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( 2022) शेखचिल्ली की 10 मजेदार कहानियां

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शेख चिल्ली कौन था?

शेख चिल्ली कौन था?. इसका किसी को नहीं पता, पर शेख चिल्ली की कहानियों (sheikh chilli ki kahani) ने भारत और पाकिस्तान में कई पीढ़ियों का मन बहलाया है। शेख चिल्ली को अक्सर एक बेवकूफ और ऐसे सरल इंसान जैसे दर्शाया जाता है जो किसी भी काम को ठीक नहीं कर पाता है! वो दिन में सपने देखता है और हवाई महल बुनता है।

उसकी पैदाइश एक शेख परिवार में हुई। शेख – ‘मुसलमानों की चार मुख्य उपजातियों में से एक है। शेख चिल्ली की मां एक गरीब उसके बारे में लिखी कहानियों में सच्चाई और झूठ को अलग-अलग करना बहुत कठिन हो जाता है।

एक मत के अनुसार शेख चिल्ली का जन्म पाकिस्तान के बलूचिस्तान में हुआ, फिर वो हरियाणा में आ गया जहां उसने कई वर्ष झज्जर के नवाब के लिए काम किया। उसकी मृत्यु कुरुक्षेत्र में हुई जहां आज भी शेख चिल्ली के मकबरे को देखा जा सकता है। ऐसा कहा जाता था कि बुढ़ापे में शेख चिल्ली फकीर बन गया था। उसका नाम ‘चिल्ली’ शायद उसके द्वारा चालीस दिन तक लगातार प्रार्थना – जिसे ‘चिल्ला’ कहते हैं .. करने के कारण पड़ा हो।

यह मत ऐतिहासिक रूप से सच है या नहीं इसकी पुष्टि करना संभव नहीं है। इस महाद्वीप में बीरबल और तेनालीराम नाम के दो मजाकिया पात्र, काफी मशहूर हैं। शेख चिल्ली में इन दोनों हस्तियों की हाजिरजवाबी भले ही न हो परंतु उसे बचपन से जवानी तक महज़ लोगों के उपहास का पात्र मानना, इंसानियत के खिलाफ सरासर नाइंसाफी होगी। वो एक सीधा-सादा इंसान था। उसके समाज के अनुसार चलने के तरीके शायद हमें हास्यास्पद लगें परंतु उसकी नियत में कोई खोट नहीं थी। उसके दिल में किसी के खिलाफ ईयां या नफरत नहीं थी, वो चालाकी, छल और फरेब से दूर एक निष्कपट और मददगार इंसान था। दिन में सपने देखना – शायद यह गलत हो। परंतु फिर वो कौन है जो आने वाले सुनहरे कल के सपने नहीं देखता?

सच बात तो यह है कि हम सभी में शेख चिल्ली का कुछ-न-कुछ अंश है। इतने बरसों से शेख चिल्ली की लोकप्रियता का शायद यही सच्चा कारण है।

ऊपर लिखा गया लेख शेखचिल्ली की कहानियां नमक किताब से लिया गया है जिसके लेखक अनूप लाल है और अनुवादक अरविन्द गुप्ता है।


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अब्बू ने मुझे क्यों मारा? (sheikh chilli ki kahani)

शेख आखिर शेखचिल्ली बन ही गया। मदरसे में जाने पर उसे मालूम हआ कि वह चार साल का है। मदरसे से उसे पहली तालीम यही हासिल हुई कि यदि कोई उससे उसका परिचय पछे तो वह बताएगा कि उसका नाम शेखचिल्ली वल्द शेख बदरुद्दीन है। और अगर इसके बाद उससे कोई उसकी उम्र पूछे तो वह बताए कि उसकी उम्र चार साल है। अमूमन रोज ही उसे अपना परिचय देना सिखाया जाता। शेखू होशियार तो था मगर उसकी होशियारी में मासूमियत बहत थी जिसके कारण प्रायः उसे मौलाना साहब की डॉट पड़ जाती। इसी डाँट के डर से उसे अपना परिचय और अपनी उम्र अच्छी तरह याद हो गई। अलिफ, बे, ते भी उसने खूब मेहनत करके सीख लिया।

मदरसे के छह माह पूरे होने पर शेख साहब एक दिन उसकी तालीम के बारे में दरियाफ्त करने के लिए मदरसे पहुँचे। मौलाना ने उन्हें बताया कि शेखचिल्ली अन्य लड़कों से इस मामले में बेहतर है कि उसे जब कोई बात बताई जाती है, तब वह उस बात को इतनी बार रटता है कि वह बात उसे इस तरह याद हो जाती है जिसे कभी भुला ही नहीं जा सकता।

मगर शेखचिल्ली में एक ऐब भी है कि उसे जो कुछ भी याद हो जाता है उसमें वह कोई सुधार करना सोच ही नहीं सकता। मौलाना का कहना था कि अभी की पढ़ाई के लिए तो यह बात ठीक है मगर रोज बदलती दुनिया में शेखू का यह गुण आगे की पढ़ाई के लिए ठीक नहीं है क्योंकि रोज नई खोजें हो रही हैं, रोज नए आविष्कार हो रहे हैं इसलिए छात्रा को तो लचीली सोच का होना ही चाहिए मगर शेखचिल्ली अगर ‘क’ से कबूतर सीखेगा और उसे कोई ‘क’ से कलम पढ़ाए तो वह अड़ जाएगा कि ‘क’ से कलम नहीं, कबूतर होता है।

शेख बदरुद्दीन यह सुनकर थोड़े दुखी हुए मगर मौलाना ने उन्हें तसल्ली दी-“इसमें दुखी होने की कोई बात नहीं है, समय आने पर सब ठीक हो जाएगा। शेखचिल्ली अभी बच्चा है और खुदा की खैर मानिए कि समय रहते उसकी कमजोरी हम लोगों की समझ में आ गई है। हम लोग उसकी यह कमी दर करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे।

वैसे आपको जानकर खुशी होगी कि शेखचिल्ली ने छमाही परीक्षा में अपनी कक्षा में सबसे अधिक अंक हासिल किए हैं। यह उपलब्धि उसकी उसी कमी की बदौलत है। वह अपनी धुन का पक्का है और बताई गई बात को किसी भी कीमत पर याद रखना चाहता है। उठते-बैठते, चलते-फिरते आप उसे बुदबुदाते हुए देखेंगे… जब भी आप उसे बुदबुदाते हुए देखें तो समझ जाएँ कि वह कुछ याद करने की कोशिश कर रहा है।”

शेखू के बारे में शेख बदरुद्दीन को यह नई जानकारी मिली। वे मदरसे से घर वापस आ गए। रसीदा बेगम को उन्होंने सारी बातें बताईं। रसीदा बेगम ने ढाढ़स बँधाते हुए कहा-“मौलाना ने अपने शेखू में जो कमियाँ बताई हैं, देख लेना, एक दिन वही कमियाँ शेखू की विशेषता बन जाएँगी और उन कमियों की बदौलत ही शेखू की देश-दुनिया में शोहरत होगी। वह छमाही परीक्षा में जैसे अव्वल आया है वैसे ही सालाना परीक्षा में भी अव्वल आएगा।”

रसीदा बेगम की बातें सुनकर शेख बदरुद्दीन की चिन्ता कम हो गई और वे अपनी बेगम के साथ बैठकर सुनहरे कल के ताने-बाने बुनने लगे। बात चली तो चलती ही गई। अचानक रसीदा बेगम को याद आया कि शेखचिल्ली के लिए उन्होंने अजमेर वाले बाबा की मन्नत माँगी थी। याद आते ही रसीदा बेगम ने शेख बदरुद्दीन से कहा-“ऐ जी! शेखू जब गर्भ में था तब ही मैंने अजमेर वाले बाबा की मन्नत मांगी थी। अब शेख चार साल से भी ज्यादा का है, हमें चलकर मन्नत उतारनी चाहिए। हो सकता है कि मन्नत उतरने पर शेख का दिमाग और उसकी सोच दुरुस्त हो जाए! अजमेर वाले बाबा के बारे में मैंने सुन रखा है कि उनके दरबार से कोई खाली नहीं लौटता है…चलो न! एक मन्नत पूरी हो चुकी है…हमें वह मन्नत तो उतारनी ही होगी…वहीं अजमेर वाले बाबा के सामने अपने शेख की समस्या भी रख आएँगे। बाबा ही उसका निदान करेंगे और उसे दुरुस्त दिमाग बख्शेंगे।”

शेख बदरुद्दीन को इनकार करते नहीं बना। उन्होंने रसीदा बेगम को विश्वास दिलाया कि खेत-पथार का बन्दोबस्त देखकर दो-चार दिनों में अजमेर चलने का इन्तजाम कर लेंगे।

अपने पति की इसी आदत पर फिदा थीं रसीदा बेगम। मुँह से कुछ निकला नहीं कि वे उसको पूरा करने में लग जाएँगे…!

अपनी बेगम से बात करने पर शेख बदरुद्दीन का मन शान्त हो गया। शेखू के बारे में जो अजीबोगरीब खयालात उनके मन में आने लगे थे, वे स्वतः दूर हो गए। अब उनके मन में अजमेर यात्रा को लेकर नए खयाल उभरने लगे। कई वर्ष हो गए, वे गाँव से बाहर नहीं निकले। शेख ने तो गाँव से बाहर का जीवन ही नहीं देखा है! शेख साहब सोच रहे थे कि यह पहला मौका होगा जब शेखू रेलगाड़ी देखेगा, मोटरगाड़ी, बस, रिक्शा-सबकी सवारी कराऊँगा उसे। अजमेर जाने से पहले पैसों का अच्छा बन्दोबस्त कर लूँ…ताकि बेगम की कोई ख्वाहिश अधूरी न रहे और शेखू को भी यह सफर याद रहे कि अब्बू के साथ गए तो रेलगाड़ी पर चढ़े, मोटरकार पर सफर किया. बस पर बैठे…रिक्शा पर घमे…।

इस तरह शेख बदरुद्दीन ने पैसे का प्रबन्ध कर लिया और एक दिन अजमेर जानेवाली ट्रेन का टिकट कटाकर ले आए। रसीदा बेगम की खुशियों का ठिकाना नहीं रहा। शेखू के जन्म के बाद से वह भी कहीं घूमने नहीं गई थीं। शेख बदरुद्दीन की ओर देखकर रसीदा बेगम ने अनुमान लगा लिया कि इस यात्रा को लेकर शेख साहब भी खुश हैं। रसीदा बेगम ने खुशीखुशी सामान सहेजा। रास्ते में खाने के लिए मठरियाँ और नमकीन तैयार किया। जब अपने ढंग से उन्होंने यात्रा की तैयारियाँ मुकम्मिल कर लीं तब शेख साहब से कहा-“ऐ जी! अजमेर वाले बाबा के पास जाने के लिए मैंने सारी तैयारियां पूरी कर ली हैं।”

शेख बदरुद्दीन अपनी बेगम की उत्सुकता समझ रहे थे। उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा-“ठीक है बेगम! हम लोग अपने घर से सुबह चार बजे निकलेंगे। हमने कमरूँ मियाँ को बैलगाड़ी लेते आने को कहा है। बैलगाड़ी से कमरूँ मियाँ हमें स्टेशन छोड़ आएँगे। जब तक हम लोग वापस नहीं आ जाते तब तक कमरूँ मियाँ ही घर की रखवाली करेंगे। सुबह छह बजे अजमेर जानेवाली टेन खुलेगी और दूसरे दिन सुबह छह बजे अजमेर पहुँचेगी। समझ लो कि चैबीस घंटे ट्रेन में ही बिताना होगा।”

यह सब सुनकर रसीदा बेगम रोमांचित हो उठीं। रात गहराती गई मगर बेगम रसीदा को कोई थोड़ी-सी झपकी लेने के लिए राजी नहीं कर पाया। सुबह चार बजे कमीं मियाँ बैलगाड़ी लेकर हाजिर हो गए। शेख बदरुद्दीन ने सामान बैलगाड़ी पर रखा और रसीदा बेगम अपने प्यारे बेटे शेख की उँगलियाँ थामे बैलगाड़ी पर सवार हईं। शेख के लिए यह पहला मौका था जब वह अपने अब्बू और अम्मी के साथ किसी यात्रा पर निकल रहा था। अम्मी ने उसे खूब सजाया था और शानदार कपड़े पहनाए थे। उसका दिल झूम रहा था।

शेख बदरुद्दीन घर के दरवाजों में ताला लगा आए और बैलगाड़ी पर सवार होकर बोले-“चलो कमीं मियाँ!”

