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12वीं कक्षा की नैतिक कहानियां

12वीं कक्षा के लिए नैतिक कहानियां। moral stories in Hindi for class 12

दीपावली से सीख

घीरे-धीरे अंधेरा घिर आया। मुहल्ले के सारे मकान बिजली के बल्बों, रग-बिरंगी, झालरों और मोमबत्तियों की झिलमिलाती रोशनी से जगमगा उठे। जिधर भी देखो हर तरफ बस रोशनी ही रोशनी नजर आ रही थी, और रह-रह कर तड़-तड, धड़-धड़ की आवाजें गूंज रही थीं। मुहल्ले के सारे बच्चे अपनी-अपनी छत्तों पर, लॉन में, घर के बाहर सड़कों पर और गलियों में उछल-कूद कर रहे थे, ऊधम मचा रहे थे, और पटाखे, चकरी तथा फुलझड़ियां छुड़ा रहे थे।

उनके माता-पिता भी कुछ देर के लिए बच्चे बन गए थे और इस हो-हल्ला में खुलकर उनका साथ दे रहे थे। लेकिन रमेश माथुर का घर सन्नाटे में डूबा हुआ था। वहां न तो बच्चों का हो-हल्ला था न ही बम-पटाखों का शोर, माथुर साहब और उनकी पत्नी अपने लॉन में बेचैनी से चहल कदमी कर रहे थे। उन दोनों की परेशान निगाहें गेट की तरफ लगी हुई थीं। बल्कि श्रीमती माथुर तो दो-तीन बार गेट से बाहर निकल कर सड़क तक देख आयीं लेकिन उनके बच्चों मनोज और रजना का कहीं दूर-दूर तक पता नहीं था।

लगभग एक घंटा पहले माथुर साहब के दोनों बच्चे मनोज और रंजना उनसे पैसे ले कर अपनी पसन्द के बम-पटाखे, राकेट, फूलझड़ी आदि खरीदने के लिए चौराहे की दूकान तक गए थे। उन दोनो को अधिक से अधिक आधा घंटा में लौट आना चाहिए था लेकिन धीरे-धीरे एक घंटा बीत गया और वे नहीं लौटे। जैसे-जैसे देर हो रही थी माथुर साहब और उनकी पत्नी की चिन्ता बढ़ती जा रही थी। पन्द्रह-बीस मिनट तब और प्रतीक्षा करने के बाद उन्होंने घर में ताला बन्द किया और मनोज व रंजना को ढूंढने के लिए चौराहे की तरफ चल दिए।

चौराहे पर हर तरफ सड़कों की पटरियों पर तरह-तरह की आतिशबाजी से भरी दर्जनों दुकानें सजी थीं जिन पर औरत, मर्द और बच्चों की भारी भीड़ जमा थी, परेशान मिस्टर माथुर और उनकी पत्नी ने एक-एक कर के सारी दुकानें देख डाली, चारों तरफ भीड़ में खोज डाला लेकिन मनोज और रंजना कहीं भी नहीं दिखे । माथुर साहब ने सभी दूकानदारों और वहां उपस्थित लोगों से अपने बच्चों की हुलिया बता कर बहुत पूछ-ताछ की, लेकिन उन दोनों के बारे में कोई भी जानकारी नहीं मिल सकी।

हर तरफ से निराश होने के बाद माथुर साहब और उनकी पत्नी भागे-भागे थाने पर पहुचे सयोग से पुलिस इन्सपेक्टर शुक्ला थाने पर मौजूद थे। माथुर साहब ने इन्सपेक्टर शुक्ला को सारी बात बताई, इन्सपेक्टर शुक्ला ने बहुत तत्परता दिखायी उन्होने झटपट रिपोर्ट लिखी फिर अपने साथ दो सिपाहियो को लेकर माथुर साहब के साथ मनोज और रजना की खोज में निकल पडे। इन्सपेक्टर शुक्ला ने चौराहे पर अपनी जीप खड़ी की और पूछताछ करने लग।

गाड़ी पर की पुनरुताछ के बाद एक रिक्सेवाले ने बताया कि लगभग डेढ़ घटा पहले उसने एक लड़का और एक लड़की को अस्पताल पहुंचाया है। उनके साथ एक बीमार बुढ़िया भी थी जो जोर-जोर से हांफ रही थी। लड़की की उम्र लगभग ग्यारह-बारह साल की थी, जो लाल बंदीवाली फ्राक पहने थी तथा लड़के की उम्र लगभग सात-आठ साल की थी। वह भूरे रंग का हाफ पैन्ट तथा नीला-सफदे धारी वाला शर्ट पहने था।

