दो शनि प्रदोष व्रत कथाएँ (2023) | shani pradosh vrat katha

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एक नजर मे प्रदोष व्रत

हिन्दू धर्म के अनुसार, प्रदोष व्रत कलियुग में अति मंगलकारी और शिव कृपा प्रदान करनेवाला होता है। माह की त्रयोदशी तिथि में सायं काल को प्रदोष काल कहा जाता है। मान्यता है कि प्रदोष के समय महादेव कैलाश पर्वत के रजत भवन में इस समय नृत्य करते हैं और देवता उनके गुणों का स्तवन करते हैं। जो भी लोग अपना कल्याण चाहते हों यह व्रत रख सकते हैं। प्रदोष व्रत को करने से सब प्रकार के दोष मिट जाता है। सप्ताह के सातों दिन के प्रदोष व्रत का अपना विशेष महत्व है।

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पहली शनि प्रदोष व्रत कथा

एक निर्धन ब्राह्मण की स्त्री दरिद्रता से दुःखी हो शांडिल्य ऋषि के पास जाकर बोली- हे महामुने! मैं अत्यन्त दुःखी हूँ। दुःख निवारण का उपाय बतलाइये। मेरे दोनों पुत्र आपकी शरण में हैं। मेरे ज्येष्ठ पुत्र का नाम धर्म है जो कि राजपुत्र है और लघु पुत्र का नाम शुचिव्रत है अतः हम दरिद्री हैं, आप ही हमारा उद्धार कर सकते हैं।

इतनी बात सुन ऋषि ने शिव प्रदोष व्रत करने के लिए कहा। तीनों प्राणी शनि प्रदोष व्रत कथा का पाठ करने लगे। कुछ समय पश्चात् प्रदोष व्रत आया, तब तीनों ने व्रत का संकल्प लिया। छोटा लड़का जिसका नाम शुचिव्रत था, एक तालाब पर स्नान करने को गया तो उसे मार्ग में स्वर्ण कलश धन से भरपूर मिला, उसको लेकर वह घर आया, प्रसन्न हो माता से कहा कि माँ! यह धन मार्ग से प्राप्त हुआ है, माता ने धन देखकर शिव महिमा का वर्णन किया ।

राजपुत्र को अपने पास बुलाकर बोली- देखो पुत्र, यह धन हमें शिवजी की कृपा से प्राप्त हुआ है। अतः प्रसाद के रूप में दोनों पुत्र आधा आधा बाँट लो। माता का वचन सुन राजपुत्र ने शिव-पार्वती का ध्यान किया और बोला- पूज्य, यह धन आपके पुत्र का ही है, मैं इसका अधिकारी नहीं हूँ। मुझे शंकर भगवान और माता पार्वती जब देंगे, तब लूँगा। इतना कहकर वह राजपुत्र शंकर जी की पूजा में लग गया।

एक दिन दोनों भाईयों का प्रदेश भ्रमण का विचार हुआ। वहाँ उन्होंने अनेक गन्धर्व कन्याओं को क्रीड़ा करते हुए देखा। उन्हें देख शुचिव्रत ने कहा- भैया, अब हमें इससे आगे नहीं जाना है। इतना कह शुचिव्रत उसी स्थान पर बैठ गया। परन्तु राजपुत्र अकेला ही स्त्रियों के बीच में जा पहुँचा ।

वहाँ एक स्त्री अति सुन्दरी राजकुमार को देख मोहित हो गई और राजपुत्र के पास पहुँचकर कहने लगी कि हे सखियो! इस वन के समीप ही जो दूसरा वन है, तुम वहाँ जाकर देखो भाँति-भाँति के पुष्प खिले हैं, बड़ा सुहावना समय है, उसकी शोभा देखकर आओ। मैं यहाँ बैठी हूँ, मेरे पैर में बहुत पीड़ा है। ये सुन सब सखियाँ दूसरे वन में चली गयीं। वह अकेली सुन्दर राजकुमार की ओर देखती रही। इधर राजकुमार भी कामुक दृष्टि से निहारने लगा।

युवती बोली- आप कहाँ रहते हैं? वन में कैसे पधारे? किस राजा के पुत्र हैं? क्या नाम है? राजकुमार बोला- मैं विदर्भ-नरेश का पुत्र हूँ, आप अपना परिचय दें। युवती बोली- मैं बिद्रविक नामक गन्धर्व की पुत्री हूँ। मेरा नाम अंशुमति है। मैंने आपकी मनःस्थिति को जान लिया है कि आप मुझ पर मोहित हैं।