बैलगाड़ी चल पड़ी। रास्ते भर शेखू चहकता रहा। कभी अम्मी से पूछता-“रेलगाड़ी कैसी होती है?” तो कभी अब्बू से पूछता-“हम लोग मोटरगाड़ी पर भी सवारी करेंगे न?”

बैलगाड़ी अपनी रफ्तार में चलती रही और स्टेशन पर पहुँचकर रुकी। अजमेर जानेवाली ट्रेन प्लेटफार्म पर लगनेवाली थी। शेख बदरुद्दीन और कमरूँ मियाँ ने मिलकर बक्से उतारे और उन्हें लेकर प्लेटफार्म पर पहुँच गए। थोड़ी ही देर में ट्रेन आ गई। एक डिब्बे में खाली सीटें देखकर शेख बदरुद्दीन ने अपना सामान उस डिब्बे में रखवा लिया और कमरूँ मियाँ के हाथ में दस रुपए थमाते हुए कहा-“कमरूँ मियाँ! घर का खयाल रखना।”

कमरूँ मियाँ उन्हें आदाब करता हुआ चला गया। शेख बदरुद्दीन ने रसीदा बेगम और शेख को डिब्बे में बैठाया और खुद भी डिब्बे में आ गए। गाँव के स्टेशन पर ट्रेन अधिक देर तो रुकती नहीं है इसलिए शेख बदरुद्दीन पहले से ही सचेत थे।

शेखू के लिए ट्रेन का यह सफर किसी अजूबे से कम नहीं था-झक- झक, छुक-छुक, झकझक, छुक-छुक करती रेलगाड़ी भाग रही थी और रेलगाड़ी की खिड़की से शेखू बाहर का नजारा देख रहा था-मुदित मन से।

तभी एक आदमी काला कोट पहने टेन के उस डिब्बे में आया और टेन में बैठे लोगों के टिकट माँगकर देखने लगा। शेखू टेन की खिड़की भूलकर उस आदमी को देखने लगा। वह काला कोटवाला जब शेख बदरुद्दीन के पास आया और उन्हें टिकट दिखाने को कहा तो शेख बदरुद्दीन ने जेब से दो टिकट निकालकर उसे दिखा दिये। तभी उस काले कोटवाले की नजर

शेखचिल्ली पर पड़ी और उसने शेख बदरुद्दीन से पूछा-“और यह बच्चा? क्या आपके साथ

“हाँ, जी हाँ!” शेख बदरुद्दीन ने उत्तर दिया-“हाँ-हाँ, यह मेरा बेटा है-शेखू! तीन साल का है इसलिए टिकट नहीं लिया है।”

शेख बदरुद्दीन के मुँह की बात खत्म भी नहीं हो पाई थी कि शेखू ने टनक-भरी आवाज में कहा-“गलत! मैं शेखू नहीं! अपना नाम तो शेखचिल्ली है जनाब! और मैं तीन साल का नहीं. चार साल का है और पाँचवें साल में प्रवेश कर चुका है, तब ही तो अम्मी और अब्बू मन्नत उतारने अजमेर वाले बाबा के पास जा रहे हैं…”

काले कोटवाले टी.टी.ई. ने एक बार शेखचिल्ली की तरफ देखा और उसका टिकट बनाकर शेख बदरुद्दीन से कहा-“अब तो आपको इसके टिकट के पैसे फाइन के साथ भरने ही पड़ेंगे।”

शेख बदरुद्दीन ने जेब से बिना कुछ कहे रुपए निकाले और टिकट एवं फाइन की रकम चुकाई। टी.टी.ई. के जाते ही शेख बदरुद्दीन ने शेखू के गाल पर एक चाँटा रसीद किया। बेचारा शेखू सोचने लगा-‘अब्बू ने मुझे क्यों मारा?’


चोरी न करने का संकल्प (sheikh chilli ki kahani)

एक दिन एक भद्र महिला शेखचिल्ली की दुकान में कुछ खरीदने के लिए आई। शेखचिल्ली उसे ब्लाउज के कपड़े, सुट-सलवार के कपड़े दिखाने लगा। उस महिला ने एक सुट का कपड़ा लिया और उस कपड़े के पैसे चुकाए। पैसे लेकर शेखचिल्ली अपने गल्ले के पास जा बैठा और गल्ले में से अपनी गोल टोपी निकालकर पहन ली। महिला ने जाते-जाते, ठमककर शेखचिल्ली की तरफ देखा और उसे पहचान गई। यह वही महिला थी जिसके घर में कुत्ते का पीछा करते हए शेखचिल्ली घुस गया था और वहाँ से लौटते समय पलंग से सौसौ के नोटों की गड़ी उठाकर ले आया था। महिला ने उसे गुसलखाने से देखा था। उसकी नुकीली दाढ़ी और गोल टोपी उसे याद रह गई थी। घर से रुपए चोरी किए जाने की घटना की जानकारी उसने पुलिस को दे दी थी जिसमें उसने चोर का हुलिया भी बता रखा था।

महिला ने पूरे इत्मीनान के साथ शेखचिल्ली का चेहरा देखा और जब उसे यह तसल्ली हो गई कि यह वही आदमी है जो उसके घर से नोटों की गड्डी ले आया था तब वह उसकी दुकान से बिना कुछ कहे निकली। वह सीधा पुलिस थाने गई और वहाँ उसने पुलिस को जानकारी दे दी कि जिस चोर ने उसके घर से दस हजार रुपए चुराए थे, वह बाजार मंठे कपड़े की दुकान चला रहा है।

महिला की सूचना के बाद पुलिस हरकत में आई और शेखचिल्ली के कपड़े की दुकान पर छापा मारकर उसे पकड़ लिया। पहले तो अपनी गिरफ्तारी से चकित हुआ लेकिन जब पुलिस ने उससे पूछताछ शुरू की तब उसकी समझ में आ गया कि मामला दस हजार रुपए का है। उसी दस हजार रुपए का जो वह एक घर से रोटी के एवज में उठा लाया था। उस र का कुत्ता उसके हाथ से रोटी छीनकर भाग गया था और वह कुत्ते का पीछा करते हुए उस घर में जा घुसा था और पलंग पर रखी नोटों की गड्डी उड़ा लाया था।

पुलिस थाने में उससे पूछताछ करने लगी-“बताओ! तुमने उस भद्र महिला जुबैदा खातून का रुपया लिया था या नहीं?”

“मैं किसी भद्र महिला जुबैदा खातून को नहीं जानता।” “तुमने किसी घर से पलंग पर रखे नोटों का बंडल चुराया।” थानेदार ने रौब डालते हुए पूछा।

“हाँ, एक कुत्ते के घर से! कुत्ता मेरी रोटी चुराकर भागा था। मैं कुत्ते के पीछे दौड़ता हुआ उस घर में घुसा था और कुत्ते को नहीं पकड़ पाने के कारण मैं वहाँ से रुपए लेकर भाग आया था।”

थानेदार ने शेखचिल्ली के जवाब से ही समझ लिया कि यह आदमी ईमानदार भी है और परले दर्जे का बेवकूफ भी।

दूसरे दिन दंडाधिकारी की इजलास में शेखचिल्ली की पेशी हुई और आदेश हुआ-‘शेखचिल्ली की दुकान की नीलामी कर उस महिला के पैसे वापस कर दिए जाएँ और शेखचिल्ली को तीन महीने के लिए जेल भेज दिया जाए।’ दंडाधिकारी ने मामले की सुनवाई करते हुए आगे कहा- “शेखचिल्ली ईमानदार है। वह समझ रहा है कि वह रोटी के बदले रुपए ले आया है। उसकी बातों से प्रकट होता है कि उसे अपने अपराध का ज्ञान नहीं है। मगर उससे अनजाने ही सही, दंडनीय अपराध हुआ है जिसके कारण उसे सजा भुगतनी होगी। उसकी नेकचलनी और ईमानदारी के कारण उसे मात्रा तीन महीने की सजा ही बामशक्कत दी जाती है।” |

इस तरह शेखचिल्ली की दुकान की नीलामी हो गई और शेखचिल्ली को जेल भेज दिया गया।

शेखचिल्ली के जेल जाने की खबर जब उसकी अम्मी रसीदा बेगम को मिली तो उसका कलेजा मुँह को आ गया। वह रोती- कलपती भागी-भागी जेल पहुँची और शेखचिल्ली से मिलकर बिलख पड़ी।

शेखचिल्ली ने अपनी अम्मी को समझाया-“अम्मी! जो होना था सो हो गया। मैं अपनी पूर्व की स्थिति में आ गया हूँ। कोई बात नहीं है, अम्मी! जेल से निकलकर मैं जी लगाकर काम करूँगा और फिर बेहतर जिन्दगी जिएंगे हम सब। यह मेरा वादा है।”

अम्मी को विदा करके शेखचिल्ली अपने बीते दिनों को याद करने लगा।

दूसरे दिन जब उसकी अम्मी उससे मिलने आई तब उसने कहा- “अम्मी! तुम रजिया को लेकर गाँव वापस चली जाओ। जेल से निकलने के बाद में गाँव आऊँगा तब सभी मिलकर सोचेंगे कि अब आगे क्या करना है।” थोड़ी देर चुप रहने के बाद शेखचिल्ली ने पुनः कहा-“अम्मी! मुझसे मिलने एक दिन भी रजिया नहीं आई, क्या बात है? क्या वह मुझसे नाराज है?”

