Short motivational stories in Hindi (35). प्रेरक कहानियां

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प्रेरक कहानियां पढ़ने के लाभ

कहानी और कथा सुनने-पढ़ने की रुचि मनुष्य में स्वभावतः पाई जाती है। जो शिक्षा या उपदेश निबंध के रूप में पढ़ना और हृदयंगम करना कठिन जान पड़ता है वही कथा-कहानी के रूप में रुचिपूर्वक पढ़ लिया जाता है और समझ में भी आ जाता है। कारण यही है कि निबंध या लेख विवेचनात्मक होते हैं, उनका मर्म ग्रहण करने में बुद्धि को विशेष परिश्रम करना पड़ता है। जिन निबंधों की भाषा अधिक प्रौढ़ अथवा गूढ़ होती है उनके समझने में प्रयत्न भी अधिक करना पड़ता है और उसके लायक विद्या, बुद्धि तथा भाषा ज्ञान सब व्यक्तियों के पास होता भी नहीं।

पर कहानी की बात इससे भिन्न है। वर्णनात्मक प्रसंग सुनने का क्रम आरंभिक अवस्था से ही चलने लगता है। छोटे बच्चे भी कहानी सुनने का आग्रह करते हैं और उसे सुनने के लालच से रात में जगते भी रहते हैं। कम पढ़े व्यक्ति भी कहानी-किस्सा की पुस्तक शौक से पढ़ या सुन लेते हैं। कारण यही कि कहानी में जो घटनाएँ कही जाती हैं उनमें से अधिकांश हमको अपने या अन्य परिचित व्यक्तियों के जीवन में घटी हुई सी जान पड़ती हैं। उन्हें समझ लेने में कुछ कठिनाई नहीं होती। साथ ही कहानीकार उनमें जो थोड़ी बहुत विचित्र अथवा कुतूहल की बातें मिला देता है उससे पाठक का मनोरंजन भी हो जाता है।

यह कहानियां पं. श्री राम शर्मा आचार्य द्वारा लिखी गयी किताब प्रेरणाप्रद कथा से ली गई हैं।

नशा एक बला (Short motivational stories in Hindi)

मुकदमे के लिए कचहरी में हाजिर होने के लिए दो शराबी घर से निकले। शराब की धुन में बोतल झोले में रख ली पर कागज-पत्र घर में ही भूल गए।

घोड़े पर बैठकर चल पड़े। मध्याह्न भोजन के समय दोनों ने शराब भी पी। नशे में धुत, दोनों एक दूसरे से पूछते तो रहे कि कोई चीज भूल तो नहीं रहे, पर यह दोनों में से किसी को भी याद न रहा कि घोड़े पर चढ़कर आए थे, अब वे पैदल यात्रा कर रहे थे।

रात जहाँ टिके वहाँ फिर शराब पी। थोड़ी देर में चंद्रमा निकला तो एक बोला”अरे यार! सूरज निकल आया चलो जल्दी करो नहीं तो कचहरी लग जाएगी।” बजाय शहर की ओर चलने के वे गाँव की ओर चल पड़े और सवेरा होते-होते जहाँ से चले वहीं फिर जा पहुँचे। अनुपस्थिति में मुकदमा खारिज हो गया।


मनुष्य की अपूर्णता

(Short motivational stories in Hindi)

ब्रह्माजी की इच्छा हुई “सृष्टि रचें।” उसे क्रियान्वित किया। पहले एक कुत्ता बनाया और उससे उसकी जीवनचर्या की उपलब्धि जानने के लिए पूछा-“संसार में रहने के लिए तुझे कुछ अभाव तो नहीं?” कुत्ते ने कहा-“भगवन्! मुझे तो सब अभाव ही अभाव दिखाई देते हैं, न वस्त्र, न आहार, न घर और न इनके उत्पादन की क्षमता।” ब्रह्माजी बहुत पछताए।

फिर रचना शुरू की-एक बैल बनाया। जब अपना जीवनक्रम पूर्ण करके वह ब्रह्मलोक पहुँचा तो उन्होंने उससे भी यही प्रश्न किया। बैल दुखी होकर बोला-“भगवन्! आपने भी मुझे क्या बनाया, खाने के लिए सूखी घास, हाथ-पाँवों में कोई अंतर नहीं, सींग और लगा दिए। यह भोंडा शरीर लेकर कहाँ जाऊँ।”

तब ब्रह्माजी ने एक सर्वांग सुंदर शरीरधारी मनुष्य पैदा किया। उससे भी ब्रह्माजी ने पूछा-“वत्स, तुझे अपने आप में कोई अपूर्णता तो नहीं दिखाई देती?” थोड़ा ठिठक कर नवनिर्मित मनुष्य ने अनुभव के आधार पर कहा-“भगवन्! मेरे जीवन में कोई ऐसी चीज नहीं बनाई जिसे मैं प्रगति या समृद्धि कहकर संतोष कर सकता।”

ब्रह्माजी गंभीर होकर बोले-“वत्स! तुझे हृदय दिया, आत्मा दी, अपार क्षमता वाला उत्कृष्ट शरीर दिया। अब भी तू अपूर्ण है तो तुझे कोई पूर्ण नहीं कर सकता।”


पात्रता की परीक्षा (Short motivational stories in Hindi)

एक महात्मा के पास तीन मित्र गुरु-दीक्षा लेने गए। तीनों ने बड़े नम्र भाव से प्रणाम करके अपनी जिज्ञासा प्रकट की। महात्मा ने शिष्य बनाने से पूर्व पात्रता की परीक्षा कर लेने के मंतव्य से पूछा-“बताओ कान और आँख में कितना अंतर है?”

एकने उत्तर दिया-“केवल पाँच अंगुल का, भगवन्!” महात्मा ने उसे एक ओर खड़ा करके दूसरे से उत्तर के लिए कहा। दूसरे ने उत्तर दिया-“महाराज आँख देखती है और कान सुनते हैं, इसलिए किसी बात की प्रामाणिकता के विषय में आँख का महत्त्व अधिक है।” महात्मा ने उसको भी एक ओर खड़ा करके तीसरे से उत्तर देने के लिए कहा। तीसरे ने निवेदन किया-“भगवन्! कान का महत्त्व आँख से अधिक है।

आँख केवल लौकिक एवं दृश्यमान जगत को ही देख पाती है, किंतु कान को पारलौकिक एवं पारमार्थिक विषय का पान करने का सौभाग्य प्राप्त है।” महात्मा ने तीसरे को अपने पास रोक लिया। पहले दोनों को कर्म एवं उपासना का उपदेश देकर अपनी विचारणा शक्ति बढ़ाने के लिए विदा कर दिया। क्योंकि उनके सोचने की सीमा ब्रह्म तत्त्व की परिधि में अभी प्रवेश कर सकने योग्य सूक्ष्म बनी न थी।


देवता भी नहीं कर सकते (Short motivational stories in Hindi)

गुरु के दो शिष्य थे। दोनों बड़े ईश्वरभक्त थे। ईश्वर उपासना के बाद वे आश्रम में आए रोगियों की चिकित्सा में गुरु की सहायता किया करते थे।

एक दिन उपासना के समय ही कोई कष्टपीड़ित रोगी आ पहुँचा। गुरु ने पूजा कर रहे शिष्यों को बुला भेजा। शिष्यों ने कहला भेजा”अभी थोड़ी पूजा बाकी है, पूजा समाप्त होते ही आ जाएँगे।”

गुरुजी ने दुबारा फिर आदमी भेजा। इस बार शिष्य आ गए। पर उन्होंने अकस्मात बुलाए जाने पर अधैर्य व्यक्त किया। गुरु ने कहा”मैंने तुम्हें इस व्यक्ति की सेवा के लिए बुलाया था, प्रार्थनाएँ तो देवता भी कर सकते हैं, किंतु अकिंचनों की सहायता तो मनुष्य ही कर सकते हैं। सेवा प्रार्थना से अधिक ऊँची है, क्योंकि देवता सेवा नहीं कर सकते।”

