बुद्ध के नाम से प्रसिद्ध हुए। यह संयोग ही था कि महात्मा बुद्ध न केवल वैशाख पूर्णिमा को अवतरित हुए, प्रत्युत वैशाख पूर्णिमा के दिन ही उन्हें बुद्धत्व प्राप्त हुआ तथा इसी दिन उन्होंने स्वर्गारोहण किया। इसलिए महात्मा बुद्ध की पवित्र स्मति से कर होने के कारण वैशाख मास की पूर्णिमा बुद्ध पूर्णिमा के नाम से प्रसिद्ध है।

 

 

(गौतम बुद्ध कैसे बने)

 

सिद्धार्थ के जन्म के समय एक ज्योतिषी ने भविष्यवाणी करते हुए राजा शुद्धोदन से कहा था- “आपका पुत्र जन्म, मृत्यु और बुढ़ापे के दु:ख को देखकर संसार से विरक्त हो जाएगा, किन्त दु:ख का दृश्य न देखने पर वह चक्रवर्ती सम्राट् बन सकता है।

 

” राजा भविष्य में अपने पुत्र के संसार से विरक्त होने की बात सुनकर बहुत चिंतित हुए। अस्तु उन्होंने राजमहल के अन्दर ही मनोविनोद के सारे साधन जुटा दिए ताकि राजकुमार महल से बाहर न जा सके।

 

 

(महात्मा बुद्ध का विवाह और पुत्र)

 

यही नहीं, सिद्धार्थ के रहने के लिए, उन्होंने गर्मी, सर्दी और वर्षा ऋतु के अनुकूल तीन महल बनवा दिए। सिद्धार्थ संसार से कहीं विरक्त न हो जाए इसलिए सोलह वर्ष की आयु में उनके पिता राजा शुद्धोदन ने सिद्धार्थ का विवाह यशोधरा से कर दिया

 

राजकुमार महलों में यशोधरा के साथ सुखपूर्वक रहने लगे। कुछ समय बाद यशोधरा ने एक पुत्र को जन्म दिया जिसका नाम राहुल रखा गया।

 

 

(सिद्धार्त बुद्ध क्यों बने)

 
अब तक सिद्धार्थ राज महल के अतिरिक्त बाहरी दुनिया के ज्ञान से वंचित थे। जिस प्रकार सोने के पिंजरे में बंद पक्षी बंधन मुक्त होने के लिए छटपटाता है, ठीक उसी प्रकार सिद्धार्थ की आत्मा महल से बाहर आने के लिए आकुल-व्याकुल हो रही थी।

 

यही नहीं, उनके मन में सांसारिक जीवन को निकट से देखने की प्रबल ललक जाग उठी। अत: एक बार राज कुमार ने अपने पिता से निवेदन किया –

 

“अब मैं और अधिक समय तक बन्दी की तरह राजभवन में नहीं रहना चाहता। मेरे मन में अपनी प्रजा से मिलने की बड़ी इच्छा है जिससे मैं उनके सुख-दु:ख से भली-भांति परिचित हो सकूँ।

 

” राजकुमार के हठ करने पर राजा ने अपने पुत्र को महल से बाहर जाने की आज्ञा दे दी। उन्होंने चार श्वेत घोड़ों का एक सुन्दर रथ तैयार करवाया और सारथि के साथ राजकुमार को घूमने के लिए भेज दिया।

 

सिद्धार्थ अभी थोड़ी ही दूर गए थे कि उन्हें जर्जर शरीर वाला एक अपंग व्यक्ति दिखाई दिया। उसे देखकर उत्सुकतावश राजकुमार ने अपने सारथि से पूछा –

 

“यह व्यक्ति कौन है ?”

 

सारथि ने उत्तर दिया- “महाराज। यह एक बूढ़ा आदमी है। अवस्था अधिक होने के कारण इसका कमर झुक गयी है। दांत गिर गए हैं और बाल सफ़ेद हो गए हैं।

 

” राजकुमार ने फिर पूछा – “क्या सभी लोग इसी तरह बूढ़े होते हैं ?”

 

सारथि बोला – “बुढ़ापा सभी पर आता है।”
 
चलते-चलते मार्ग में उन्हें एक रोगी को देख कर आश्चर्य हुआ।

 

सारथि से पूछने पर पता चला कि संसार के सभी प्राणी कभी न कभी रोगग्रस्त होते ही हैं। यह जानकर उन्हें बहुत क्षोभ हआ

और आगे चलते रहने पर उन्हें एक शव-यात्रा दिखाई दी जिसमें मृतक की अर्थी उठाए हुए लोग प्रमशान की ओर जा रहे थे।
 
विस्मित होकर राजकुमार ने सारथि से पूछा – “यह क्या ?
 
” सारथि बोला- “कमार। ये लोग मृत्यु हो जाने पर एक व्यक्ति के शव को जलाने के लिए श्मशान पर लिए जा रहे हैं।
 
सिद्धार्थ ने प्रश्न किया- “संसार में क्या सभी लोग मरते हैं ?”
 