“नहीं बेटे! वह क्यों नाराज होने लगी? तुम्हारी गिरफ्तारी की वजह से वह मायूस है और अपने गम से हलकान है। मैं उसे कल लेकर आऊँगी। तू चिन्ता न कर।” शेखचिल्ली को ममता से निहारते हुए रसीदा बेगम ने कहा।

अपने बेटे से जेल में मिलकर जब रसीदा बेगम घर लौटी तब उसने अपनी बहू रजिया बेगम से बताया कि शेखचिल्ली उससे मिलना चाहता है तब अचानक रजिया बेगम फफकफफककर रो पड़ी और बोली-“अम्मी, मुझसे यह बर्दाश्त नहीं होगा कि मैं अपने पति को जेल की सलाखों के पीछे देखें। जो गनाह उन्होंने किया है उसकी सजा तो वे भोग रहे हैं और उनसे सम्बन्धित होने के कारण सारी दुनिया मुझे चोर की बीवी कहेगी और आपको चोर की अम्मी। यह मुझसे कतई बर्दाश्त नहीं होगा। मैं तो उनसे मिलने जेल किसी भी हालत में नहीं जाऊँगी।”

बहुत मनाने के बाद भी जब रजिया बेगम नहीं मानी तब रसीदा बेगम अकेले ही शेखचिल्ली से मिलने दूसरे दिन जेल पहुँची।

रसीदा बेगम को अकेले आया देख वह मन ही मन समझ गया कि रजिया बेगम उससे नाराज है। उसने अपनी अम्मी से कहा-“अम्मी! रजिया से कहना-मैं उसकी नजर मंठे अच्छा इनसान बनकर लौटूंगा।”

इसके बाद रसीदा बेगम ने शेखचिल्ली को बताया कि वह मकान मालिक के पैसे चुकाकर उसका घर खाली करके गाँव लौट रही है। जेल से छूटने के बाद वह सीधे वहीं

आए।

अपने बेटे से विदा लेकर रसीदा बेगम वापस लौट गाई। वह उदास थी और मायूस भी।

सास की उदासी को समझते हुए रजिया बेगम ने उससे कहा- “अम्मीजान! आप सोच रही होंगी कि मैं कितने कठोर दिल की हूँ कि जेल मं बन्द अपने पति से मिलने नहीं गई। मगर अम्मी, वे इतने भोले और लापरवाह हैं कि उन्हें कभी अपनी गलतियों का अहसास भी नहीं होता है। मैंने यह कठोरता उन्हें समझदार बनाने के लिए अपना ली है। वे अब भी बच्चों जैसी हरकतं करते हैं…मुझे तो हैरत होती है।”

रसीदा बेगम ने रजिया की ओर देखा और उसे तसल्ली देती हुई बोलीं-“बहू! तुम्हारा कहना जायज है। अल्लाह करे कि शेखचिल्ली अब समझदारी से काम लेना सीख जाए। अगर उसने थानेदार के सामने सच की जगह झूठ बोल दिया होता तो यह आफत गले नहीं पड़ी होती। खैर! खुदा जो करता है, भले के लिए करता है।”

दूसरे दिन रसीदा बेगम अपनी बहू रजिया के साथ गाँव पहुँच गईं और अपनी सामान्य दिनचर्या में लग गईं। अभी उन्हें आए पन्द्रह दिन भी नहीं बीते थे कि गाँव मं हैजा फैल गया और शेख बदरुद्दीन का उल्टियाँ करते-करते इन्तकाल हो गया।

रजिया बेगम सन्न रह गई ससुर की मौत से और रसीदा बेगम को काठ सा मार गया। भावशून्य अवस्था में ही रसीदा और रजिया ने सारे सगे-सम्बन्धियों को सूचना दी। शेख बदरुद्दीन को सुपुर्दे-खाक किया गया।

शेखचिल्ली को जब जेल में अपने अब्बू के इन्तकाल की खबर मिली तो वह फूट-फूटकर रोया और तीन महीना बीतने की बेकली से प्रतीक्षा करने लगा। अब उसके लिए अम्मी और रजिया की परवरिश के लिए कुछ करने की जरूरत आन पड़ी थी। किसी तरह तीन महीने की अवधि पूरी हुई। शेखचिल्ली जेल से बाहर आया और सीधे अपने गाँव पहुँचा।

अम्मी उससे लिपटकर फूट-फूटकर रोईं। मगर रजिया बेगम उससे कोई बात करने के लिए तैयार नहीं हुई। अम्मी के गुहार लगाने पर उसने कहा- “अम्मी! पहले आप अपने बेटे को कहें कि जिन्दगी में कभी भी कोई चोरी नहीं करने की शपथ लें तब ही मैं उनसे बातें करूँगी. नहीं तो मैं उनकी ओर देखेंगी भी नहीं।”

बिना अम्मी के कुछ बोले ही शेखचिल्ली ने रजिया बेगम के सामने शपथ ली कि वह जीवन में कभी भी किसी की कोई चीज नहीं चुराएगा, तब रजिया बेगम का गुस्सा शान्त हुआ और वह उससे लिपटकर देर तक रोती रही।

शेखचिल्ली उसके सिर पर थपकियाँ देकर उसके शान्त होने का इन्तजार करता रहा और जब वह शान्त हुई तो उसे बाँहों मंठे लेकर अपने कमरे में चला गया। एक अरसे बाद शेखचिल्ली अपने घर में चैन की नींद सोया।


देना-एक गज दूध! (sheikh chilli ki kahani)

शेखचिल्ली का बचपन अजीबोगरीब वाकयात से भरा था। शेखचिल्ली के प्रारम्भिक जीवन में सरोकारवाले बहुत कम लोग थे। एक अब्बू, दूसरी अम्मी और जब वह मदरसा जाने लगा तब तीसरे मौलाना साहब। कुल जमा तीन आदमी जिनसे शेखचिल्ली की बातें होतीं, नसीहतें मिलतीं और डाँट पड़ती। यह जरूर है कि इसके बावजूद शेखचिल्ली में हुनरमन्द और बुद्धिमान दिखने का जज्बा था।

एक दिन शेखचिल्ली ने अपनी अम्मी से कहा-“अम्मी! तुम या अब्बू मुझसे कोई काम नहीं कराते…आखिर क्यों? सभी बच्चों के अम्मी-अब्बू उनसे कोई-न-कोई काम कराते हैं मगर तुम तो मुझे कुछ करने ही नहीं देतीं! क्या मैं इतना नाकारा हूँ कि तुम या मेरे अब्बू मुझे किसी काम के काबिल नहीं समझते?”

शेखू की बात सुनकर रसीदा बेगम चैंक पड़ीं। अरे! यह छोटा बच्चा, अभी से क्या काम करेगा? अभी तो खुद से बधना भर पानी ले नहीं सकता और पूछ रहा है कि काम क्यों नहीं करातीं? मगर यह बात उन्होंने शेखचिल्ली पर प्रकट नहीं होने दी और उसे प्यार से सहलाते हुए बोलीं- “ठीक है, मेरे राजा बेटे! अब मैं तुमसे भी कोई-न-कोई काम कराती रहूँगी।”

माँ का दुलार पाकर शेखचिल्ली खुश हो गया और मदरसे से मिला सबक पूरा करने में लग गया।

दूसरे दिन सुबह जब वह मदरसा जाने के लिए निकला तो देखा, अम्मी दरवाजे पर फेरीवाले से ब्लाउज के लिए कपड़े खरीद रही हैं। उसे पास से गुजरता देखकर अम्मी ने उसे आवाज दी-“जरा इधर तो आना शेखू!”

शेखचिल्ली का भी मन था कि वह फेरीवाले के पास जाकर नए-नए कपड़े देखे। अम्मी की पुकार सुनकर वह खुश हो गया और दौड़कर अम्मी के पास पहुंच गया। अम्मी ने उससे कहा-“बेटे, देख तो इनमें से कौन-सा कपड़ा तुम्हें अच्छा लग रहा है…तुम जो कपड़ा पसन्द करोगे-मैं उसी कपड़े से अपने लिए ब्लाउज बनवाऊँगी।”

शेखचिल्ली ने एक बार रसीदा बेगम की तरफ खुश होकर देखा और फिर उसकी निगाहें फेरीवाले के कपड़ों पर दौड़ने लगीं और अन्ततः उसने लाल-लाल छापोंवाले कपड़े के थान पर अपनी अंगुली रख दी-“अम्मी, यह!”

रसीदा बेगम को भी लाल बूटोंवाला वह कपड़ा पसन्द आ गया और उसने फेरीवाले से कहा-“भैया, इसमें से एक गज निकाल दो।”

फेरीवाले ने अपने पास से एक फीता निकाला और कपड़े के किनारे पर उसे फैलाकर माप लिया और कैंची से कपड़ा काटकर रसीदा बेगम को थमा दिया।

शेखचिल्ली के लिए माप का यह शब्द ‘गज’ नया था और बाँहें फैलाकर कपड़ा मापने का तरीका भी उसके लिए नया और दिलचस्प था। ‘गज’ और हाथ फैलाकर माप लेना ये दो बातें शेखचिल्ली के दिमाग में बैठ गईं, और वह कपड़े मापे जाने के -श्य को याद करता हुआ मदरसे चला गया।

शाम को शेखचिल्ली मदरसे से वापस आया। बस्ता रखकर हाथ-मुँह धोया। तभी रसीदा बेगम ने उसे दुअन्नी थमाते हुए कहा-“बेटा, दौड़कर जाओ और कोनेवाले हलवाई से दो आने का दूध लेकर आओ!”

शेखचिल्ली ने मुट्ठी में दुअन्नी दबाई और दूध लेने के लिए एक बड़ा कटोरा चैके से लेकर दौड़कर हलवाई की दुकान पर पहुँच गया।

गाँव के कई लोग उस हलवाई के पास खड़े थे। हलवाई अपने दोनों हाथ में एक-एक मग पकड़े था और एक हाथ ऊपर करते हुए उससे गरम दुध की धार गिराता और दूसरे हाथ को नीचे कर उस दूध की धार को मग में भर लेता। फिर भरे मगवाला हाथ ऊपर करता और खाली मगवाला हाथ नीचे। यह क्रिया वह बार-बार, यंत्रावत् कर रहा था।

शेखचिल्ली के लिए यह -श्य नया था। दूध ठंडा करने का यह तरीका उसके लिए नया था। वह समझने की कोशिश कर रहा था कि आखिर यह हलवाई क्या कर रहा है! फिर उसे सुबह की घटना याद हो आई। कपड़ावाला भी तो इसी तरह कपड़े की लम्बाई माप रहा था। उसने सोचा-यह दूधवाला जरूर दूध की लम्बाई माप रहा है। ऐसा सोचकर वह गर्वित हआ कि सही वक्त पर उसके दिमाग ने साथ दिया और वह यह समझने के काबिल हुआ कि दूधवाला क्या कर रहा है।

शेखचिल्ली को अपने पास देर से टकटकी लगाए खड़ा देखकर हलवाई ने पहले तो सोचा कि यह लड़का किसी ग्राहक के साथ आया होगा लेकिन जब पहले से खड़े ग्राहक दूध लेकर लौट गए तब भी शेखचिल्ली को वहीं खड़ा देख हलवाई ने पूछा-“ऐ लड़के! तुम्हें क्या चाहिए?”