शिष्य अपने कृत्य पर बड़े लज्जित हुए और उस दिन से प्रार्थना की अपेक्षा सेवा को अधिक महत्त्व देने लगे।


बासा मन ताजा करो (Short motivational stories in Hindi)

श्रावस्ती का मृगारि श्रेष्ठि करोड़ों मुद्राओं का स्वामी था। वह मन में मुद्राएँ ही गिनता रहता था। उसे धन से ही मोह था। मुद्राएँ ही उसका जीवन थीं। उनमें ही उसके प्राण बसते थे। सोते-जागते मुद्राओं का सम्मोहन ही उसे भुलाए रहता था। संसार में और भी कोई सुख है यह उसने कभी अनुभव ही नहीं किया।

एक दिन वह भोजन के लिए बैठा। पुत्रवधू ने प्रश्न किया”तात! भोजन तो ठीक है न? कोई त्रुटि तो नहीं रही?” मृगारि कहने लगा-“आयुष्मती! आज यह कैसा प्रश्न पूछ रही हो? तुम जैसी सुयोग्य पुत्रवधू भी कहीं त्रुटि कर सकती है, तुमने तो मुझे सदैव ताजे और स्वादिष्ट व्यंजनों से तृप्त किया है।”

विशाखा ने नि:श्वास छोड़ी, दृष्टि नीचे करके कहा-“आर्य! यही तो आपका भ्रम है। मैं आज तक सदैव आपको बासी भोजन खिलाती रही हूँ। मेरी बड़ी इच्छा होती है कि आपको ताजा भोजन कराऊँ पर एषणाओं के सम्मोहन ने आप पर पूर्णाधिकार कर लिया है। खिलाऊँ भी तो आपको उसका सुख न मिलेगा। आपका जीवन बासा हो गया है फिर मैं क्या करूँ।”

मृगारि को सारे जीवन की भूल पर बड़ा पश्चात्ताप हुआ। अब उसने भक्तिभावना स्वीकार की और धन का सम्मोहन त्यागकर धर्मकर्म में रुचि लेने लगा।

भौतिकता का आकर्षण प्राय: मनुष्य की सदिच्छाओं और भावनाओं को समाप्त कर देता है। उस अवस्था में तुच्छ स्वार्थ के सिवाय जीवन की उत्कृष्टताओं से मनुष्य वंचित रह जाता है।


तलाश (Short motivational stories in Hindi)

एक मनुष्य को संसार से वैराग्य हुआ, उसने कहा-“यह जगत मिथ्या है, माया है, अब मैं इसका परित्याग करके सच्ची शांति की तलाश करूँगा।” आधी रात बीती और वैराग्य लेने वाले ने कहा-“अब वह घड़ी आ गई। मुझे परमात्मा की खोज के लिए निकल पड़ना चाहिए।”

एक बार पार्श्व में लेटी हुई धर्मपत्नी और दुधमुहे बच्चे की ओर सिर उठाकर देखा उसने। बड़ी सौम्य आकृतियाँ थीं दोनों। वैरागी का मन पिघल उठा। उसने कहा-“कौन हो तुम जो मुझे माया में बाँधते हो।” भगवान ने धीमे से कहा-“मैं तुम्हारा भगवान!” लेकिन मनुष्य ने उनकी आवाज नहीं सुनी। उसने फिर कहा-“कौन हैं ये जिनके लिए मैं आत्म-सुख आत्म-शांति खोऊँ?”

एक और धीमी आवाज आई-“बावरे, यही भगवान हैं, इन्हें छोड़कर तू नकली भगवान की खोज में मत भाग।” बच्चा एकाएक चीखकर रो पड़ा। कोई सपना देखा था उसने। माँ ने बच्चे को छाती से लगाकर कहा-“मेरे जीवन आ, मेरी छाती में जो ममत्व है वह तुझे शांति देगा।” बच्चा माँ से लिपटकर सो गया और आदमी अनसुना करके चल दिया। भगवान ने कहा-“कैसा मूर्ख है यह मेरा सेवक, मुझे तजकर मेरी तलाश में भटकने जा रहा है।”


कुछ तो कर यों ही मत मर (Short motivational stories in Hindi)

रायगढ़ के राजा धीरज के अनेक शत्रु हो गए। एक रात शत्रुओं ने पहरेदारों को मिला लिया और महल में जाकर राजा को दवा सुंघा कर बेहोश कर दिया। उसके बाद उन्होंने राजा के हाथ-पाँव बाँधकर एक पहाड़ की गुफा में ले जाकर बंद कर दिया।

राजा को जब होश आया तो अपनी दशा देखकर घबरा उठा। उस अँधेरी गुफा में उसे कुछ करते-धरते न बना। तभी उसे अपनी माता का बताया हुआ मंत्र याद आ गया-“कुछ कर, कुछ कर, कुछ कर।” राजा की निराशा दूर हो गई और उसने पूरी शक्ति लगाकर हाथ-पैरों की डोरी तोड़ डाली। तभी अँधेरे में उसका पैर साँप पर पड़ गया जिसने उसे काट लिया।

राजा फिर घबराया, किंतु फिर तत्काल ही उसे वही मंत्र “कुछ कर, कुछ कर, कुछ कर” याद आ गया। उसने तत्काल कमर से कटार निकाल कर साँप के काटे स्थान को चीर दिया। खून की धार बह उठने से वह फिर घबरा उठा। लेकिन फिर उसी “कुछ कर, कुछ कर, कुछ कर” के मंत्र से प्रेरणा पाकर अपना उत्तरीय फाड़कर घाव पर पट्टी बाँध दी जिससे रक्त बहना बंद हो गया।

इतनी बाधाएँ पार हो जाने के बाद उसे उस अँधेरी गुफा से निकलने की चिंता होने लगी, साथ ही भूख-प्यास भी व्याकुल कर ही रही थी। उसने अँधेरे से निकलने का कोई उपाय न देखा तो पुनः निराश होकर सोचने लगा कि अब तो यहीं पर बंद रहकर भूख-प्यास से तड़पतड़प कर मरना होगा। वह उदास होकर बैठा ही था कि पुनः उसे माँ का बताया हुआ मंत्र “कुछ कर, कुछ कर, कुछ कर”याद आ गया और द्वार के पास आकर गुफा के मुख पर लगे पत्थर को धक्का देने लगा। बहुत बार प्राणपण से जोर लगाने पर अंतत: पत्थर लुढ़क गया और राजा गुफा से निकल कर अपने महल में वापस आ गया।


शबरी की महत्ता (Short motivational stories in Hindi)

 शबरी यद्यपि जाति की भीलनी थी, किंतु उसके हृदय में भगवान की सच्ची भक्ति भरी हुई थी। बाहर से वह जितनी गंदी दीख पड़ती थी, अंदर से उसका अंत:करण उतना ही पवित्र और स्वच्छ था। वह जो कुछ करती भगवान के नाम पर करती, भगवान के दर्शनों की उसे बड़ी लालसा थी और उसे विश्वास भी था कि एक दिन उसे भगवान के दर्शन अवश्य होंगे।

शबरी जहाँ रहती थी उस वन में अनेक ऋषियों के आश्रम थे। उसकी उन ऋषियों की सेवा करने और उनसे भगवान की कथा सुनने की बड़ी इच्छा रहती थी। अनेक ऋषियों ने उसे नीच जाति की होने के कारण कथा सुनाना स्वीकार नहीं किया और श्वान की भाँति दुत्कार दिया। किंतु इससे उसके हृदय में न कोई क्षोभ उत्पन्न हुआ और न निराशा। उसने ऋषियों की सेवा करने की एक युक्ति निकाल ली।

वह प्रतिदिन ऋषियों के आश्रम से सरिता तक का पथ बुहारकर कुश-कंटकों से रहित कर देती और उनके उपयोग के लिए जंगल से लकड़ियाँ काटकर आश्रम के सामने रख देती।शबरी का यह क्रम महीनों चलता रहा, किंतु ऋषि को यह पता न चला कि उनकी यह परोक्ष सेवा करने वाला है कौन? इस गोपनीयता का कारण यह था कि शबरी आधी रात रहे ही जाकर अपना काम पूरा कर आया करती थी।