“हा…हां… वे ही मेरे बच्चे हैं…।” श्रीमती माथुर बीच में ही बोल पड़ी।

“लेकिन उनके साथ वह बीमार बुढ़िया कौन हो सकती है…।” माथुर साहब बोले।

“यहां बात करने से बेहतर होगा कि हम लोग सीधे अस्पताल ही चलें…।” | इन्सपेक्टर शुक्ला ने कहा। ___”हां इन्सपेक्टर साहब…जल्दी चलिए…।” श्रीमती माथुर बोली और फौरन जीप में बैठ कर सभी लोग अस्पताल चल पड़े।

अस्पताल पहुंच कर सभी ने देखा कि जनरल वार्ड के एक बेड पर गन्दी और फटी साड़ी में लिपटी एक बुढ़िया लेटी कराह रही थी, और उसके सिरहाने स्टूल पर बैठी रंजना उसका सर दबा रही थी। इससे पहले कि माथुर साहब या उनकी |पत्नी कुछ पूछते रंजना खुद ही बोल पड़ी, “पापा ! जब मैं और मनोज पटाखे खरीदने के लिए घर से निकले तो चौराहे की तरफ मेन रोड़ से न आ कर जल्दबाजी में पिछवाड़े बाली गली से आए।

जब हम लोग रास्ते में पड़नेवाली झोपड़ियों के पास से गुजर रहे थे तो हमें एक झोपड़ी के अन्दर से कराहने की आवाज सुनाई पड़ी। हम दोनों एक गए और एक दसर से झोपड़ी के अन्दर झाँकने लगे। हमने देखा कि यह बुढ़िया माई जमीन पर पड़ी कराह रही थी और दर्द के मारे छटपटा रही थी। झोपड़ी के अन्दर और कोई भी नहीं था। हम दोनो डरते-डरते झोपड़ी के अन्दर गए और इससे बातचीत की इसने बताया कि इसका बेटा रिक्सा चलाता है।

 वह रिक्सा लेकर कहीं गया था। इसकी वह भी किसी के बेटा रिक्सा चलाता है। वह रिक्सा लेकर कहीं गया था। इसकी बहू भी किसी के घर चौका-बरतन करने गई थी। यह अकेली पड़ी छटपटा रही थी और इसका शरीर तेज बुखार से तप रहा था। हमने सोचा पता नहीं इसके बेटे-बहू कितनी देर में लौटें। तब तक कहीं इसकी हालत और ज़्यादा न बिगड़ जाए। 

इसलिए इसको रिक्से मे लादकर हम अस्पताल ले आए और डाक्टर साहब को दिखा कर यहां भर्ती करा दिया। आप ने हमें पटाखे खरीदने के लिए जो रुपए दिए थे वह | हमारे पास थे ही। उन्हीं पैसों में से हमने रिक्से का किराया दिया है और बाकी पैसे लेकर मनोज इसके लिए दवाईयां लाने गया है…।” रंजना ने अपनी बात | खतम की ही थी कि तभी दवाईयां लिए मनोज भी आ गया।

 माथुर साहब उनकी पत्नी, सहित दरोगा, सिपाही आदि सभी लोग आश्चर्य से । रंजना की बातें सुनते रहे। “शावास ! तुम दोनों ने बहुत अच्छा काम किया है बेटे… चलो अब हम तुम्हारे | लिए ढेर सारे पटाखे और फुलझड़ियां खरीदेंगे…।

माथुर साहब ने कहा।  “नहीं पापा… अब हम पटाखे नहीं खरीदेंगे. मैंने और दीदी ने यह तय किया है कि हर वर्ष दीपावली पर हम जिन रुपयों के पटाखे फुलझड़ी छुड़ा कर धुये मे उडा देते हैं अब हर साल उन रुपयों से किसी गरीब की सहायता किया करेंगे. पैसे  कम पड़ जाने के कारण में इस बूढ़ी दादी की एक दवाई नहीं ला पाया हू 

पापा! आप उसे मंगवा दीजिए प्लीज…” मनोज ने कहा। शाबास बेटे ! अगर हमारे देश के सभी बच्चे तुम्हारी ही तरह समझदार हो। जायें तो फिर क्या कहने… हर साल दीपावली पर जो लाखों रुपए धुंआं और बारूद के रूप में उड़ा दिए जाते हैं उन रुपयों से सैकड़ों गरीबों की किस्मत बदल सकती है ।” इन्सपेक्टर शुक्ला ने मनोज की पीठ थपथपाते हुए कहा और उसे गोद मे उठा लिया।

शिक्षा (Moral of the story)

त्योहारों के आने पर गरीबों की मदद करें।


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अभय कौन ?