सारथि ने उत्तर दिया – “हां, इस संसार में जो पैदा हुआ है वह अवश्य मरेगा।”
 
यह सुनकर सिद्धार्थ गम्भीर हो गए और मन ही मन सोचने लगे कि यह संसार तो दु:खों का घर है। मुझे भी इन सभी दु:खों से होकर गुजरना पड़ेगा।
 
अन्त में, उन्हें गेरुए वस्त्र धारण किए एक सन्यासी मिला। साधु के हाथ में भिक्षापात्र था. किन्तु मुखमण्डल पर अनन्त शान्ति व्याप्त थी। उसका तेजोमय चेहरा दिव्य आभा से देदीप्यमान था।
 
“यह कौन है ?” कुमार ने पूछा।
सारथि बोला- “कुमार। यह एक विरक्त सन्यासी है जो सांसारिक दु:खों से मुक्त होने का उपाय खोजने में संलग्न है। सन्यास ही जीवन में मुक्ति के द्वार खोलता है।
सारथि का यह उत्तर सुनकर राजकुमार बड़ा प्रसन्न हुआ। उसने सोचा कि मैं भी सन्यास लेकर मोक्ष प्राप्त करूंगा और लोगों को दु:खों से मुक्ति दिलाऊंगा।
अब सिद्धार्थ के मन में सत्य की खोज करने की भावना बलवती होती गयी। आखिर उन्होंने घर छोड़ने का संकल्प कर लिया। एक दिन अर्ध रात्रि में वे अपनी सोई हुई पत्नी यशोधरा और पुत्र राहुल को छोड़कर ज्ञान प्राप्ति के लिए निकल पड़े।
कहते हैं, घर छोड़ते समय उन्होंने अनन्य प्यार से अपनी पत्नी और पुत्र को निहारा था। यहीं से सिद्धार्थ का नया जीवन प्रारम्भ होता है। इस कालावधि में नियम और संयमपूर्वक जीवन जीकर उन्होंने घोर तपस्या की। विभिन्न दृष्टिकोणों से जीवन और जगत का अध्ययन किया।
परिणामस्वरूप, वे पूर्णता की ओर बढ़ने लगे। अन्ततः गया में बोधि-वृक्ष के नीचे जब वे समाधिस्थ थे तो उन्हें दिव्य प्रकाश दिखाई दिया। अब वे एक पूर्णज्ञानी बुद्ध थे।
गौतम बुद्ध ने अपने ज्ञान का प्रथम प्रवचन वाराणसी के सारनाथ नामक स्थान में दिया।

उन्होंने कहा कि संसार दु:खमय है, और लोग अपनी इच्छाओं एवं लालसाओं के कारण दु:ख पाते हैं।

अपनी कामनाओं को कम करके मनुष्य सुखपूर्वक जीवन जी सकता है। महात्मा बुद्ध मध्यम मार्ग के प्रशंसक थे। उनकी शिक्षा है कि व्यक्ति को न अत्यधिक विलासी होना चाहिए और न ही अधिक संयमी।
पैंतालीस वर्ष तक धर्म प्रचार के लिए विभिन्न स्थानों पर घूमते रहे जिसके परिणामस्वरूप उनके अनुयायियों की संख्या निरन्तर बढ़ती गयी। बुद्ध ने अपने अनुयायी शिष्यों के लिए आचार-संहिता निर्मित की जिसके मुख्य नियम हैं
 

(बुद्ध धर्म के मुख्य नियम)

  • सदा सत्य बोलना
  • प्राणियों की हिंसा न करना।
  • चोरी न करना।
  • ब्रह्मचर्य का पालन करना।
  • धन का संग्रह न करना।
  • नशा न करना।
  • त्यागमय जीवन जीना।

 

ये ही नियम बौद्ध धर्म के प्रमुख सिद्धान्त माने जाते हैं।
अस्सी वर्ष की आयु में 483 ई० पू० कुशीनगर नामक स्थान पर वैशाख-पणि महात्मा बुद्ध ने अपना शरीर त्याग दिया। इतिहास में उनकी मृत्यु को ‘महापरिनिर्वाण‘ कहा
 
प्रतिवर्ष वैशाख मास की पूर्णिमा “बुद्ध-पूर्णिमा” के रूप में मनाई जाती है। के उपदेशों तथा उनके जीवन चरित्र से प्रेरणा लेकर लोग सत्य, अहिंसा और प्रेम के मार्ग की शिक्षा ग्रहण करते हैं।

(बुद्ध पूर्णिमा के दिन ये कार्य जरूर करें। )

 
बुद्ध पूर्णिमा का महत्व पूरी दुनिया में है यह त्यौहार पूरी दुनिया में मनाया जाता है। यह बहुत कम लोग जानते हैं कि भगवान बुद्ध विष्णु का अवतार माने जाते हैं।
  • इस दिन भगवन विष्णु की पूजा जरूर करें। 
  • इस दिन मिट्टी के घड़े का दान जरूर करें।
  • अगर हो सके तो ठंडे पानी का दान भी जरूर करें।
  • किसी भी गरीब या ब्राह्मण को वस्त्र, मिढ़ाई या सत्तू जरूर दान करें।  
  • बुध पूर्णिमा को सत्य नारायण की कथा जरूर सुने इससे आपकी सभी परेशानियां दूर होंगीं। 
  • रात के समय धुप या दिए से चन्द्रमा की पूजा करें। 
 

( क्या ना करें )

 
  • मांसाहार का सेवन न करें और शराब आदि का सेवन भी ना करे। 
  • झूठ ना बोलें। 
  • किसी का दिल न दुखाएं। 
  • माता पिता का दिल न दुखाएं। 

( 2021 में बुद्ध पूर्णिमा कब है )

इस बार बुद्ध पूर्णिमा 26 मई को है।

दिन—  बुधवार (Wednesday)

शुरू — 8: 29  (25 मई 2021 से) 
 
समाप्त — 4:42  (26 मई 2021 तक)

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