जब वह कार्यक्रम बहुत समय तक अविरल रूप से चलता रहा तो ऋषियों को अपने परोक्ष सेवक का पता लगाने की अतीव जिज्ञासा हो उठी। निदान उन्होंने एक रात जागकर पता लगा ही लिया कि यह वही भीलनी है जिसे अनेक बार दुत्कार कर द्वार से भगाया जा चुका था।

तपस्वियों ने अंत्यज महिला की सेवा स्वीकार करने में परंपराओं पर आघात होते देखा और उसे उनके धर्म-कर्मों में किसी प्रकार भाग न लेने के लिए धमकाने लगे। मातंग ऋषि से यह न देखा गया। वे शबरी को अपनी कुटी के समीप ठहराने के लिए ले गए। भगवान राम जब वनवास गए तो उन्होंने मातंग ऋषि को सर्वोपरि मानकर उन्हें सबसे पहले छाती से लगाया और शबरी के झूठे बेर प्रेमपूर्वक चख-चखकर खाए।


भगवान का प्यार (Short motivational stories in Hindi)

शाम हुई मनसुख घर लौटे। आज भगवान कृष्ण गौएँ चराने नहीं गए थे। उनका जन्म दिवसोत्सव था। घर में पूजा थी, यशोदा ने उन्हें घर में ही रोक लिया था।

गोप-बालकों ने पूछा-“मनसुख तम तो अनन्य भक्त और सखा हो गोपाल के, फिर आज कृष्ण ने तुम्हें प्रसाद के लिए नहीं पूछा। तुम तो कहते थे गोपाल मेरे बिना अन्न का ग्रास भी नहीं डालते।”

“हाँ-हाँ ग्वालो! ऐसा ही है, तुम्हें विश्वास कहाँ होगा। कन्हाई तो आज भी मेरे पास आए थे। आज तो उन्होंने मुझे अपने हाथ से ही खिलाया था।”

“यह झूठ है” यह कहकर गोप-बालक कृष्ण को पकड़ लाए और कहने लगे-“लो मनसुख! अब तो कृष्ण सामने खड़े हैं, पूछ ले इन्होंने तो आज देहलीज के बाहर पाँव तक नहीं रखा।”

कृष्ण ने गोप-बालकों का समर्थन किया और कहा-“हाँहाँ मनसुख! तुम्हें भ्रम हुआ होगा मैं तो आज बाहर निकला तक नहीं।”

मनसुख ने मुसकराते हुए कहा-“धन्य हो नटवर! तुम्हारी लीलाएँ अगाध हैं, पर क्या आप बता सकते हैं कि यदि आज आप मेरे पास नहीं आए तो आपका यह पीतांबर मेरे पास कहाँ से आ गया। देख लो न अभी भी मिष्टान्न का कुछ अंश इसमें बँधा हुआ है।”

ग्वालों ने पीतांबर खोलकर देखा-वही भोग, वही मिष्टान्न जो पूजा गृह में था, पीतांबर में बंधा था। मनसुख को वह कौन देने गया, किसको पता था?


पश्चाताप (Short motivational stories in Hindi)

बौद्ध धर्म की नास्तिकवादी विचारधारा का खंडन करने के लिए कुमारिल भट्ट ने प्रतिज्ञा की और उसे पूरा करने के लिए उन्होंने तक्षशिला के विश्वविद्यालय में बौद्ध धर्म का गहन अध्ययन पूरा किया। उन दिनों की प्रथा के अनुसार छात्रों को आजीवन बौद्ध धर्म के प्रति आस्थागत रहने की प्रतिज्ञा करनी पड़ती थी, तभी उन्हें विद्यालय में प्रवेश मिलता था। कुमारिल ने झुठी प्रतिज्ञा ली और शिक्षा समाप्त होते ही बौद्ध मत का खंडन और वैदिक धर्म का प्रसार आरंभ कर दिया।

अपने प्रयत्न में उन्हें सफलता भी बहत मिली। शास्त्रार्थ की धूम मचाकर उन्होंने शून्यवाद की निस्सारता सिद्ध करके लड़खड़ाती हुई वैदिक मान्यताएँ फिर मजबूत बनाईं।

कार्य में सफलता मिली पर कुमारिल का अंत:करण विक्षुब्ध ही रहा। गुरु के सामने की हुई प्रतिज्ञा एवं उन्हें दिलाए हुए विश्वास का घात करने के पाप से उनकी आत्मा हर घड़ी दुखी रहने लगी। अंत में उन्होंने इस पाप का प्रायश्चित करने के लिए अग्नि में जीवित जल जाने का निश्चय किया। इस प्रायश्चित के करुण दृश्य को देखने देश भर के अगणित विद्वान पहुँचे, उन्हीं में आदि शंकराचार्य भी थे।

उन्होंने कुमारिल को प्रायश्चित न करने के लिए समझाते हुए कहा-“आपने तो जनहित के लिए वैसा किया था फिर प्रायश्चित क्यों करें?” इस पर कुमारिल ने कहा-“अच्छा काम भी अच्छे मार्ग से ही किया जाना चाहिए, कुमार्ग पर चलकर श्रेष्ठ काम करने की परंपरा गलत है। मैंने आपत्ति धर्म के रूप में वह छल किया पर उसकी परंपरा आरंभ नहीं करना चाहता।

दूसरे लोग मेरा अनुकरण करते हुए अनैतिक मार्ग पर चलते हुए अच्छे उद्देश्य के लिए प्रयत्न करने लगें तो इससे धर्म और सदाचार ही नष्ट होगा और तब प्राप्त हुए लाभ का कोई मूल्य न रह जाएगा। अतएव सदाचार की सर्वोत्कृष्टता प्रतिपादित करने के लिए मेरा प्रायश्चित करना ही उचित है।”

कुमारिल प्रायश्चित की अग्नि में जल गए, उनकी प्रतिपादित आस्था सदा अमर रहेगी।


रुपया रुपए को खींचता है (Short motivational stories in Hindi)

एक मनुष्य ने कहीं सुना कि रुपया रुपए को खींचता है। उसने इस बात को परखने का निश्चय किया।

सरकारी खजाने में रुपए का ढेर लगा था। वहीं खड़ा होकर वह अपना रुपया दिखाने लगा ताकि ढेर वाले रुपए खिंचकर उसके पास चले आएँ।

बहुत चेष्टाएँ करने पर भी ढेर के रुपए तो न खिंचे वरन असावधानी से उसके हाथ का रुपया छूटकर ढेर में गिर पड़ा।  खजांची का ध्यान इस खटपट की ओर गया तो उस व्यक्ति को संदिग्ध समझकर पकड़वा दिया। पूछताछ हुई तो उसने सारी बात कह सुनाई।

अधिकारी ने हँसते हुए कहा-“जो सिद्धांत तुमने सुना था वह ठीक था, पर इतनी बात तुम्हें और समझनी चाहिए कि ज्यादा चीजें थोड़ी को खींच लेती हैं। ज्यादा रुपए के आकर्षण में तुम्हारा एक रुपया खिंच गया। इस दुनिया में ऐसा ही होता है। बुराई या अच्छाई की शक्तियों में से जो जब भी बढ़ी-चढ़ी होती हैं, तब प्रतिपक्षी विचार के लोग भी बहुमत के प्रवाह में बहने लगते हैं।”


गधों का सत्कार (Short motivational stories in Hindi)

किसी समय एक जंगल में गधे ही गधे रहते थे। पूरी आजादी से रहते, भरपेट खाते-पीते और मौज करते।

एक लोमड़ी को मजाक सूझा। उसने मुँह लटकाकर गधों से कहा-“मैं चिंता से मरी जा रही हूँ और तुम इस तरह मौज कर रहे हो। पता नहीं कितना बड़ा संकट सिर पर आ पहुँचा है।”

गधों ने कहा-“दीदी, भला क्या हुआ, बात तो बताओ।” लोमड़ी ने कहा-“मैं अपने कानों सुनकर और आँखों देखकर आई हूँ। मछलियों ने एक सेना बना ली है और वे अब तुम्हारे ऊपर चढ़ाई करने ही वाली हैं। उनके सामने तुम्हारा ठहर सकना कैसे संभव होगा?”