एक चूहे ने तपस्या करके शंकर से वरदान मांगा कि हे प्रभो । मुझे रात-दिन बिल्ली का भय रहता है । मैं सुख से नीद नहीं ले सकता। न सुख से खाना ही खा सकता हूं। अतः आप मुझे बिल्ली बना दीजिए । शंकर ने वैसा ही किया। बिल्ली बन जाने के बाद अब उसे कुत्ते का भय सताने लगा। इसी दुविधा को लेकर वह शंकर के पास गया और बोला-मैं तो कुत्ते के भय से आक्रान्त हूं।

हृदय हरदम कांपता रहता है कि कही कुत्ता निगल न जाये। अतः कृपा करके आप मुझे चीता बना दीजिए । शंकरजी उस पर सन्तुष्ट थे। अतः उसकी बात कैसे टाल सकते थे ! वह चीता बन गया । अब भी वह अभय कहाँ था। हर समय उसे अरण्य के स्वामी सिंह का भय कुरेदने लगा। मन में अशान्ति का स्रोत बहने लगा। दौड़ा-दौड़ा फिर शंकर की छत्रछाया में पहुंचा और हाथ जोड़कर बोला-देव ! क्या करूं, मन मे स्वस्थता नही है, शान्ति नहीं है।

कहीं सिंह  आकर मुझे कुचल न दे। क्योंकि वह मेरे से बलिष्ठ है। शंकर ने उसे चीते से सिंह और सिंह से आखिर मनुष्य बना दिया।शंकर ने उससे एक दिन पूछा-क्यों ? अब तो कोई डर नहीं सता रहा है? सर्वश्रेष्ठ योनि में पहुंच गया। उसने कहा-देव ! मैंने तो सोचा था कि मनुष्य होने के बाद कोई समस्या रहेगी ही नहीं। किसी का भय सतायेगा ही नही । किन्तु यह बात नहीं है। अब भी मेरे मन में समाधि नहीं है।

हरदम मैं चिंतित रहता हूं। मौत का रमाज भी सता रहा है। मनुष्य होने पर भी मेरी समस्या सुलझ नहीं पायी है। मैं चाहता हूं कि मुझे फिर चूहा बना दिया जाये। शंकर ने बर दिया और चूहा अपने मूल रूप में आ गया। 

शिक्षा (Moral of the story)

मृत्यु-विजेता ही अभय बनता है । अभय बने बिना जीवन में सुख शान्ति का संचार नहीं हो सकता।

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सबसे खराब क्या

 एक दुःखी व्यक्ति इधर-उधर भटकता हुआ एक संन्यासी के पास आ पहुंचा । हाथ  जोड़कर बोला-‘महात्माजी ! मैं संसार से ऊब गया। संसार मुझे गरल की भांति कटु लगता है। मुझे निकालिये। संसार-समुद्र से पार लगाइये।’ महात्माजी बोले-‘मुसाफिर !’ सबसे पहले यह निगाह करके आओ कि दुनिया में सबसे खराब चीज क्या है ?

 उसके पश्चात् मैं तुझे संन्यास दूंगा।’ वह मुसाफिर खराब चीज की खोज में चल पड़ा । खोज करते-करते वह थक गया। आखिर वह फिरताफिरता अशुचि-गृह में पहुंचा। उसे घृणा की दृष्टि से देखने लगा । नाक पर कपड़ा लगाया, सोचा- सबसे खराब चीज यही है।

गंदगी बोली-‘अरे भैया ! तू मुझसे घृणा क्यो कर रहा है, क्यों नाक पर कपड़ा डालकर मुंह बिगाड़ रहा है ? इसमें मेरा दोष तनिक भी नहीं है। यह सब दोष है मानव के शरीर का  मुझे खराब करने वाला मनुष्य ही तो है। मनुष्य के योग से ही मेरा तिरस्कार व अपमान हो रहा है।’ मुसाफिर चोंका । आश्चर्य का ठिकाना न रहा और वह दौड़ा-दौड़ा महात्मा जी के पास पहुंचा ।