शेखचिल्ली की तन्द्रा टूटी और उसने कहा-“दूध!” “कितना दूध चाहिए?” हलवाई ने शेखचिल्ली से पूछा। हलवाई के इस प्रश्न से शेखचिल्ली घबरा गया क्योंकि अम्मी ने तो यह बताया ही नहीं था कि कितना दूध लेना है? फिर भी अक्ल पर जोर डालते हुए उसने कहा-“एक गज दूध “हाँ!” शेखचिल्ली ने कहा और दुअन्नी हलवाई को थमा दी। हलवाई ने उसके कटोरे में दो आने का दूध डाल दिया। जब शेखचिल्ली दूध लेकर, दुकान से अपने घर की ओर चलने लगा तब उसके बढ़ते ही एक ग्राहक ने दुकानदार से जोर से कहा-“देना भैया, मुझे भी एक गज दूध!” और फिर समवेत ठहाके की गूंज शेखचिल्ली के कानों से टकराई।

शेखचिल्ली यह तो समझ रहा था कि लोग उसे चिढ़ाने के लिए हँस रहे हैं मगर वह यह नहीं समझ रहा था कि एक गज दूध माँगकर उसने ऐसा क्या कर दिया कि लोग उसे हँसी का पात्रा बनाने लगे हैं। ठहाके की आवाज अभी भी उसे पीछे से आती महसूस हो रही थी और वह लम्बे डग भरता हुआ अपने घर वापस जा रहा था…यह सोचता हुआ कि हँसो…हँसते रहो, मेरी बला से!


न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी (sheikh chilli ki kahani)

शेखचिल्ली ने अपनी मेहनत से कुछ पैसे अर्जित किए और धीरे-धीरे इस लायक भी हो गया कि अपनी पसन्द की कोई चीज खरीद ले। बचपन से ही उसका दिल एक घोड़े के लिए मचलता था। प्रायः वह सोचता था कि यदि उसके पास पैसे होंगे तब वह भी अपने लिए घोड़ा खरीदेगा।

कुछ पैसे बचाने के बाद उसने रजिया बेगम से अपनी दिली तमन्ना बताई तो रजिया भी यह सुनकर खुशी से मचल उठी। उसने कहा-“हाँ! बेहतर है कि अपने दरवाजे पर भी एक घोड़ा हो। कभी-कभी मेरा मन भी अपनी अम्मी और अब्बू से मिलने के लिए मचलता है। यदि अपना घोड़ा होगा तो सुबह हम लोग चलेंगे और अम्मी-अब्बू से मिलकर शाम को लौट आएंगे।”

पत्नी से बढ़ावा मिलने पर शेखचिल्ली पैसे लेकर निकल गया घोड़ा खरीदने के लिए। मगर उसके पास जितने पैसे थे उतने में घोड़ा तो नहीं मिला मगर एक दुबली-पतली बीमार-सी घोड़ी मिल गई। उसने वही थोड़ी खरीदकर सन्तोष कर लिया। वह घोड़ी को लेकर पैदल ही घर आया। घर के पास पहुँचने पर उसे एक आदमी ने टोका-“शेखचिल्ली! तुम भी अजीब इनसान हो। घोड़ी तुम्हारे साथ है फिर भी पैदल चल रहे हो?”

शेखचिल्ली तुरन्त घोड़ी पर बैठ गया और अपने घर पहुँच गया। घोड़ी से उतरकर उसने अम्मी और रजिया को आवाज लगाई। जब दोनों बाहर आईं तब उसने कहा-“देखो, बचत का कमाल! अपनी बचत से मैंने यह घोड़ी खरीदी है।”

दुबली-पतली घोड़ी को देखकर उसकी अम्मी ने कहा-“ठीक है बेटा… मगर तुम्हारी घोड़ी बीमार-सी दिखती है। इसे रोज भरपूर खाना खिलाना होगा…कुछ दिन लगेंगे, घोड़ी ठीक दिखने लगेगी।”

घोड़ी लाए एक सप्ताह बीत चला था। रजिया बेगम एक दिन सुबह-सुबह शेखचिल्ली से मनहार करने लगी-“आज मझे अम्मी की बड़ी याद आ रही है। चलो न! अपनी घोड़ी से चलते हैं। शाम तक लौट आएंगे।”

शेखचिल्ली मान गया। उसने अपनी बेगम से कहा-“अपनी घोड़ी अभी कमजोर है। ऐसा करो, कुछ दूर तक तुम पैदल चलो फिर कुछ दूर मैं पैदल चलूँगा। इस तरह घोड़ी पर एक आदमी का बोझ ही रहेगा।”

इस तरह पहली बार अपनी घोड़ी के साथ शेखचिल्ली की ससुराल-यात्रा आरम्भ हुई। अभी वे लोग थोड़ी ही दुर गए थे। शेखचिल्ली घोड़ी पर सवार था। बेगम पैदल चल रही थी कि रास्ते में एक आदमी ने कहा-“अरे मियाँ! कैसे बेदीद इनसान हो तुम! बेचारी औरत पैदल चल रही है और तुम घोड़ी पर लदे हो। कुछ तो शर्म करो!”

उस आदमी की बात सुनकर शेखचिल्ली पानी-पानी हो गया और तुरन्त घोड़ी से उतर गया। उसने रजिया बेगम से कहा-“बेगम! तुम घोड़ी पर बैठो, मैं पैदल चलता हूँ।”

रजिया बेगम रास्ते में उस व्यक्ति द्वारा कही हुई बातें सुन चुकी थी इसलिए उसने इनकार नहीं किया और घोड़ी पर सवार हो गई। दोनों फिर आगे बढ़े। लगभग एक कोस चलने के बाद रास्ते में फिर एक आदमी अपने साथ चल रहे दूसरे आदमी को कोहनी मारते हए बोला-“अबे देख! इस जोरू के गुलाम को! बीवी को घोड़ी पर बैठाए हए खुद पैदल चल रहा है। ऐसे ही लोगां के कारण औरतें हमारे सिर पर सवार हो जाती हैं…”

कुछ देर सोचने के बाद शेखचिल्ली ने घोड़ी रोकी और खुद भी उस घोड़ी पर बैठ गया। घोड़ी अपनी मरियल चाल से बढ़ने लगी-खट-खट्, ट्प-ट्प, खट्-खट्, टप्-टप्!’

शेखचिल्ली की ससुराल जाने के लिए एक नदी के पुल से गुजरना पड़ता था। घोड़ी जब पुल से एक फर्लाग की दूरी पर पहुंची तब एक और आदमी ने शेखचिल्ली और उसकी बेगम को एक ही घोड़ी पर बैठे देख उन्हें धिक्कारा-“अरे! निर्दयी हो तुम लोग। इस बीमार घोड़ी पर दोनों चढ़े हो…!”

बेचारा शेखचिल्ली तुरन्त घोड़ी से उतर गया और अपनी बेगम से भी घोड़ी से उतर जाने को कहा। अब दोनों घोड़ी के साथ पैदल चलने लगे।

अभी वे थोड़ी ही दूर गए थे कि फिर एक आदमी ने कहा-“हद हो गई मूर्खता की! अरे भाई! जब तुम्हारे पास घोड़ी है तब पैदल क्यां चल रहे हो…घोड़ी पर सवार होकर क्यों नहीं जाते?”

शेखचिल्ली पर जैसे क्रोध का दौरा पड़ा, उसने तुरन्त घोड़ी को अपने कन्धे पर उठा लिया और उसे ले जाकर नदी में बहा दिया, फिर रजिया बेगम के साथ भुनभुनाता हुआ अपनी ससुराल की राह पर चलने लगा-‘न रहेगा बाँस, न बजेगी बाँसुरी! नहीं चढ़ना है हमें घोड़ी पर!’


बीमार दरांती (sheikh chilli ki kahani)

चिल्ली की मां गांव के रईस घरों में इधर उधर के काम शकरके अपनी आजीविका चलाती थी। बेटा शेख,” उन्होंने एक दिन सुबह को कहा, “देखो मैं फातिमा बीबी के घर उनकी लड़की की शादी की तैयारी में मदद के लिए जा रही हूं। मैं अब रात को ही वापिस लौटूंगी। हो सकता है कि मैं शायद अपने लाडले के लिए कुछ मिठाई वगैरा भी साथ में लाऊं। फातिमा बीबी काफी दरियादिल औरत हैं।”

“बेटा तुम दरांती लेकर जंगल में जाना और वहां से पड़ोसी की गाय के लिए जितनी हो सके उतनी घास काट कर लाना। इंशाअल्लाह, आज हम दोनों मिलकर काफी कमाई कर सकते हैं। देखो अपना वक्त बरबाद मत करना और न ही दिन में सपने देखना। तुमने अगर सावधानी से काम नहीं किया तो तुम्हें दरांती से चोट भी लग सकती

“आप मेरे बारे में बिल्कुल भी फिक्र न करें अम्मीजान,” शेख ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा। और फिर वो खुशी-खुशी जंगल की ओर चला। वो रास्ते में उन मिठाइयों के बारे में सोचता रहा जो उसको अम्मी, फातिमा बीबी के घर से लाएंगी। क्या वो नर्म, भूरे, चाशनी में डूबे गुलाब जामुन होंगे, जो उसने एक बार पहले कभी खाए थे? उनका स्वाद उसे बार-बार याद आ रहा था।

“बंद करो यह बकवास!” उसने खुद को झिड़कते हुए कहा। “अम्मी ने कहा था न कि दिन में सपने नहीं देखना।”

वो जंगल में पहुंचने के बाद काफी लगन से काम में लग गया। दोपहर के खाने के समय तक उसने काफी सारी घास काट डाली थी। उसने उसका एक बड़ा बंडल बनाया और उसे घर ले आया। पड़ोसी के घर घास छोड़ने के बाद और कुछ आने कमाने के बाद वो घर लौटा और उसने चटनी के साथ मोटी रोटी खायी। तब उसे याद आया कि वो अपनी दरांती को तो जंगल में ही भूल आया था।

 वो दौड़कर वापिस जंगल गया। दरांती वहीं पड़ी थी जहां उसने उसे छोड़ा था। तपती धूप में दरांती का ब्लेड एकदम गर्म हो गया था और शेख ने जब उस गर्म लोहे को छुआ तो उसे एक झटका सा लगा। उसकी दरांती को आखिर क्या हुआ? वो अपनी दरांती का मुआयना कर रहा था तभी पड़ोस का लल्लन उस रास्ते से गुज़रा।

“मियां, तुम किसे इतनी गौर से देख रहे हो?” उसने पूछा। “अपनी दरांती को। उसे कुछ हो गया है। वो काफी गर्म है!”