गधे असमंजस में पड़ गए। उनने सोचा व्यर्थ जान गँवाने से क्या लाभ। चलो कहीं अन्यत्र चलो।जंगल छोड़कर वे गाँव की ओर चल पड़े।

इस प्रकार घबराए हुए गधों को देखकर गाँव के धोबी ने उनका खूब सत्कार किया। अपने छप्पर में आश्रय दिया और गले में रस्सी डालकर खूटे में बाँधते हुए कहा-“डरने की जरा भी जरूरत नहीं। मछलियों से मैं भुगत लूँगा। तुम मेरे बाड़े में निर्भयतापूर्वक रहो। केवल मेरा थोड़ा सा बोझ ढोना पड़ा करेगा।”

गधों की घबराहट तो दूर हुई पर उसकी कीमत महँगी चुकानी पड़ी।


पूर्णता का अहंकार (Short motivational stories in Hindi)

बाप ने बेटे को भी मूर्तिकला ही सिखाई। दोनों हाट में जाते और अपनी-अपनी मूर्तियाँ बेचकर आते। बाप की मूर्ति डेढ़-दो रुपए की बिकती पर बेटे की मूर्तियों का मूल्य आठ-दस आने से अधिक न मिलता।

हाट से लौटने पर बेटे को पास बिठाकर बाप उसकी मूर्तियों में रही हुई त्रुटियों को समझाता और अगले दिन उन्हें सुधारने के लिए समझाता।

यह क्रम वर्षों चलता रहा। लड़का समझदार था, उसने पिता की बातें ध्यान से सुनीं और अपनी कला में सुधार करने का प्रयत्न करता रहा। कुछ समय बाद लड़के की मूर्तियाँ भी डेढ़ रुपए की बिकने लगीं।

बाप अब भी उसी तरह समझाता और मूर्तियों में रहने वाले दोषों की ओर उसका ध्यान खींचता। बेटे ने और भी अधिक ध्यान दिया तो कला भी अधिक निखरी। मूर्तियाँ पाँच-पाँच रुपए की बिकने लगीं।

सुधार के लिए समझाने का क्रम बाप ने तब भी बंद न किया। एक दिन बेटे ने झुंझला कर कहा-“आप तो दोष निकालने की बात बंद ही नहीं करते। मेरी कला अब तो आप से भी अच्छी है, मुझे पाँच रुपए मिलते हैं जबकि आपको दो ही रुपए।”

बाप ने कहा-“पुत्र! जब मैं तुम्हारी उम्र का था तब मुझे अपनी कला की पूर्णता का अहंकार हो गया और फिर सुधार की बात सोचना छोड़ दिया। तब से मेरी प्रगति रुक गई और दो रुपए से अधिक मूल्य की मूर्तियाँ न बना सका। मैं चाहता हूँ वह भूल तुम न करो। अपनी त्रुटियों को समझने और सुधारने का क्रम सदा जारी रखो ताकि बहुमूल्य मूर्तियाँ बनाने वाले श्रेष्ठ कलाकारों की श्रेणी में पहुँच सको।”


नासमझ को समझ दो, वरदान नहीं

(Short motivational stories in Hindi)

एक राजा वन भ्रमण के लिए गया। रास्ता भूल जाने पर भूखप्यास से पीड़ित वह एक वनवासी की झोंपड़ी पर पहुँचा। वहाँ उसे आतिथ्य मिला तो जान बची।

चलते समय राजा ने उस वनवासी से कहा-“हम इस राज्य के शासक हैं। तुम्हारी सज्जनता से प्रभावित होकर अमुक नगर का चंदन बाग तुम्हें प्रदान करते हैं। उसके द्वारा जीवन आनंदमय बीतेगा।”

वनवासी उस परवाने को लेकर नगर अधिकारी के पास गया और बहुमूल्य चंदन का उपवन उसे प्राप्त हो गया। चंदन का क्या महत्त्व है और उससे किस प्रकार लाभ उठाया जा सकता है, उसकी जानकारी न होने से वनवासी चंदन के वृक्ष काटकर उनका कोयला बनाकर शहर में बेचने लगा। इस प्रकार किसी तरह उसके गुजारे की व्यवस्था चलने लगी।

धीरे-धीरे सभी वृक्ष समाप्त हो गए। एक अंतिम पेड़ बचा। वर्षा होने के कारण कोयला न बन सका तो उसने लकड़ी बेचने का निश्चय किया। लकड़ी का गट्ठा लेकर जब बाजार में पहुँचा तो सुगंध से प्रभावित लोगों ने उसका भारी मूल्य चुकाया। आश्चर्यचकित वनवासी ने इसका कारण पूछा तो लोगों ने कहा-“यह चंदन काष्ठ है। बहुत मूल्यवान है। यदि तुम्हारे पास ऐसी ही और लकड़ी हो तो उसका प्रचुर मूल्य प्राप्त कर सकते हो।” ___वनवासी अपनी नासमझी पर पश्चात्ताप करने लगा कि उसने इतना बड़ा बहुमूल्य चंदन वन कौड़ी मोल कोयले बनाकर बेच दिया। पछताते हुए नासमझ को सांत्वना देते हुए एक विचारशील व्यक्ति ने कहा-“मित्र, पछताओ मत, यह सारी दुनिया तुम्हारी ही तरह नासमझ है। जीवन का एक-एक क्षण बहुमूल्य है पर लोग उसे वासना और तृष्णाओं के बदले कौड़ी मोल में गवाते हैं। तुम्हारे पास जो एक वृक्ष बचा है उसी का सदुपयोग कर लो तो कम नहीं। बहुत गँवाकर भी अंत में यदि कोई मनुष्य सँभल जाता है तो वह भी बुद्धिमान ही माना जाता है।”


पढ़ने के साथ गुनो भी (Short motivational stories in Hindi)

एक दुकानदार व्यवहारशास्त्र की पुस्तक पढ़ रहा था। उसी समय एक सीधे-साधे व्यक्ति ने आकर कुतूहलवश पूछा-“क्या पढ़ रहे हो भाई?” इस पर दुकानदार ने झुंझलाते हुए कहा-“तुम जैसे मूर्ख इस ग्रंथ को क्या समझ सकते हैं।” उस व्यक्ति ने हँसकर कहा”मैं समझ गया, तुम ज्योतिष का कोई ग्रंथ पढ़ रहे हो, तभी तो समझ गए कि मैं मूर्ख हूँ।” दुकानदार ने कहा-“ज्योतिष नहीं, व्यवहारशास्त्र की पुस्तक है।” उसने चुटकी ली-“तभी तो तुम्हारा व्यवहार इतना सुंदर है।” दूसरों को अपमानित करने वालों को स्वयं अपमानित होना पड़ता है। पढ़ने का लाभ तभी है जब उसे व्यवहार में लाया जाए।


अपने लिए कम

(Short motivational stories in Hindi)

 “बेटा ले ये दो टुकड़े मिठाई के हैं। इनमें से यह छोटा टुकड़ा अपने साथी को दे देना।”

“अच्छा माँ” और वह बालक दोनों टुकड़े लेकर बाहर आ गया अपने साथी के पास। साथी को मिठाई का बड़ा टुकड़ा देकर छोटा स्वयं खाने लगा। माँ यह सब जंगले में से देख रही थी, उसने आवाज देकर बालक को बुलाया।

“क्यों रे! मैंने तुझसे बड़ा टुकड़ा खुद खाने और छोटा उस बच्चे को देने के लिए कहा था, किंतु तूने छोटा स्वयं खाकर बड़ा उसे क्यों दिया?”