विनय के कोमल शब्दों में बोला ‘गुरुदेव ! प्रश्न के समाधान हेतु बहुत घूमा । आखिर उत्तर लेकर आया हूं। छान-बीन करने पर यही तत्त्व मिला-‘सबसे खराब मनुष्य का शरीर।’ उत्तर सुनकर महात्माजी बहुत खुश हुए और आशीर्वाद देते हुए बोले-‘मुसाफिर ! तू ठीक समझा। मुझे सही ज्ञान मिला। अब मुझे संन्यास देने में तनिक भी हिचकिचाहट नहीं है।’ उसे संन्यास दे दिया गया।

शिक्षा (Moral of the story)

मनुष्य को जब यह ज्ञान हो जाये कि सबसे खराब मेरा शरीर है, तब वह इस शरीर (चमड़ी) से कभी भी मोहित नहीं होगा। न ही रूप में पागल बनेगा, वास्तव में यह सच्चा ज्ञान ही आत्म-विकास का प्रशस्त सोपान है।


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चन्दन और कीचड़ 

एक दिन चंदन और कीचड़ का मिलन हो गया। दोनों अपनी-अपनी प्रशंसा के पुल बांधने लगे। चंदन बोला-‘भाई कर्दम ! मेरी बराबरी तू नहीं कर सकता । मेरी शीतलता से सारा संसार परिचित है। मेरे में इतनी बड़ी शक्ति है कि भयंकर दाह ज्वर की पीड़ा को भी मैं शांत कर सकता हूं। आग में झुलसते हुए मानव के लिए मैं त्राण हूं। रक्षक हूं। मेरे संसेवन से मानव का मानस शीतलता से भर जाता है । मैं बड़ा मूल्यवान् हूं। हर एक व्यक्ति मुझे नहीं खरीद सकता । मेरी मोहकता की महक हर व्यक्ति को आकर्षित करने में सफल हो रही है।’

कीचड़ ने रोष भरी भाषा में कहा-‘वन ! तू आत्म-प्रशंसा करने में बड़ा दक्ष है । केवल अपनी गुण-गाथा गा-गाकर मन-ही-मन फूल रहा है। मेरे में जो वैशिष्ट्य है वह तेरे में नहीं है, मैं सदा मुसकराता रहता हूं।’ ऐसे आपस में बात तन गयी। कोई भी झुकने को तैयार नहीं है। आखिर दोनों ने सोचा-ऐसे परस्पर झगड़े से समाधान नहीं मिलेगा। किसी निर्णायक के सामने बहस करना उचित रहेगा। वहां अवश्य ही सही समाधान मिलेगा। आखिर दोनों की सलाह से मेंढक को ही निर्णायक के रूप में स्थापित किया गया।

मेंडक ने दोनों पक्ष की बातें सुनीं। गहराई से सोचकर अपना निर्णय सुनाते हुए कहा-‘चंदन ! तुम चाहे कितनी ही आत्म-श्लाघा करो, किंतु कीचड़ की बराबरी नहीं कर सकते । संसार में सबसे शीतल तत्त्व कीचड़ है।’ आखिर मेंढक से अन्य निर्णय की आशा भी क्या की जा सकती थी? रात-दिन कीचड़ में ही आनन्द अनुभूति करने वाला मेंढक बेचारा चंदन के मूल्य का क्या अकन कर सकता है ? कदापि नहीं।

शिक्षा (Moral of the story)

गोबर का कीरा गोबर में ही खुश रहता है। जो व्यक्ति जिसके गुणों से अपरिचित होता है वह उसकी प्रशंसा कभी भी नहीं कर सकता। वह उसे घृणा की दृष्टि से निहारता है। अतः हर एक के गुणों की जानकारी रखना प्रत्येक का कर्तव्य होता है।

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गम से लाभ

बादशाह ने बीरबल से पूछा-‘ये साहुकार लोग क्या खाते हैं? कितने हष्ट-पुष्ट रहते हैं।’ बीरबल बोला-‘जहांपनाह ! ये लोग जो खाते हैं, वह आप नहीं खा सकते।’ बादशाह- बीरबल ! बताओ तो सही क्या खाते हैं ?’ बीरबल-अवसर आने पर बताऊंगा।’ एक दिन बादशाह और बीरबल हाथी के होदे पर शहर में ब्रमणार्थ निकल पड़े। बाजार में पहुंचे। इधर सेठ की दुकान पर भीखमंगों की जमात मांगने के लिए आई। एक आने की याचना की। सेठ बोला-‘एक पैसा दूंगा।’ याचकों ने कहा- ‘एक आना लिये बिना नहीं जायेंगे।’ सेठ ने मन ही मन सोचा, बादशाह की सवारी आ रही है। ये मगजपच्ची कर रहे हैं। यह लो एक आना।