“हाय राम! उसे बुखार हो गया है!” लल्लन ने शेख की नासमझी पर हंसते हुए कहा। “तुम उसे किसी हकीम के पास ले जाओ। पर ज़रा रुको। मुझे मालूम है कि तेज़ बुखार में हकीमजी क्या दवाई देते हैं। आओ मेरे साथ चलो।”

दरांती के लकड़ी के हैंडल को सावधानी से कटकर लल्लन, शेख को एक कुंए के पास ले गया। वहां उसने दरांती को एक लंबी रस्सी से बांधा और फिर उसे कुंए के ठंडे पानी में लटकाया। “अब तुम इसे इसी हालत में छोड़कर घर चले जाओ,” उसने शेख से कहा। “अब तुम रात होने से पहले आना। तब तक दरांती का बुखार उतर गया होगा।” अरे बेवकूफ! उतनी देर में मैं दरांती को भी वहां से गायब कर दूंगा, लल्लन ने चुपचाप कहा। मैं उसे छिपा दूंगा या फिर बेच दूंगा और फिर शेख की मां दरांती खोने के लिए उसकी खूब मरम्मत करेगी!

“यकीन करो मियां,” उसने ज़ोर से कहा। “बुखार का यही सबसे अच्छा इलाज है!”

शेख चिल्ली ने उसकी बात पर विश्वास किया और घर वापिस चला गया। फिर वो सो गया और जब उसकी नींद खुली उस समय सूरज ढल रहा था। “मैं अम्मी के घर आने से पहले ही दरांती ले आता हूं,” उसने सोचा। “अब तक उसका बुखार उतर गया होगा।”

फिर वो कुएं की तरफ चला। लल्लन के घर के सामने से गुज़रते समय उसे अंदर से किसी के कराहने की आवाज आई। शेख अंदर गया। लल्लन की दादी आंगन में एक खाट पर पड़ी इधर-उधर करवटें बदल रहीं थीं। शेख जब उनके पास पहुंचा तो एकदम डर गया। उनका शरीर बहुत गर्म था। उन्हें तेज बुखार था और शेख के अलावा उनकी मदद करने वाला और कोई न था। परंतु अब लल्लन की दया से शेख को तेज बुखार का सही इलाज पता था।

शेख ने बूढ़ी औरत को सावधानी से अपने कंधे पर उठाया और फिर वो कुएं की ओर बढ़ने लगा।

“मियां, तुम लल्लन की दादी को कहां लिए जा रहे हो?” एक पड़ोसी ने पूछा।

“इलाज के लिए,” शेख ने जवाब दिया। “उन्हें बहुत तेज़ बुखार

उस समय लल्लन और उसके पिता, बूढ़ी दादी के लिए दवाई लेने हकीम के पास गए हुए थे। जब वो घर वापिस पहुंचे तब उन्होंने बूढ़ी दादी को नदारद पाया! जब वो बूढ़ी दादी को तलाशते हुए इधर-उधर भटक रहे थे, तब उन्हें वही पड़ोसी मिला जिसने शेख चिल्ली से पूछा था।

लल्लन को जब पूरी बात समझ आई तो उसके होश उड़ गए! वो दौड़ता हुआ कुएं के पास गया और उसके पीछे-पीछे उसके पिता भी हो लिए। लल्लन को दरांती चुराने का वक्त ही नहीं मिला था। शेख ने तभी अपनी दरांती को कुएं में से निकाला था और वो बूढ़ी औरत को रस्सी से बांधने की तैयारी कर रहा था। बस उसी समय लल्लन और उसके पिता वहां पहुंचे।

“अरे पागल, तुम यह क्या कर रहे हो?” लल्लन के पिता ने चिल्लाते हुए कहा। फिर उन्होंने शेख को एक तरफ धकेला और अपनी बेहोश मां की रस्सियां खोलने लगे। “चाचा, उन्हें बहुत तेज़ बुखार है!” शेख ने काफी उत्तेजित होकर कहा। “उन्हें रस्सी से बांधकर कुएं में लटका दीजिए। बुखार का यही सबसे अच्छा इलाज है। लल्लन ने ही तो मुझे बताया है।”

लल्लन के पिता अपने लड़के की ओर चीते की तरह झपटे।

“तुमने यह क्या नई खुराफात की है?” वो चिल्लाए। “हरामखोर! मैं तुझे बाद में सबक सिखाऊंगा! अगर तुम्हें अपनी जान प्यारी है तो फौरन अपनी दादी को घर पहुंचाने और हकीम को लाने में मेरी मदद करो!” लल्लन की दादी कुछ दिनों में ठोक हो गयीं, पर लल्लन की उसके पिता ने जमकर पिटाई लगाई। शेख को अम्मी ने जब यह पूरी घटना सुनी तो उन्हें यह समझ में ही नहीं आया कि वो हंसें या रोयें। वो शेख के लिए जो स्वादिष्ट गुलाब जामुन लायीं थीं उनको उसने मज़ा ले लेकर खाया। बाद में अम्मी ने शेख को समझाया कि दरांती क्यों गर्म हुई थी और क्यों किसी चीज़ को कुएं में डालना उसका बुखार उतारने का सबसे अच्छा तरीका नहीं था!


बीमार दरांती (sheikh chilli ki kahani)

 शेख चिल्ली की मां गांव के रईस घरों में इधर-उधर के काम शकरके अपनी आजीविका चलाती थी।  “बेटा शेख,” उन्होंने एक दिन सुबह को कहा, “देखो मैं फातिमा बीबी के घर उनकी लड़की की शादी की तैयारी में मदद के लिए जा रही हूं। मैं अब रात को ही वापिस लौटूंगी। हो सकता है कि मैं शायद अपने लाडले के लिए कुछ मिठाई वगैरा भी साथ में लाऊं। फातिमा बीबी काफी दरियादिल औरत हैं।”  “बेटा तुम दरांती लेकर जंगल में जाना और वहां से पड़ोसी की गाय के लिए जितनी हो सके उतनी घास काट कर लाना। इंशाअल्लाह, आज हम दोनों मिलकर काफी कमाई कर सकते हैं। देखो अपना वक्त बरबाद मत करना और न ही दिन में सपने देखना। तुमने अगर सावधानी से काम नहीं किया तो तुम्हें दरांती से चोट भी लग सकती

“आप मेरे बारे में बिल्कुल भी फिक्र न करें अम्मीजान,” शेख ने उन्हें आश्वस्त करते हुए कहा। और फिर वो खुशी-खुशी जंगल की ओर चला। वो रास्ते में उन मिठाइयों के बारे में सोचता रहा जो उसको अम्मी, फातिमा बीबी के घर से लाएंगी। क्या वो नर्म, भूरे, चाशनी में डूबे गुलाब जामुन होंगे, जो उसने एक बार पहले कभी खाए थे? उनका स्वाद उसे बार-बार याद आ रहा था।  “बंद करो यह बकवास!” उसने खुद को झिड़कते हुए कहा! “अम्मी ने कहा था न कि दिन में सपने नहीं देखना।”

वो जंगल में पहुंचने के बाद काफी लगन से काम में लग गया। दोपहर के खाने के समय तक उसने काफी सारी घास काट डाली थी। उसने उसका एक बड़ा बंडल बनाया और उसे घर ले आया। पड़ोसी के घर घास छोड़ने के बाद और कुछ आने कमाने के बाद वो घर लौटा और उसने चटनी के साथ मोटी रोटी खायी। तब उसे याद आया कि वो अपनी दरांती को तो जंगल में ही भूल आया था। वो दौड़कर वापिस जंगल गया। दरांती वहीं पड़ी थी जहां उसने उसे छोड़ा था। तपती धूप में दरांती का ब्लेड एकदम गर्म हो गया था और शेख ने जब उस गर्म लोहे को छुआ तो उसे एक झटका सा लगा। उसकी दरांती को आखिर क्या हुआ? वो अपनी दरांती का मुआयना कर रहा था तभी पड़ोस का लल्लन उस रास्ते से गुज़रा।

“मियां, तुम किसे इतनी गौर से देख रहे हो?” उसने पूछा। “अपनी दरांती को। उसे कुछ हो गया है। वो काफी गर्म है!”

“हाय राम! उसे बुखार हो गया है!” लल्लन ने शेख की नासमझी पर हंसते हुए कहा। “तुम उसे किसी हकीम के पास ले जाओ। पर ज़रा रुको। मुझे मालूम है कि तेज़ बुखार में हकीमजी क्या दवाई देते हैं। आओ मेरे साथ चलो।”

दरांती के लकड़ी के हैंडल को सावधानी से पकड़कर लल्लन, शेख को एक कुंए के पास ले गया। वहां उसने दरांती को एक लंबी रस्सी से बांधा और फिर उसे कुंए के ठंडे पानी में लटकाया।

 “अब तुम इसे इसी हालत में छोड़कर घर चले जाओ,” उसने शेख से कहा। “अब तुम रात होने से पहले आना। तब तक दरांती का बुखार उतर गया होगा।” अरे बेवकूफ! उतनी देर में मैं दरांती को भी वहां से गायब कर दूंगा, लल्लन ने चुपचाप कहा। मैं उसे छिपा दूंगा या फिर बेच दूंगा और फिर शेख की मां दरांती खोने के लिए उसकी खूब मरम्मत करेगी!

“यकीन करो मियां,” उसने ज़ोर से कहा। “बुखार का यही सबसे अच्छा इलाज है।”

शेख चिल्ली ने उसकी बात पर विश्वास किया और घर वापिस चला गया। फिर वो सो गया और जब उसकी नींद खुली उस समय सूरज ढल रहा था। “मैं अम्मी के घर आने से पहले ही दरांती ले आता हं,” उसने सोचा। “अब तक उसका बुखार उतर गया होगा।”

फिर वो कुएं की तरफ चला। लल्लन के घर के सामने से गुजरते समय उसे अंदर से किसी के कराहने की आवाज़ आई। शेख अंदर गया। लल्लन की दादी आंगन में एक खाट पर पड़ी इधर-उधर करवटें बदल रहीं थीं। शेख जब उनके पास पहुंचा तो एकदम डर गया। उनका शरीर बहुत गर्म था। उन्हें तेज बुखार था और शेख के अलावा उनकी मदद करने वाला और कोई न था। परंतु अब लल्लन की दया से शेख को तेज़ बुखार का सही इलाज पता था।

शेख ने बूढ़ी औरत को सावधानी से अपने कंधे पर उठाया और फिर वो कुएं की ओर बढ़ने लगा।

“मियां, तुम लल्लन की दादी को कहां लिए जा रहे हो?” एक पड़ोसी ने पूछा।  “इलाज के लिए,” शेख ने जवाब दिया। “उन्हें बहुत तेज़ बुखार

उस समय लल्लन और उसके पिता, बूढ़ी दादी के लिए दवाई लेने हकीम के पास गए हुए थे। जब वो घर वापिस पहुंचे तब उन्होंने बूढ़ी दादी को नदारद पाया? जब वो बूढ़ी दादी को तलाशते हुए इधर-उधर भटक रहे थे, तब उन्हें वही पड़ोसी मिला जिसने शेख चिल्ली से पूछा था।

लल्लन को जब पूरी बात समझ आई तो उसके होश उड़ गए! वो दौड़ता हुआ कुएं के पास गया और उसके पीछे-पीछे उसके पिता भी हो लिए। लल्लन को दरांती चुराने का वक्त ही नहीं मिला था। शेख ने तभी अपनी दरांती को कुएं में से निकाला था और वो बूढ़ी औरत को रस्सी से बांधने की तैयारी कर रहा था। बस उसी समय लल्लन और उसके पिता वहां पहुंचे।

अरे पागल, तुम यह क्या कर रहे हो?” लल्लन के पिता ने चिल्लाते हुए कहा। फिर उन्होंने शेख को एक तरफ धकेला और अपनी बेहोश मां की रस्सियां खोलने लगे।

“चाचा, उन्हें बहुत तेज़ बुखार है!” शेख ने काफी उत्तेजित होकर कहा। “उन्हें रस्सी से बांधकर कुएं में लटका दीजिए। बुखार का यही सबसे अच्छा इलाज है। लल्लन ने ही तो मुझे बताया है।”

लल्लन के पिता अपने लड़के की ओर चीते की तरह झपटे।

“तुमने यह क्या नई खुराफात की है?” वो चिल्लाए। “हरामखोर! मैं तुझे बाद में सबक सिखाऊंगा! अगर तुम्हें अपनी जान प्यारी है तो फौरन अपनी दादी को घर पहुंचाने और हकीम को लाने में मेरी मदद करो!”