वह बालक सहज बोली में बोला-“माताजी! दूसरों को अधिक देने और अपने लिए कम से कम लेने में मुझे अधिक आनंद आता है।”

माताजी गंभीर हो गईं। वह बहुत देर विचार करती रहीं बालक की इन उदार भावनाओं के संबंध में। उसे लगा सचमुच यही मानवीय आदर्श है और इसी में विश्व शांति की सारी संभावनाएँ निर्भर हैं। मनुष्य अपने लिए कम चाहे और दूसरों को अधिक देने का प्रयत्न करे तो समस्त संघर्षों की समाप्ति और स्नेह-सौजन्य की स्वर्गीय परिस्थितियाँ सहज ही उत्पन्न हो सकती हैं।


ईमानदार गरीब (Short motivational stories in Hindi)

सीलोन में एक जड़ी-बूटी बेचकर गुजारा करने वाला व्यक्ति रहता था। नाम था उसका महता शैसा। उसके घर की आर्थिक स्थिति बहुत ही खराब थी, कई कई दिन भूखा रहना पड़ता। उनकी माता चक्की पीसने की मजदूरी करती, बहिन फूल बेचती तब कहीं गुजारा हो पाता। ऐसी गरीबी में भी उनकी नीयत सावधान थी।

महता एक दिन एक बगीचे में जड़ी-बूटी खोद रहे थे कि उन्हें कई घड़े भरी हुई अशर्फियाँ गड़ी हुई दिखाई दीं। उनके मन में दूसरे की चीज पर जरा भी लालच न आया और मिट्टी से ज्यों का त्यों ढक कर बगीचे के मालिक के पास पहुंचे और उसे अशर्फियाँ गड़े होने की सूचना दी।

बगीचे के मालिक लरोटा की आर्थिक स्थिति भी बहुत खराब हो चली थी। कर्जदार उसे तंग किया करते थे। इतना धन पाकर उसकी खुशी का ठिकाना न रहा। सूचना देने वाले शैसा को उसने चार सौ अशर्फियाँ पुरस्कार में देनी चाही पर उसने उन्हें लेने से इनकार कर दिया और कहा-“इसमें पुरस्कार लेने जैसी कोई बात नहीं, मैंने तो अपना कर्त्तव्य मात्र पूरा किया है।”

बहुत दिन बाद लरोटा ने अपनी बहिन की शादी शैसा से कर दी और दहेज में कुछ धन देना चाहा। शैसा ने वह भी न लिया और अपने हाथ-पैर की मजदूरी करके दिन गुजारे।


छोटी भूल का बड़ा दुष्परिणाम (Short motivational stories in Hindi)

कहते हैं कि कलंग देश का राजा मधुपर्क खा रहा था। उसके प्याले में से थोड़ा सा शहद टपक कर जमीन पर गिर पड़ा।

उस शहद को चाटने मक्खियाँ आ गईं। मक्खियों को इकट्ठी देख छिपकली ललचाई और उन्हें खाने के लिए आ पहुँची। छिपकली को मारने बिल्ली पहुंची। बिल्ली पर दो-तीन कुत्ते टूटे। बिल्ली भाग गई और कुत्ते आपस में लड़कर घायल हो गए।

कुत्तों के मालिक अपने-अपने कुत्तों के पक्ष का समर्थन करने लगे और दूसरे का दोष बताने लगे। उस पर लड़ाई ठन गई। लड़ाई में दोनों ओर की भीड़ बढ़ी और आखिर सारे शहर में बलवा हो गया। दंगाइयों को मौका मिला तो सरकारी खजाना लूट और राजमहल में आग लगा दी।

राजा ने इतने बड़े उपद्रव का कारण पूछा तो मंत्री ने जाँचकर बताया कि भगवान आपके द्वारा असावधानी से गिराया हुआ थोड़ा सा शहद ही इतने बड़े दंगे का कारण बन गया है।

तब राजा समझा कि छोटी सी असावधानी भी मनुष्य के लिए कितना बड़ा संकट उत्पन्न कर सकती है।


स्वप्न पर मत रीझो (Short motivational stories in Hindi)

एक युवक ने स्वप्न में देखा कि वह किसी बड़े राज्य का राजा हो गया है। स्वप्न में मिली इस आकस्मिक विभूति के कारण उनकी प्रसन्नता का ठिकाना न रहा।

प्रात:काल पिता ने काम पर चलने को कहा, माँ ने लकड़ियाँ काट लाने की आज्ञा दी, धर्मपत्नी ने बाजार से सौदा लाने का आग्रह किया। पर युवक ने कोई भी काम न कर एक ही उत्तर दिया-“मैं राजा हूँ, मैं कोई काम कैसे कर सकता हूँ?”

घर वाले बड़े हैरान थे, आखिर किया क्या जाए? तब कमान सँभाली उनकी छोटी बहिन ने। एक-एक कर उसने सबको बुलाकर चौके में भोजन करा दिया। अकेले खयाली महाराज ही बैठे के बैठे रह गए।

शाम हो गई,भूख से आँतें कुलबुलाने लगीं। आखिर जब रहा नहीं गया तो उसने बहन से कहा-“क्यों री! मुझे खाना नहीं देगी क्या?”

बालिका ने मुँह बनाते हुए कहा-“राजाधिराज! रात आने दीजिए, परियाँ आकाश से उतरेंगी, वही आपके उपयुक्त भोजन प्रस्तुत करेंगी। हमारे रूखे-सूखे भोजन से आपको संतोष कहाँ होता?”

व्यर्थ की कल्पनाओं में विचरण करने वाले युवक ने हार मानी और मान लिया कि धरती पर रहने वाले मनुष्य को निरर्थक लौकिक एवं भौतिक कल्पनाओं में ही न डूबे रहना चाहिए वरन जीवन का जो शाश्वत और सनातन सत्य है उसे प्राप्त और धारण करने का प्रयत्न भी करना चाहिए। इतना मान लेने पर ही उसे भोजन मिल सका।


स्वर्ग और नरक भावनाओं में (Short motivational stories in Hindi)

एक गुरु के दो शिष्य थे। दोनों किसान थे। भगवान का भजन_पूजन भी दोनों करते थे। स्वच्छता और सफाई पर भी दोनों की आस्था थी, किंतु एक बड़ा सुखी था, दूसरा बड़ा दुखी।

गुरु की मृत्यु पहले हुई पीछे दोनों शिष्यों की भी। दैवयोग से स्वर्गलोक में भी तीनों एक ही स्थान पर जा मिले, पर स्थिति यहाँ भी पहले जैसी ही थी। जो पृथ्वी में सुखी था, यहाँ भी प्रसन्नता अनुभव कर रहा था और जो आएदिन क्लेश-कलह आदि के कारण पृथ्वी में अशांत रहता था, यहाँ भी अशांत दिखाई दिया।

दुखी शिष्य ने गुरुदेव के समीप जाकर कहा-“भगवन् ! लोग कहते हैं, ईश्वर भक्ति से स्वर्ग में सुख मिलता है पर हम तो यहाँ भी दुखी के दुखी रहे।”

गुरु ने गंभीर होकर उत्तर दिया-“वत्स! ईश्वर भक्ति से स्वर्ग तो मिल सकता है पर सुख और दुःख मन की देन हैं। मन शुद्ध हो तो नरक में भी सुख ही है और मन शुद्ध नहीं तो स्वर्ग में भी कोई सुख नहीं है।”


भय से मुक्ति का उपाय (Short motivational stories in Hindi)

रंभा मोहनदास करमचंद गांधी के परिवार की पुरानी सेविका थी। वह पढ़ी-लिखी नहीं थी, किंतु इतनी धार्मिक थी कि रामायण को हाथ जोड़कर और तुलसी को सिर नवाकर ही अन्न-जल ग्रहण करती थी ।

एक रात बालक गांधी को सोने से पहले डर लगा। उसे लगा कि कोई भूत-प्रेत सामने खड़ा है। डर से उन्हें रात भर नींद नहीं आई। सवेरे रंभा ने लाल-लाल आँखें देखीं, तो उन्होंने गांधी से इसके बारे में पूछा गांधी ने पूरी बात सच सच बता दी ।

रंभा बोली, ‘मेरे पास भय भगाने की अचूक दवा है। जब भी डर लगे, तो राम नाम जप लिया करो। भगवान् राम के नाम को सुनकर कोई बुरी आत्मा पास नहीं फटकती।’