विधाता ने हमारा तुम्हारा संयोग मिलाया है। युवती ने मोतियों का हार राजकुमार के गले में डाल दिया। राजकुमार हार स्वीकार करते हुए बोला कि हे भद्रे! मैंने आपक प्रेमोपहार स्वीकार कर लिया है, परन्तु मैं निर्धन हूँ। राजकुमार के इन वचन को सुनकर गन्धर्व कन्या बोली कि मैं जैसा कह चुकी हूँ वैसा ही करूंगी। आप अपने घर जायें। इतना कहकर वह गन्धर्व कन्या सखियों से जा मिली। घर जाकर राजकुमार ने शुचिव्रत को सारा वृतांत कह सुनाया।

शनि प्रदोष व्रत कथा के अनुसार जब तीसरा दिन आया, वह राजपुत्र शुचिव्रत को लेकर उसी वन में जा पहुँचा। वही गन्धर्व राज अपनी कन्या को लेकर आ पहुँचा। इन दोनों राजकुमारों को देख आसन दे कहा कि मैं कैलाश पर गया था, वहाँ शंकर जी ने मुझसे कहा कि धर्मगुप्त नाम का राजपुत्र है जो इस समय राज्य-विहीन निर्धन है। मेरा परम भक्त है। हे गन्धर्व राज! तुम उसकी सहायता करो। मैं महादेव जी की आज्ञा से इस कन्या को आपके पास लाया हूँ। आप इसका निर्वाह करें, मैं आपकी सहायता कर आपको राजगद्दी पर बिठा दूँगा।

इस प्रकार गन्धर्व राज ने कन्या का विधिवत विवाह कर दिया। विशेष धन और सुन्दर गन्धर्व कन्या को पाकर राजपुत्र अति प्रसन्न हुआ। भगवत कृपा से वह समयोपरान्त अपने शत्रुओं को दमन करके राज्य का सुख भोगने लगा। जो शनि प्रदोष व्रत कथा का पाठ करता है, उसे खोयी हुई पद-प्रतिष्ठा, संपत्ति अवश्य ही प्राप्त हो जाती है।


दूसरा शनि प्रदोष व्रत कथा

शनि प्रदोष व्रत की पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीनकाल में एक नगर सेठ थे। सेठजी के घर में हर प्रकार की सुख-सुविधाएं थीं लेकिन संतान नहीं होने के कारण सेठ और सेठानी हमेशा दुःखी रहते थे। 

काफी सोच-विचार करके सेठजी ने अपना काम नौकरों को सौंप दिया और खुद सेठानी के साथ तीर्थयात्रा पर निकल पड़े। अपने नगर से बाहर निकलने पर उन्हें एक साधु मिले, जो ध्यानमग्न बैठे थे। सेठजी ने सोचा, क्यों न साधु से आशीर्वाद लेकर आगे की यात्रा की जाए। 

सेठ और सेठानी साधु के निकट बैठ गए। साधु ने जब आंखें खोलीं तो उन्हें ज्ञात हुआ कि सेठ और सेठानी काफी समय से आशीर्वाद की प्रतीक्षा में बैठे हैं। साधु ने सेठ और सेठानी से कहा कि मैं तुम्हारा दुःख जानता हूं। तुम शनि प्रदोष व्रत करो, इससे तुम्हें संतान सुख प्राप्त होगा। 

साधु ने सेठ-सेठानी प्रदोष व्रत की विधि भी बताई और भगवान शंकर की यह वंदना बताई। 

हे रुद्रदेव शिव नमस्कार।

शिवशंकर जगगुरु नमस्कार।।  

हे नीलकंठ सुर नमस्कार। 

शशि मौलि चन्द्र सुख नमस्कार।।

हे उमाकांत सुधि नमस्कार।

उग्रत्व रूप मन नमस्कार।।

ईशान ईश प्रभु नमस्कार।

विश्‍वेश्वर प्रभु शिव नमस्कार।। 

दोनों साधु से आशीर्वाद लेकर तीर्थयात्रा के लिए आगे चल पड़े। तीर्थयात्रा से लौटने के बाद सेठ और सेठानी ने मिलकर शनि प्रदोष व्रत  किया जिसके प्रभाव से उनके घर एक सुंदर पुत्र का जन्म हुआ।

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