लल्लन की दादी कुछ दिनों में ठोक हो गयीं, पर लल्लन की उसके पिता ने जमकर पिटाई लगाई। शेख को अम्मी ने जब यह पूरी घटना सुनी तो उन्हें यह समझ में ही नहीं आया कि वो हंसें या रोयें। वो शेख के लिए जो स्वादिष्ट गुलाब जामुन लायीं थीं उनको उसने मज़ा ले-लेकर खाया। बाद में अम्मी ने शेख को समझाया कि दरांती क्यों गर्म हुई थी और क्यों किसी चीज़ को कुएं में डालना उसका बुखार उतारने का सबसे अच्छा तरीका नहीं था!


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मेहमान जो जाने को तैयार न था (sheikh chilli ki kahani)

शेख चिल्ली की अम्मी और उसकी पत्नी फौजिया दोनों एक शमहीने के लिए कहीं जा रही थीं। परंतु दोनों को ही शेख चिल्ली को घर में अकेले छोड़कर जाने की बात अखर रही थी।

“पिछली बार जब हमने तुम्हें सिर्फ एक दिन के लिए अकेले छोड़ा था, तो तुमने घर को जलाकर लगभग राख कर दिया था।” फौजिया ने कहा। “अगर हम तुम्हें पूरे महीने के लिए अकेले छोड़कर गयों तो फिर तो अल्लाह ही मालिक है!”

“बेगम, तुम बिना किसी बात के फिक्र करती हो,” शेख ने उसकी हिम्मत बांधने के लिए कहा। “मैं अपनी और घर की देखभाल करने के लिए पूरी तरह सक्षम हूँ। परंतु तुम्हारी तसल्ली के लिए मैं तुम्हें बताना चाहता हूँ कि तुम्हारी गैर-मौजूदगी में मैं अपने पुराने दोस्त और चचेरे भाई इरफान भाई से मिलने के लिए जाऊंगा।”

“ठीक है।” शेख की बीबी को अब कुछ शांति मिली। “हमारे आने के एक दिन बाद तुम भी वापिस आ जाना।”

शेख चिल्ली का चचेरा भाई इरफान पास के ही गांव में अपनी पत्नी और दो बच्चों के साथ रहता था। उसकी एक छोटी सी कपड़े की दुकान थी। इरफान ने बचपन में शेख और उसकी अम्मी के साथ काफी दिन गुज़ारे थे। उन गर्दिश के हालातों में भी जब उनकी माली हालत बहुत खराब थी, उन्होंने इरफान का हमेशा बहुत ख्याल रखा था।

जब शेख अचानक से इरफान के घर पहुंचा तो इरफान को बहुत खुशी हुई। इरफान को अपने ऊपर लदे तमाम अहसानों को चुकाने का यह अच्छा मौका नजर आया।

शेख का पहला हफ्ता बड़े आराम से बीता। परंतु जब उसने जाने का कोई नाम नहीं लिया तो इरफान की पत्नी कुछ गुस्सा हुई।  “तुम्हारा भाई यहां और कितने दिन रहेगा?” उसने अपने पति से पूछा।

“उसकी मर्जी,” इरफान ने जवाब दिया। “तुम क्यों फिक्र कर रही हो। वो पूरा दिन दुकान में मेरे साथ गुजारता है और फिर शाम को आकर रोज़ तुम्हारी और बच्चों की कुछ मदद करता है।” । “वो सब ठीक है,” बीबी ने रुखाई से कहा, “पर देखो वो खाता कितना ज्यादा है! उससे हमारा खर्च कितना अधिक बढ़ गया है!” । … “मेरे ऊपर उस परिवार का बहुत बड़ा कर्ज है और इस थोड़े से खर्च की मुझे कोई परवाह नहीं है,” इरफान ने कहा। “देखो बेगम, कुछ दिन थोड़ा कम खाने और एक मेहमान को खिलाने से तुम्हारा कुछ खास बिगड़ेगा नहीं!”

उसकी मोटी बीबी गुस्से में रोने लगी। “तुमसे बात करने से क्या फायदा,” उसने नाक बिचकाते हुए कहा, “अब मुझे ही इसके बारे में कुछ सोचना होगा।”

कुछ दिनों के बाद एक दिन इरफान जब शेख के साथ घर वापिस लौटे तो उन्होंने देखा कि उनकी बीबी और बच्चे किसी यात्रा के लिए तैयार थे।  “भाईजान,” इरफान की बीबी ने शेख से कहा, “मुझे अभी-अभी अपने पिता के सख्त बीमार होने की खबर मिली है। इसलिए हमें आज रात को ही वहां जाना होगा।”

“अल्लाह जल्दी ही आपके पिता को ठीक करे, भाभीजी,” शेख ने कहा। “आप लोग घर की कोई चिंता न करें। आपके वापिस आने तक मैं घर की हिफाजत करूंगा।”

“पर भाईजान,” इरफान की बीबी ने विरोध प्रकट करते हुए कहा, “आप यहां रहेंगे कैसे? घर में तो कुछ खाने को नहीं है। खैरियत इसी में है कि आप वापिस अपने घर लौट जाएं।”

“तब मैं कल सुबह चला जाऊंगा,” शेख ने कहा। “मेरे घर में ताला पड़ा है। मुझे कल किस दोस्त के घर जाना है यह बात मैं आज रात को तय कर लूंगा।”

अगले दिन सुबह घर छोड़ने से पहले शेख ने घर की थोड़ी सफाई करने की सोची। बच्चों के पलंग के गद्दे के नीचे उसे एक छोटी चाबी दिखी। वो रसोई की अल्मारी की चाबी थी। इरफान की बीबी ने उसे यहां पर छिपा कर रखा था। अलमारी में कई दिनों के लिए आटा और दाल रखा था।

शेख ने सोचा कि अब अम्मी और फौजिया के आने से पहले मुझे घर जाने की कोई जरूरत ही नहीं है। यह सोचकर शेख अपने लिए खाना बनाने लगा।

इस बीच जब इरफान को पता चला कि उसकी बीबी पिता के बीमारी की कहानी एकदम मन-गढ़त थी तो वो अपनी बीबी पर बौखला उठा। दो दिन बाद इरफान का पूरा परिवार जब घर लौटा तो शेख ने बड़ी गर्मजोशी से उनका स्वागत किया!

कुछ दिन और बीत गए। शेख ने अभी भी जाने का कोई नाम नहीं लिया। इरफान की बीबी का लगातार पारा चढ़ रहा था। एक शाम को वो पलंग पर जा पड़ी और ज़ोर-जोर से कराहने लगी।  “हाय! हाय!” उसने अपने पति से कराहते हुए कहा, “यह दर्द तो मुझे लेकर ही मरेगा! यह बिल्कुल उसी तरह का दर्द है जो भाईजान की अम्मी को होता था। उनसे कहो कि वो उसी हकीम के पास जाएं जिन्होंने उनकी अम्मी को ठीक किया था और मेरे लिए भी उस मर्ज की दवा लेकर आएं। हां, उन्हें दवाई लेकर यहां आने की ज़रूरत नहीं है। हम किसी को भेज कर दवा मंगवा लेंगे। कृपा करके भाईजान से जल्दी जाने को कहो!”

“भाभीजी, मैं सुबह होते ही यहां से चला जाऊंगा,” शेख ने उन्हें दिलासा दिलाते हुए कहा। “रात के अंधेरे में मैं अपना रास्ता भूल सकता हूं। इंशाअल्लाह, आप की तबियत जल्दी ही दुरुस्त हो जाएगी!”

इरफान की बीबी सारी रात कराहती रही। उसकी कराहटों को सुन कर शेख को एक बुरा सपना आया। सपने में उसे लगा जैसे कोई खूखार शेर उसका पीछा कर रहा हो। शेर से पीछा छुड़ाने के प्रयास में शेख पलंग से नीचे गिर पड़ा और लुढ़क कर उसके नीचे चला गया। उसके बाद बुरा सपना खत्म हुआ और शेख गहरी नींद सो पाया। अगली सुबह इरफान को शेख का पलंग खाली नज़र आया। “बेगम, वो तो पहले ही जा चुका है,” इरफान ने अपनी बीबी से कहा।

बीबी अपने पलंग से कूद कर दौड़ती हुई आई। “मैं सच में बीमार नहीं थी!” उसने हंसते हुए अपने पति से कहा।

“और मैं भी सच में अभी गया नहीं हूं!” शेख चिल्ली ने पलंग के नीचे से निकलते हुए कहा। “और वैसे भी अब भाभीजी की तबियत ठीक हो गई है।”


सबसे झूठा कौन? (sheikh chilli ki kahani)

झज्जर के नवाब युद्ध लड़ने के लिए कई महीनों से बाहर गए थे।

राउनकी अनुपस्थिति में उनके छोटे भाई – छोटे नवाब ही राज-पाट का सारा काम संभालते थे।

नवाब साहब धीरे-धीरे करके शेख चिल्ली को चाहने लगे थे। उन्हें उसकी सरलता में आनंद आता था। परंतु छोटे नवाब शेख चिल्ली को पूरी तरह बेवकूफ और कामचोर मानते थे। एक दिन उन्होंने भरी सभा में शेख चिल्ली को डांटा और उसका अपमान किया।

एक अच्छा आदमी बताए हुए काम से भी कहीं ज्यादा काम करता है और एक तुम हो जो सरल से काम को भी ठीक ढंग से नहीं कर पाते हो,” उन्होंने कहा। “तुम अस्तबल में घोड़ा लेकर जाते हो पर उसे बांधना भूल जाते हो। तुम जब कोई बोझा उठाते हो तो या तो गिर जाते हो या फिर तुम्हारे पैर लड़खड़ाते हैं! तुम जो काम करते हो उसे ध्यान लगाकर क्यों नहीं करते हो?”