गांधीजी ने यह नुसखा अपनाया, तो उन्हें लगा कि इसमें बहुत ताकत है। बाद में संत लाधा महाराज के मुख से रामकथा सुनकर उनकी राम-नाम में आस्था और सुदृढ़ हो गई। बड़े होने पर गांधीजी ने अनेक ग्रंथों का अध्ययन किया, तो वे समझ गए कि भय से पूरी तरह मुक्ति भी ठीक नहीं होती।

एक बार वर्धा में एक व्यक्ति उनसे मिलने आया। गांधीजी से उसने पूछा, ‘बापू ! पूरी तरह भयमुक्त होने के उपाय बताएँ।’

गांधीजी ने कहा, ‘मैं स्वयं सर्वथा भयमुक्त नहीं हूँ। काम क्रोध ऐसे शत्रु हैं, जिनसे भय के कारण ही बचा जा सकता है। इन्हें जीत लेने से बाहरी भय का उपद्रव अपने-आप मिट जाता है। राग-आसक्ति दूर हो, तो निर्भयता सहज प्राप्त हो जाए। ‘


सफलता की तैयारी (Short motivational stories in Hindi)

शहर  से  कुछ  दूर   एक  बुजुर्ग  दम्पत्ती   रहते  थे .  वो  जगह  बिलकुल  शांत  थी  और  आस -पास  इक्का -दुक्का  लोग  ही  नज़र  आते  थे .

एक  दिन  भोर  में  उन्होंने  देखा  की  एक  युवक  हाथ  में  फावड़ा  लिए  अपनी  साइकिल  से  कहीं   जा  रहा  है , वह  कुछ  देर  दिखाई  दिया  और  फिर  उनकी  नज़रों  से  ओझल  हो  गया .दम्पत्ती   ने  इस  बात  पर  अधिक  ध्यान  नहीं  दिया , पर  अगले  दिन  फिर  वह  व्यक्ति  उधर  से  जाता  दिखा .अब  तो  मानो  ये  रोज  की  ही  बात  बन  गयी , वह  व्यक्ति  रोज  फावड़ा  लिए  उधर  से  गुजरता  और  थोड़ी  देर  में  आँखों  से  ओझल  हो  जाता .

दम्पत्ती   इस  सुन्सान  इलाके  में  इस  तरह  किसी  के  रोज  आने -जाने  से  कुछ  परेशान  हो गए  और  उन्होंने  उसका  पीछा  करने   का  फैसला  किया .अगले  दिन  जब  वह  उनके  घर  के  सामने  से  गुजरा  तो  दंपत्ती   भी  अपनी  गाडी  से  उसके  पीछे -पीछे   चलने  लगे . कुछ  दूर  जाने  के  बाद  वह  एक  पेड़  के  पास  रुक  और  अपनी  साइकिल  वहीँ  कड़ी  कर  आगे  बढ़ने  लगा . १५-२० कदम चलने के बाद वह रुका  और अपने  फावड़े  से ज़मीन  खोदने लगा .

दम्पत्ती को  ये  बड़ा  अजीब  लगा  और  वे  हिम्मत  कर  उसके  पास  पहुंचे  ,“तुम  यहाँ  इस  वीराने  में   ये  काम  क्यों   कर  रहे  हो ?”

युवक  बोला  , “ जी,  दो  दिन  बाद  मुझे  एक  किसान  के  यहाँ  काम  पाने  क  लिए  जाना  है , और  उन्हें  ऐसा  आदमी  चाहिए  जिसे  खेतों  में  काम  करने  का  अनुभव  हो , चूँकि  मैंने  पहले  कभी  खेतों  में  काम  नहीं  किया इसलिए  कुछ  दिनों  से  यहाँ  आकार  खेतों में काम करने की तैयारी कर रहा हूँ!!”

 दम्पत्ती  यह  सुनकर  काफी  प्रभावित  हुए  और  उसे  काम  मिल  जाने  का  आशीर्वाद  दिया .

Friends,  किसी  भी  चीज  में  सफलता  पाने  के  लिए  तैयारी  बहुत  ज़रूरी   है . जिस  sincerity के  साथ   युवक  ने  खुद  को  खेतों  में  काम करने  के  लिए  तैयार  किया  कुछ  उसी  तरह  हमें  भी अपने-अपने क्षेत्र में सफलता के लिए खुद  को  तैयार  करना  चाहिए।


अवसर की पहचान (Short motivational stories in Hindi)

एक बार एक ग्राहक चित्रो की दुकान पर गया । उसने वहाँ पर अजीब से चित्र देखे । पहले चित्र मे चेहरा पूरी तरह बालो से ढँका हुआ था और पैरोँ मे पंख थे ।एक दूसरे चित्र मे सिर पीछे से गंजा था।

ग्राहक ने पूछा – यह चित्र किसका है?

दुकानदार ने कहा – अवसर का ।

ग्राहक ने पूछा – इसका चेहरा बालो से ढका क्यो है?

दुकानदार ने कहा -क्योंकि अक्सर जब अवसर आता है तो मनुष्य उसे पहचानता नही है ।

ग्राहक ने पूछा – और इसके पैरो मे पंख क्यो है?

दुकानदार ने कहा – वह इसलिये कि यह तुरंत वापस भाग जाता है, यदि इसका उपयोग न हो तो यह तुरंत उड़ जाता है ।

ग्राहक ने पूछा – और यह दूसरे चित्र मे पीछे से गंजा सिर किसका है?

दुकानदार ने कहा – यह भी अवसर का है । यदि अवसर को सामने से ही बालो से पकड़ लेँगे तो वह आपका है ।अगर आपने उसे थोड़ी देरी से पकड़ने की कोशिश की तो पीछे का गंजा सिर हाथ आयेगा और वो फिसलकर निकल जायेगा । वह ग्राहक इन चित्रो का रहस्य जानकर हैरान था पर अब वह बात समझ चुका था ।

दोस्तो,

आपने कई बार दूसरो को ये कहते हुए सुना होगा या खुद भी कहा होगा कि ‘हमे अवसर ही नही मिला’ लेकिन ये अपनी जिम्मेदारी से भागने और अपनी गलती को छुपाने का बस एक बहाना है । Real मे भगवान ने हमे ढेरो अवसरो के बीच जन्म दिया है । अवसर हमेशा हमारे सामने से आते जाते रहते है पर हम उसे पहचान नही पाते या पहचानने मे देर कर देते है । और कई बार हम सिर्फ इसलिये चूक जाते है क्योकि हम बड़े अवसर के ताक मे रहते हैं । पर अवसर बड़ा या छोटा नही होता है । हमे हर अवसर का भरपूर उपयोग करना चाहिये ।


धर्म का सौदा (Short motivational stories in Hindi)

तथागत एक बार काशी में एक किसान के घर भिक्षा माँगने चले गए। भिक्षा पात्र आगे बढ़ाया। किसान ने एक बार उन्हें ऊपर से नीचे तक देखा। शरीर पूर्णांग था। वह किसान कर्म पूजक था। गहरी आँखों से देखता हुआ बोला-“मैं तो किसान हूँ। अपना परिश्रम करके अपना पेट भरता हूँ। साथ में और भी कई व्यक्तियों का। तुम क्यों बिना परिश्रम किए भोजन प्राप्त करना चाहते हो?”

बुद्ध ने अत्यंत ही शांत स्वर में उत्तर दिया-“मैं भी तो किसान हूँ। मैं भी खेती करता हूँ।” किसान ने आश्चर्य से भरकर प्रश्न किया-“फिर……..अब क्यों भिक्षा माँग रहे हैं?”