 दरबार में कई सदस्यों को यह सुनकर मजा आया। इस दौरान शेख चिल्ली अपना मुंह लटकाए रहा। उसके कुछ दिनों बाद शेख चिल्ली छोटे नवाब के घर के सामने से होकर जा रहा था जब उसे तुरंत अंदर बुलाया गया।

“किसी अच्छे हकीम को बुलाकर लाओ। जल्दी! बेगम काफी बीमार हैं।”

“जी सरकार,” शेख चिल्ली ने कहा और आदेश का पालन करने में फटाफट लग गया। थोड़ी ही देर में एक हकीम, एक कफन बनाने वाला और दो कब्र खोदने वाले मजदूर भी वहां पहुंच गए।

“यह सब क्या हो रहा है?” छोटे नवाब ने गुस्से में पूछा। “यहां तो कोई मरा नहीं है। मैंने तो सिर्फ एक हकीम को बुला लाने के लिए कहा था। बाकी लोगों को कौन बुलाकर लाया है?”

“मैं सरकार!” शेख चिल्ली ने कहा। “आपने ही तो कहा था कि एक अच्छा आदमी बताए गए काम से भी बहुत ज्यादा काम करता है। इसलिए मैंने सभी संभावनाओं को ध्यान में रखते हुए यह कदम उठाया। अल्लाह करे कि बेगम साहिबा जल्दी से ठीक हो जाएं। पर हारी-बीमारी में क्या हो जाए यह किसे पता!”

छोटे नवाब राज-पाट के काम में ज्यादा रुचि नहीं लेते थे। वो अपना अधिकतर समय शिकार, शतरंज या अन्य खेलों को खेलने में बिताते थे। एक दिन उन्होंने एक प्रतियोगिता रखी जिसमें सबसे बड़े झूठ बोलने वाले को विजयी घोषित किया जाना था! जीतने वाले को सोने की एक हज़ार दीनारें भी मिलनी थीं!

कई झूठ बोलने में माहिर लोग इनाम जीतने के लिए सामने आए। एक ने कहा, “सरकार, मैंने भैंसों से भी बड़ी चींटियां देखीं हैं जो एक बार में चालीस सेर दूध देती हैं!”

“क्यों नहीं?” छोटे नवाब ने कहा। “यह संभव है।”

“सरकार, हर रात मैं चंद्रमा तक उड़ते हुए जाता हूं और सुबह होने से पहले ही उड़कर वापिस आ जाता हूं!” एक अन्य झूठ बोलने वाले ने डींग हांकी।

“हो सकता है,” छोटे नवाब ने कहा। “हो सकता है तुम्हारे पास कोई रहस्यमयी ताकत हो।”  “सरकार,” एक तोंद निकले मोटे आदमी ने कहा, “जबसे मैंने एक तरबूज के कुछ बीज निगले हैं तब से मेरे पेट में छोटे-छोटे तरबूज पैदा हो रहे हैं। जब कोई तरबूज़ पक जाता है तो वो फूट जाता है और उससे मुझे अपना भोजन मिल जाता है। अब मुझे और कुछ खाने की ज़रूरत ही नहीं पड़ती है।”

“तुमने किसी ताकतवर तरबूज के बीज निगल लिए होंगे,” छोटे नवाब ने बिना पलकें झपके कहा।

“सरकार, क्या मुझे भी बोलने की इजाजत है?” शेख चिल्ली ने पूछा।

“ज़रूर,” छोटे नवाब ने ताना कसते हुए कहा। “तुमसे हम किन प्रतिभाशाली शब्दों की उम्मीद करें?”

“सरकार,” शेख चिल्ली ने जोर से कहा, “आप इस पूरे राज्य के सबसे बड़े बेवकूफ आदमी हैं! आपको नवाब के सिंहासन पर बैठने का कोई हक नहीं है।”

पूरी राजसभा में सन्नाटा छा गया। तब छोटे नवाब चिल्लाए, “पहरेदारों, इस नाचीज़ को गिरफ्तार कर लो!”

शेख चिल्ली को पकड़ा गया और खींच कर लाया गया।

“निकम्मे, बेशरम!” छोटे नवाब का गुस्सा उबल कर बाहर निकला, “तुम्हारी यह जुर्रत कैसे हुई! अगर तुमने इसी वक्त हमारे पैरों में गिरकर माफी नहीं मांगी तो तुम्हारा सिर धड़ से अलग कर दिया जाएगा!”

“पर सरकार,” शेख चिल्ली ने विरोध जताते हुए कहा, “आपने ही तो कहा था कि आप दुनिया का सबसे बड़ा झूठ सुनना चाहते हैं।” फिर वो निष्कपट भाव से छोटे नवाब को देखने लगा। “जो कुछ मैंने कहा उससे बड़ा क्या और कोई झूठ हो सकता है?”

छोटे नवाब को समझ में नहीं आया कि क्या करें! क्या शेख चिल्ली अब झूठ बोल रहा है या वो पहले झूठ बोल रहा था? शेख चिल्ली उतना बड़ा बेवकूफ नहीं था जितना छोटे नवाब उसे समझते थे!

छोटे नवाब धीमे से हंसे और उन्होंने कहा, “शाबाश! तुम ईनाम जीते!”

सब लोगों ने शेख चिल्ली की अकल को सराहा। वो शान से हजार सोने की दीनारें लेकर घर गया। छोटे नवाब चाहें थोड़े बेवकूफ हों परंतु वो हैं दिलदार, शेख ने सोचा।


तरबूज और चोर (sheikh chilli ki kahani)

 शेख चिल्ली को नींद नहीं आई। फातिमा बीबी ने उस शाम शेख की अम्मी को एक तरबूज़ दिया था, जो वो इत्तफाक से घर लाना भूल गयीं। बस शेख उसी तरबूज़ के बारे में ही सोचता रहा। पूरे पिछले हफ्ते अम्मी रोजाना कई घंटों के लिए फातिमा बीबी के यहां उनकी बड़ी लड़की की शादी की तैयारियों में मदद करने को जाती थीं।

और हर शाम अम्मी शेख के लिए फातिमा बीबी द्वारा दी गई चीजें लाती थीं। पहले दिन वो रसीले गुलाब जामुन लायीं थीं। उसके बाद में खीर और फिर केले। आज अम्मी को एक बड़ा तरबूज़ मिला था। शेख के मुंह में तरबूज के बारे में सिर्फ सोच कर ही पानी आने लगा! अम्मी को तरबूज का वज़न बहुत भारी लगा इसलिए वो उसे फातिमा बीबी के घर के आंगन में ही छोड़ आयौं। शेख सुबह जाकर तरबूज़ को ला सकता था। परंतु वो तो तरबूज़ अभी खाना चाहता था। अभी! तुरंत! उसका भूखा पेट उसे आदेश दे रहा था।

शेख उठा। अम्मी अभी गहरी नींद में सोई थीं। उसने चुपचाप, रात के अंधेरे में और गांव की सुनसान गलियों में फातिमा बीबी के घर की ओर चलना शुरू किया। जैसे ही वो आंगन की चारदीवारी पर से कूदा उसे सामने अपना तरबूज पड़ा हुआ दिखाई दिया।

तरबूज़ कोयले के एक ढेर के ऊपर पड़ा हुआ था। वो बस तरबूज़ को उठा कर चलने वाला ही था कि उसे घर के अंदर से आती कुछ आवाजें सुनाई पड़ीं। वहां कौन हो सकता है? घर तो खाली था। पूरा परिवार तो पास के गांव में रिश्तेदारी में गया हुआ था। क्या वे सब जल्दी लौटकर वापिस आ गए थे? फिर उनके घर के बाहर ताला क्यों लगा हुआ था? शेख इन सब बातों के बारे में सोच रहा था तभी उसे अपनी ओर आते कुछ कदम सुनाई पड़े।

हाय राम!” कराहने को आवाज़ आई। वो आवाज़ लल्लन की थी। उसे पहचानने में शेख को कोई दिक्कत नहीं हुई। “मैं उस बेवकूफ शेख चिल्ली को मार डालूंगा! उसकी वजह से ही मेरे पिता ने मुझे इतनी बुरी तरह मारा है कि मेरी हड्डी -हड्डी दुख रही है। और अब खिड़की से घुसते हुए टूटे हुए कांच से मेरा हाथ कट गया है।”

“अब कराहना बंद भी करो!” एक दबी सी आवाज़ आई। शेख इस आवाज को नहीं पहचान सका। जैसे ही वो दोनों लोग सामने आए शेख कोयले के बोरों के पीछे छिप गया। वो कोयलों के बोरों के बीच की झिरी में से उन्हें देखता रहा। लल्लन के साथ कोई बुरी नियत वाला अजनबी था जिसे शेख ने बाजार में घूमते हुए देखा था। लल्लन एक थैले में कुछ भर कर ले जा रहा था।

“जल्दी करो,” अजनबी ने कहा। “चलो, फटाफट माल को बांट लेते हैं।”

जय अजनबी ठीक बोरों के सामने अपनी पीठ करके बैठ गया तो शेख बेचारा बहुत घबराया। अजनबी ने थैले को लल्लन से छीना और उसके अंदर के सारे माल को ज़मीन पर उंडेल दिया। गले के हार, सोने

और चांदी की चूड़ियां, चांदी के गिलास और सोने के सिक्के, हल्की चांदनी में झिलमिलाने लगे। शेख उन सब गहनों को ताकता रहा। उसे मालूम था कि फातिमा बीबी ने उन्हें अपनी लड़की की शादी के लिए इकट्ठा किया था। अम्मी ने शेख को उनमें से हर एक के बारे में बताया था। और अब यह दोनों लोग उन गहनों को चुरा रहे थे!

“तुमने आधे से ज्यादा हिस्सा ले लिया है!” लल्लन ने कमजोर आवाज़ में अपना विरोध दर्शाया। उसके बाद उस अजनबी ने लूट का थोड़ा सा और माल उसकी ओर बढ़ा दिया।

“गनीमत है कि तुम्हें इतना भी माल मिल रहा है!” अजनबी घुर्राया। “मेरे बिना तो तुम्हारी घर में चोरी करने की हिम्मत ही नहीं होती!”

 “यह घर भुतहा है,” लल्लन ने फुसफुसाते हुए इधर-उधर बेचैनी से देखते हुए कहा। “कुछ लोग अब भी इस घर को भुतहा मानते हैं।”

“तो चलो इससे पहले कि भूत हमें पकड़े हम यहां से भाग लेते हैं!” अजनबो हंसा। उसकी हंसी में चालाकी छिपी थी। “अगर तुम लूट का कुछ और माल चाहते हो तो अपने साथ उस तरबूज को भी ले जाओ!”