भगवान बुद्ध ने किसान की शंका का समाधान करते हुए कहा”हाँ वत्स! पर वह खेती आत्मा की है। मैं ज्ञान के हल से श्रद्धा के बीज बोता हूँ। तपस्या के जल से सींचता हूँ। विनय मेरे हल की हरिस, विचारशीलता फाल और मन नरैली है। सतत अभ्यास का यान, मुझे उस गंतव्य की ओर ले जा रहा है जहाँ न दुःख है न संताप, मेरी इस खेती से अमरता की फसल लहलहाती है। तब यदि तुम मुझे अपनी खेती का कुछ भाग दो…….और मैं तुम्हें अपनी खेती का कुछ भाग दूं तो क्या यह सौदा अच्छा न रहेगा।”

किसान की समझ में बात आ गई और वह तथागत के चरणों में अवनत हो गया।


नकल अच्छी नहीं (Short motivational stories in Hindi)

 एक व्यापारी एक घोड़े पर नमक और एक गधे पर रूई की गाँठ लादे जा रहा था। रास्ते में एक नदी पड़ी। पानी में फँसते ही घोड़े ने पानी में डुबकी लगाई तो काफी नमक पानी में घुल गया। गधे ने घोड़े से पूछा-यह क्या कर रहे हो? घोड़े ने उत्तर दिया-वजन हलका कर रहा हूँ। यह सुनकर गधे ने भी दो डुबकी लगाईं पर उससे गाँठ भीगकर इतनी भारी हो गई कि उसे ढोने में गधे की जान आफत में पड़ गई। सच है नकल के लिए भी बड़ी अकल चाहिए।


खाँड़ के खिलौने (Short motivational stories in Hindi)

एक गृहस्थ तीन खाँड़ के खिलौने लाया जो कि तीन साधुओं की मूर्तियाँ थीं। संयोगवश उसके यहाँ तीन अतिथि साधु भोजन करने आए। गृहस्थ ने उन्हें बड़ी श्रद्धा से बैठाया। इतने ही में गृहस्थ का एक छोटा लड़का आया वह उन खिलौनों को लेकर पूछने लगा-“यह क्या है, पिताजी!” गृहस्थ बोला-“यह साधू है।” बालक ने पूछा, “इनका क्या होगा?” गृहस्थ ने कहा-“इन्हें खाएँगे।” लड़का बोला, कब। गृहस्थ बोला-“पहले इन साधुओं को भोजन कराकर हम खाना खा लें फिर एक-एक तीनों खा लेंगे।”

गृहस्थ तो इस प्रकार अपने बालक को उन खाँड़ के खिलौनों के बारे में बतला रहा था, उधर साधुओं ने समझा कि यह बातचीत उनके बारे में चल रही है। यह समझकर साधु उनके यहाँ से भागे, गृहस्थ को बड़ा अचरज हुआ, वह उनके पीछे भागा। वे लोग एक जगह रुके, थक गए तो गृहस्थ ने उनके भागने का कारण पूछा। साधुओं ने कहा कि तुम हमें मार डालना चाहते थे,हम तुम्हारी सब बात सुन रहे थे। गृहस्थ ने कहा-“महाराज मैं तो बालक से खाँड़ के खिलौनों के बारे में बातचीत कर रहा था।” तब साधुओं की समझ में आया और वे फिर वापस उसके घर गए और भोजन किया। मन की दुर्बलता से लोग ऐसे ही डरे रहते हैं जब कि वास्तविकता कुछ और ही होती है।


विवेक सबसे बड़ा धर्म (Short motivational stories in Hindi)

मअद को यमन का शासक नियुक्त किया गया। राज्याभिषेक के उपलक्ष्य में जन-उत्सव संपन्न हुआ, बहुत सी प्रजा अभिषेक देखने आई। मअद बड़े नेक और ईश्वर भक्त राजकुमार थे।

ताज धारण कराने से पूर्व राजपुरोहित ने प्रश्न किया-“आपके सामने जो मामले मुकदमे आएँगे उन्हें किस प्रकार हल करेंगे।” मअद ने उत्तर दिया-“कुरान शरीफ को आधार मानकर, जो कुरान के सिद्धांत के अनुसार होगा उसी का समर्थन करूँगा।”

पर यदि कुरान में वह बात न लिखी हो तो?”तब मैं धर्माचार्यों और जिन पर प्रजा का विश्वास है ऐसे पैगंबरों का निर्देश प्राप्त करूँगा।” मअद ने उत्तर दिया।

 “यदि वह भी उपलब्ध न हो तो?” राजपुरोहित ने फिर प्रश्न किया।

“तब मैं अपने विवेक के अनुसार न्याय करने का यत्न करूँगा” मअद ने विनीत उत्तर दिया।


मरने से डरना क्या? (Short motivational stories in Hindi)

राजा परीक्षित को भागवत सुनाते हुए जब शुकदेव जी को छह दिन बीत गए और सर्प के काटने से मृत्यु होने का एक दिन रह गया

तब भी राजा का शोक और मृत्यु भय दूर न हुआ। कातर भाव से अपने मरने की घड़ी निकट आती देखकर वह क्षुब्ध हो रहा था।

शुकदेव जी ने परीक्षित को एक कथा सुनाई-राजन! बहुत समय पहले की बात है, एक राजा किसी जंगल में शिकार खेलने गया। संयोगवश वह रास्ता भूलकर बड़े घने जंगल में जा निकला, रात्रि हो गई वर्षा पड़ने लगी। सिंह व्याघ्र बोलने लगे। राजा बहुत डरा और किसी प्रकार रात्रि बिताने के लिए विश्राम का स्थान ढूँढ़ने लगा। कुछ दूरी पर उसे दीपक दिखाई दिया। वहाँ पहुँचकर उसने एक गंदे बीमार बहेलिए की झोंपड़ी देखी। वह चल-फिर नहीं सकता था इसलिए झोंपड़ी में ही एक ओर उसने मल मूत्र त्यागने का स्थान बना रखा था। अपने खाने के लिए जानवरों का मांस उसने झोंपड़ी की छत पर लटका रखा था। बड़ी गंदी, छोटी, अंधेरी और दुर्गंधयुक्त वह कोठरी थी। उसे देखकर राजा पहले तो ठिठका, पर पीछे उसने और कोई आश्रय न देखकर उस बहेलिए से अपनी कोठरी में रातभर ठहर जाने देने के लिए प्रार्थना की।

बहेलिए ने कहा-“आश्रय के लोभी राहगीर कभी-कभी यहाँ आ भटकते हैं और मैं उन्हें ठहरा लेता हूँ तो दूसरे दिन जाते समय बहुत झंझट करते हैं। इस झोंपड़ी की गंध उन्हें ऐसी भा जाती है कि फिर उसे छोड़ना ही नहीं चाहते, इसी में रहने की कोशिश करते हैं और अपना कब्जा जमाते हैं। ऐसे झंझट में मैं कई बार पड़ चुका हूँ। अब किसी को नहीं ठहरने देता। आपको भी इसमें नहीं ठहरने दूँगा।” राजा ने प्रतिज्ञा की, कसम खाई कि वह दूसरे दिन इस झोंपड़ी को अवश्य खाली कर देगा। उसका काम तो बहुत बड़ा है। यहाँ तो वह संयोगवश ही आया है सिर्फ एक रात काटनी है।

बहेलिए ने अन्यमनस्क होकर राजा को झोंपडी के कोने में ठहर जाने दिया, पर दूसरे दिन प्रात:काल ही बिना झंझट किए झोंपड़ी खाली कर देने की शर्त को फिर दोहरा दिया। राजा एक कोने में पड़ रहा। रात भर सोया। सोने में झोंपड़ी की दुर्गंध उसके मस्तिष्क में ऐसी बस गई कि सवेरे उठा तो उसे वही सब परमप्रिय लगने लगा। राजकाज की बात भूल गया और वहीं निवास करने की बात सोचने लगा।

प्रात:काल जब राजा और ठहरने के लिए आग्रह करने लगा तो बहेलिए ने लाल-पीली आँखें निकाली और झंझट शुरू हो गया। झंझट बढ़ा। उपद्रव और कलह का रूप धारण कर लिया। राजा मरने-मारने पर उतारू हो गया। उसे छोड़ने में भारी कष्ट और शोक अनुभव करने लगा।

शुकदेव जी ने पूछा-“परीक्षित बताओ, उस राजा के लिए क्या यह झंझट उचित था?” परीक्षित ने कहा-“भगवन्! वह कौन राजा था, उसका नाम तो बताइए। वह तो बड़ा मूर्ख मालूम पड़ता है कि ऐसी गंदी कोठरी में, अपनी प्रतिज्ञा तोड़कर राजकाज छोड़कर, नियत अवधि से भी अधिक रहना चाहता था। उसकी मूर्खता पर तो मुझे भी क्रोध आता है।”

शुकदेव जी ने कहा-“परीक्षित! वह मूर्ख तू ही है। इस मलमूत्र की गठरी देह में जितने समय तेरी आत्मा को रहना आवश्यक था वह अवधि पूरी हो गई। अब उस लोक को जाना है जहाँ से आया था। इस पर भी तू झंझट फैला रहा है। मरना नहीं चाहता, मरने का शोक कर रहा है। क्या यह तेरी मूर्खता नहीं है?”


संघर्ष से बड़ी शक्ति नहीं (Short motivational stories in Hindi)

द्रोणाचार्य कौरव सेना के सेनापति नियुक्त हुए। पहले दिन का युद्ध वीरतापूर्वक लड़े तो भी विजयश्री अर्जुन के हाथ रही।

यह देखकर दुर्योधन को बड़ी निराशा हुई। वह गुरु द्रोणाचार्य के पास गए और कहा-“गुरुदेव! अर्जुन तो आपका शिष्य मात्र है, आप तो उसे क्षणभर में परास्त कर सकते हैं, फिर यह देर क्यों?”

द्रोणाचार्य गंभीर हो गए और कहा-“आप ठीक कहते हैं, अर्जुन मेरा शिष्य है, उसकी सारी विद्या से मैं परिचित हूँ, किंतु उसका जीवन कठिनाई से संघर्ष करने में रहा है और मेरा सुविधापूर्वक दिन बिताने का रहा है। विपत्ति ने उसे मुझसे भी अधिक बलवान बना दिया है।”


पराया धन धूलि समान (Short motivational stories in Hindi)

भक्त राँका बाँका अपनी स्त्री समेत भगवत उपासना में लगे थे। वे दोनों जंगल से लकड़ी काट-काट अपना गुजारा करते थे और भक्ति भावना में तल्लीन रहते थे। अपने परिश्रम पर ही गुजर करना उनका व्रत था। दान या पराये धन को वे भक्ति मार्ग में बाधक मानते थे। एक दिन राँका बाँका जंगल से लौट रहे थे। रास्ते में मुहरों की थैली पड़ी मिली। वे पैर से उस पर मिट्टी डालने लगे। इतने में पीछे से उनकी स्त्री आ गई। उसने पूछा-“थैली को दाब क्यों रहे हैं?” उसने उत्तर दिया-“मैंने सोचा तुम पीछे आ रही हो कहीं पराई चीज के प्रति तुम्हें लोभ न आ जाए इसलिए उसे दाब रहा था।” स्त्री ने कहा-“मेरे मन में सोने और मिट्टी में कोई अंतर नहीं, आप व्यर्थ ही यह कष्ट कर रहे थे।” उस दिन सूखी लकड़ी न मिलने से उन्हें भूखा रहना पड़ा तो भी उनका मन पराई चीज पर विचलित न हुआ।

पराये धन को धूलि समान समझने वाले, अपने ही श्रम पर निर्भर करने वाले, साधारण दीखने वाले भक्त भी उन लोगों से अनेक गुने श्रेष्ठ हैं जो संत-महंत का आडंबर बनाकर पराये परिश्रम के धन से गुलछर्रे उड़ाते हैं।


धोखा नहीं दूंगा (Short motivational stories in Hindi)

प्राचीन परंपराओं की तुलना में विवेकशीलता का अधिक महत्त्वपूर्ण प्रतिपादन करने वाले संत सुकरात को वहाँ के कानून से मृत्युदंड की सजा दी गई।

सुकरात के शिष्य अपने गुरु के प्राण बचाना चाहते थे। उन्होंने जेल से भाग निकलने के लिए एक सुनिश्चित योजना बनाई और उसके लिए सारा प्रबंध ठीक कर लिया।

प्रसन्नता भरा समाचार देने और योजना समझाने को उनका एक शिष्य जेल में पहुँचा और सारी व्यवस्था उन्हें कह सुनाई। शिष्य को आशा थी कि प्राण-रक्षा का प्रबंध देखकर उनके गुरु प्रसन्नता अनुभव करेंगे।

सुकरात ने ध्यानपूर्वक सारी बात सुनी और दुखी होकर कहा”मेरे शरीर की अपेक्षा मेरा आदर्श श्रेष्ठ है। मैं मर जाऊँ और मेरा आदर्श जीवित रहे तो वही उत्तम है। किंतु यदि आदर्शों को खोकर जीवित रह सका तो वह मृत्यु से भी अधिक कष्टकारक होगा। न तो मैं सहज विश्वासी जेल कर्मचारियों को धोखा देकर उनके लिए विपत्ति का कारण बनूँगा और न जिस देश की प्रजा हूँ, उसके कानूनों का उल्लंघन करूँगा। कर्त्तव्य मुझे प्राणों से अधिक प्रिय हैं।”

योजना रद्द करनी पड़ी। सुकरात ने हँसते हुए विष का प्याला पिया और मृत्यु का संतोषपूर्वक आलिंगन करते हुए कहा-“हर भले आदमी के लिए यही उचित है कि वह आपत्ति आने पर भी कर्तव्यधर्म से विचलित न हो।”


शिक्षा देने से पहले (Short motivational stories in Hindi)

सातवर्षीय बालक को माँ पीटे जा रही थी। पड़ोस की एक महिला ने जाकर बचाया उसे। पूछने पर उसकी माँ ने बताया कि यह मंदिर में से चढ़ौती के आम तथा पैसे चुराकर लाया है, इसीलिए पीट रही हूँ इसे। उक्त महिला ने बड़े प्यार से उस बच्चे से पूछा-“क्यों बेटा! तुम तो बड़े प्यारे बालक हो। चोरी तो गंदे बच्चे करते हैं। तुमने ऐसा क्यों किया?”

बार-बार पूछने पर सिसकियों के बीच से बोला-“माँ भी तो रोज ऊपर वाले चाचाजी के दूध में से आधा निकाल लेती हैं और उतना ही पानी डाल देती हैं और हमसे कहती हैं कि उन्हें बताना मत। मैंने तो आज पहली बार ही चोरी की है।”

महिला के मुँह की आभा देखते ही बनती थी उस समय। वास्तव में बच्चों के निर्माण में घर का वातावरण बहुत ही महत्त्वपूर्ण स्थान रखता है।


जैसा खाया अन्न वैसा बना मन

शरशैया पर पड़े हुए भीष्म पितामह उत्तरायण सूर्य आने पर प्राण त्यागने की तैयारी में लगे थे।

कुरु और पांडु कुल के नर-नारी उन्हें घेरे बैठे थे। पितामह ने उचित समझा कि उन्हें कुछ धर्मोपदेश दिया जाए। वे धर्म और सदाचार की विवेचना करने लगे।

सब ध्यानपूर्वक सुन रहे थे पर द्रोपदी के चेहरे पर व्यंग हास की हलकी सी रेखा दौड़ रही थी।

भीष्म ने उसे देखा और अभिप्राय को समझा।

वे बोले-“बेटी! मेरी कल की करनी और आज की कथनी में अंतर देखकर तुम आश्चर्य मत मानो। मनुष्य जैसा अन्न खाता है वैसा ही उसका मन बनता है। जिन दिनों में राजसभा में तुम्हारा अपमान हुआ था उन दिनों कौरवों का कुधान्य खाने से मेरी बुद्धि मलीन हो रही थी इसलिए तुम्हारे पक्ष में न्याय की आवाज न उठा सका। पर इन दिनों मुझे लंबी अवधि का उपवास करना पड़ा है, सो भावनाएँ स्वतः वैसी हो गईं जैसा कि मैं इस समय धर्मोपदेश में व्यक्त कर रहा हूँ।”

द्रोपदी ने आहार की शुद्धि का महत्त्व समझा और क्षमा प्रार्थना के रूप में अपनी भूल पर दुःख प्रकट करते हुए पितामह के चरणों पर मस्तक झुका दिया।

 

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