अजनबी ने कोई तीन-चौथाई सोने और चांदी को थैले में भरा। बाकी को अपनी जेबों में भरते समय वो कुछ बुदबुदा रहा था। लल्लन ने खड़े होकर तरबूज़ को उठाने की कोशिश करी। परंतु बोरों के पीछे से शेख चिल्ली भी तब तक खड़ा हो गया था और तरबूज को अपनी पूरी ताकत से पकड़े हुए था। जैसे ही शेख को उंगलियां, लल्लन की उंगलियों से टकरायीं वैसे ही लल्लन को अपनी जिंदगी का सबसे बड़ा धक्का लगा!

“भूत!” वो बुदबुदाया। “भू… भूत!”

शेख बोरों से टिककर तरबूज़ को कसकर पकड़े रहा। कोयले के दो बोरे अचानक लुढ़के और लल्लन और उस अजनबी के ऊपर जाकर गिरे। अब लल्लन ने सारी सावधानी को ताक पर रख दिया।

“भूत!” वो ज़ोर से चिल्लाया।

“भूत!” डरा हुआ शेख चिल्ली भी जोर से चिल्लाया। “भूत! चोर! भूत”

इससे पहले कि दोनों चोर भाग पाते भीड़ जमा हो गई। कोयले की धूल में सने दोनों चोरों को कोतवाली ले जाया गया। लल्लन अभी भी बुदबुदा रहा था, “भूत! भूत!”

एक पड़ोसी फातिमा बीबी के परिवार के वापिस आने तक लूट के गहनों की पहरेदारी करता रहा। शेख को लोग हीरो जैसे उसके प्यारे तरबूज के साथ घर वापिस पहुंचाने के लिए गए।


शेख की नयी नौकरी (sheikh chilli ki kahani)

शेख चिल्ली के दूसरी नौकरी ढूंढने का समय आ गया था।

। काजी से मिले सारे पैसे अब धीरे-धीरे करके खर्च हो गए थे। एक दिन वो सुबह के समय पास के शहर की ओर चला। सड़क पर उसके आगे एक छोटे कद का आदमी, सिर पर एक बड़ा पीपा रख कर जा रहा था। वो पसीने से एकदम लथपथ हो गया था।

“सुनो,” उसने शेख के पास से गुजरते समय कहा। “अगर तुम इस घी के पीपे को शहर तक ले जाओगे तो मैं इसके लिए तुम्हें दो आने दूंगा।”

कुछ पैसे कमाने की खुशी में शेख ने पीपे को अपने सिर पर रख लिया और चलने लगा। इन दो आनों से मैं कुछ मुर्गी के चूजे खरीदूंगा, उसने सोचा। जब वो चूजे बड़े हो जाएंगे तो मेरे पास बहुत सारी मुर्गियां

और अंडे होंगे। उन अंडों को बेचकर मैं मालामाल हो जाऊंगा: फिर मैं गांव का सबसे आलीशान मकान खरीदूंगा और दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की से साथ शादी करूंगा! फिर अम्मी को कभी काम करने की ज़रूरत नहीं पड़ेगी। वो और मेरी बेगम आराम से रानियों की तरह बैठी रहेंगी और उनकी सेवा के लिए चालीस नौकरानियां होंगी! मैं पूरे दिन पतंग उड़ाया करूंगा … बड़ी-बड़ी, रंग-बिरंगी पतंगे, जो खास मेरे लिए ही बनी होंगी। सारा गांव मुझे पतंग उड़ाता हुआ देखने के लिए इकट्ठा होगा – फर, फरी!

अपनी सोच में पूरी तरह मगन शेख ने काल्पनिक पतंग को उड़ाने के लिए अपने दोनों हाथों को हवा में लहराया। उससे घी का पीपा धड़ाम से जमीन पर आ गिरा और सारा घी बह गया!  “बेवकूफ! तुमने यह क्या किया?” वो छोटा आदमी चिल्लाया। “तुमने तीस रुपए के घी को पानी की तरह बहा दिया!”  तीस रुपए कौन सी बड़ी रकम है, पर मेरी तो किस्मत ही लुट गई,” शेख ने दुखी होते हुए कहा। “मैं तो पूरी तरह तबाह हो गया।”

वो आदमी गुस्से में आग बबूला होकर चला गया। शेख भी चलते-चलते एक बड़े घर के गेट के पास पहुंचा जहां एक घोड़ा-गाड़ी खड़ी थी।

“कोचवानजी,” शेख ने घोड़ा-गाड़ी के चालक को संबोधित करते हुए कहा, “क्या आप बता सकते हैं कि मुझे कहां नौकरी मिल सकती है? मैं कोई भी काम करने को तैयार हूं।”

“तुम अंदर जाकर कोशिश करो,” कोचवान ने कहा, “मुझे लगता है कि रसोइए को एक मददगार की तलाश है।”

शेख घर का चक्कर लगाकर पीछे गया और वहां जाकर रसोइए से मिला। शेख को नौकरी मिल गई। वो पूरे दिन भर सब्जी काटता रहा और बर्तन मांजता रहा। रात तक वो थककर एकदम पस्त हो गया और उसे जोर की भूख लगी।

“यह लो!” रसोइए ने शेख की ओर दो सूखी रोटी और कुछ अचार फेंकते हुए कहा। “तुम चाहो तो मेरे कमरे के बाहर सो सकते हो, परंतु सुबह पौं फटते ही उठ जाना। इस घर में सुबह तड़के ही काम शुरू हो जाता है।”

शेख लेटते ही खर्राटें भरने लगा। आधी रात को भूख के कारण उसकी नींद खुल गई। उसने दुबारा सोने की बहुत कोशिश की परंतु भूख ने उसे जगाए रखा। अंत में उसने रसोइए के कमरे में झांक कर देखा। रसोइए का कमरा खाली था पर उसे बाहर बाग में से कुछ आवाजें सुनाई दीं। शेख ने थोड़ा करीब जाकर देखा। रसोइया और माली आपस में चुपचाप बातचीत कर रहे थे। उन दोनों के बीच में नींबूओं का एक ढेर पड़ा था।

“इस बार मुझे एक अच्छा खरीदार मिल गया है,” शेख ने माली को कहते हुए सुना। “अभी तक हमें जो कीमत मिल रही थी वो उससे दुगना मूल्य देगा!”

“अच्छा!” रसोइए ने कहा। “तुम बेफिक्र रहो। बूढ़ी औरत को कोई भी शक नहीं है।”

शेख ने उनका ध्यान अपनी ओर खींचने के लिए गले से कुछ आवाज निकाली। दोनों चोर उसे देखकर एकदम घबराए।  “मुझे बहुत भूख लगी है,” शेख ने कहा। “भूख के मारे मैं सो नहीं सका।”

क्या शेख को वाकई भूख लगी थी या वो अपना मुंह चुप रखने के लिए कुछ पैसे चाहता था? रसोइए को कुछ समझ में नहीं आया। उसने अपनी जेब से कुछ सिक्के निकाले और उसे दे दिए। “किसी से एक शब्द भी नहीं कहना!” उसने गुर्रा कर कहा। “अब जाओ!”

“मैं जा रहा हूं,” शेख ने कहा। परंतु वो आधी रात को अपने लिए खाना कहां से खरीदेगा? वो गेट की ओर चलते समय सोते हुए कोचवान से टकरा गया। कोचवान जाग गया और उसने शेख से जाने का कारण पूछा। शेख ने कोचवान को पूरी कहानी सुनाई।

“अच्छा तो ये दोनों इस खुराफात में लगे थे।” कोचवान ने कहा। “मुझे इन पर पहले से ही शक था। सुबह को मैं पहला काम यह करूंगा – बीबीजी को बताऊंगा कि उन्होंने अपने घर में दो चोर पाले हुए हैं। मैं यह पक्का करूंगा कि वो इन दोनों चोरों को निकाल दें।”

और वही हुआ! शेख को चोरों को रंगे हाथों पकड़ने के लिए पचास रुपयों का इनाम मिला। उनकी जगह एक नए रसोइए और माली को रखा गया। शेख को रसोइए के मददगार की जगह कोचवान का सहायक बनाया गया। कुछ दिनों में शेख गाड़ी चलाना सीख गया और अब कोचवान जब भी छुट्टी पर जाता तो शेख घोड़ा-गाड़ी को चलाता। शेख बीबीजी को जहां वो कहतीं घुमाने के लिए ले जाता।

फिर बीबीजी का बेटा और उसकी बहू उनके साथ रहने के लिए आ गए और उनके आने से शेख एक बार फिर मुसीबत में फंस गया!

“सीधे बैठो!” बीबीजी के नौजवान बेटे ने शेख को आदेश दिया।  “संभाल कर गाड़ी चलाओ और अपने मुंह को बंद रखो। मुझे ढीले-ढाले, बातूनी ड्राइवर विल्कुल नापसंद हैं।”

“जी, सरकार!” शेख ने कहा और दिए गए आदेशों का पालन करने लगा। एक शाम को वो मियां-बीबी को बाज़ार ले गया। गलती से

घर आते समय महिला ने अपना बटुआ गिरा दिया। शेख ने बटुआ गिरते हुए देखा परंतु क्योंकि उससे हर समय बिल्कुल चुप रहने को कहा गया था इसलिए वो कुछ भी नहीं बोला।

“गधे, बेवकूफ!” मालिक चीखा जब उन्हें पता चला कि शेख ने बटुए को गिरते हुए देखा था। “भविष्य में तुम जब भी किसी भी चीज़ को गिरते हुए देखो तो उसे उठा लेना। समझे?”

“जी सरकार,” शेख ने कहा।

कुछ दिनों बाद उसका मालिक कुछ मेहमानों के साथ बैठा था जब शेख एक बंडल को लेकर कमरे में घुसा।

“सरकार, यह सड़क पर गिरा हुआ था,” उसने मेज़ पर बंडल को रखते हुए कहा। “इसलिए आपके आदेशानुसार मैं इसे उठा कर लाया हूं।”

“इसके अंदर क्या है?” एक मेहमान ने पूछा। शेख ने बंडल को खोला। बंडल के अंदर घोड़े की लौद थी, जो घोड़े ने गिराई थी। मालिक की आज्ञानुसार शेख उसे उठा लाया था!  “जाओ!” मालिक अपने मेहमानों के सामने लज्जित होते हुए चिल्लाया। “इसी क्षण मेरा घर छोड़ कर जाओ। मैं तुम्हें नौकरी से निकालता हूं!”

एक और नौकरी का अंत – वो भी कोई गलती किए बिना, शेख ने सोचा। परंतु उसने चार महीनों की तनख्वाह बचाई थी और बीबीजी ने उसे बतौर इनाम पचास रुपए दिए थे। यह सोचकर शेख खुश हो गया।

अम्मी ज़रूर खुश होंगी। यह सोचते हुए वो घर की ओर रवाना हुआ। इन पैसों से वो बहुत सारे चूजे खरीद सकेगा। जल्दी ही चूजे बड़े होकर मुर्गियां बन जाएंगी। इस तरह दिन में सपने संजोते हुए वो आराम से आगे बढ़ा।

 

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