याचक-‘अब हम नहीं लेंगे एक आना । दो आना लेकर जायेंगे।’ बीरबल ने बादशाह को सेठ की दुकान का संकेत किया। कुछ ही समय के पश्चात् सेठ दो आना देने लगा।  याचक-‘आपने हमारा अमूल्य समय कितना नष्ट कर दिया। अब हम दो आना नहीं,चार आना लेंगे। सेठ ने देखा बादशाह बहुत निकट आ गये हैं। ये पागल बेवकूफ दुकान से हट नहीं रहे हैं। इसी खींचातानी व उधेड़बुन में सेठ खिन्न हो गया। कैसे इनसे छुटकारा मिलेगा। अखिर मांगते-मांगते वे एक रुपया तक पहुंच गये।

सेठ बड़ा क्षुब्ध हुआ। विवशता से उनको एक रुपया देना पड़ा। मांगने वाले एक रुपया लेकर रवाना होते-होते सेठ के बदन पर थप्पड़ मारकर भाग गये। सेठ की पगड़ी नीचे गिर पड़ी । बादशाह बिलकुल नजदीक पहुंच गये। सेठ सट अपनी पगड़ी बांधकर दुकान पर बैठ गया । आकृति पर तनिक भी विषाद की रेखा नहीं। वही मुस्कराहट, वही उल्लास की लहर मानो कुछ अघटित घटना घटी ही नहीं। बीरबल सब निहार ही रहा था।

बादशाह की सवारी आगे बढ़ रही थी। बीरबल बड़ी विनम्रता से बोला’गरीब निवाण! देखा आपने अनूठा तांडव। मांगने वाले रुपया भी ले गये और सेठ के थप्पड़ भी जमा गये। सेठजी का इतना अपमान होते हुए भी उन्होंने गुस्सा नहीं किया। कितनी खामोशी रखी। दुकान पर ज्यों के त्यों रोब से प्रफुल्लितमना बैठे हैं। इस प्रकार ये साहूकार लोग गम खाते हैं।

उसी का फलित है कि ये लोग शारीरिक दृष्टि से पुष्ट बताये-मोटे रहते हैं। क्या ऐसा गम आप रख सकते है। बादशाह बोला-बीरबल ! ऐसा गम मैं नहीं रख सकता । तनिक अपमान पर भी मुझे क्रोध आ जाता है। इसी कारण दुबला-पतला रहता हूं।

शिक्षा (Moral of the story)

जो व्यक्ति गम खाते हैं। खामोशी रखते हैं, वह मानव हर क्षेत्र में सफल होता है। उसकी सर्वत्र पुजा होती है, प्रतिष्ठा बढ़ती है।

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मन का डर

कुछ लोग ऐसे होते हैं जो ज्यादा से ज्यादा सीखने समझने और जानने को उत्सुक रहते हैं। जबकि कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जिन्हें बस अपने काम से ही काम रहता है। उसी के बारे में सोचने, समझने और करने के सिवाय उन्हें और कुछ सूझता नहीं। उन दिनों मैं भी इन्हीं लोगों में से था। पक्का घुनी और तुनकमिजाजी।

उन दिनों मैं गांव में रहता था। पांचवीं कक्षा का छात्र था। आयु तेरह या चौदह के करीब थी । पहले तो पढ़ने लिखने में मन ही नहीं लगता था । मगर जब नाम कटा, मार पड़ी तो पक्का पढ़ाकू बन गया। पढ़ने में खूब मन रमता। किताबो से चिपका रहता। और हां, शाम को थोड़ी देर के लिए अपना प्रिय खेल कबड्डी खेलने लिकल जाता; और खेल अच्छे नहीं होते हों, ऐसी बात नहीं, लेकिन मुझे तो बस कबड्डी प्रिय लगती थी। पूरे शरीर का व्यायाम हो जाता है इससे । यही सोच कर कबड्डी खेलता था।

पढ़ाई और कबड्डी। बस यही मेरे काम थे। इनके अलावा और कोई बात मेरे दिमाग में भूलकर भी नहीं आती थी। ऐसी बात नहीं कि और कोई काम थे ही नहीं। थे, मगर जब मेरो रुचि ही नहीं तो क्या हो सकता था ?

मैं किसी नए काम को सीखने को उत्सुक ही नहीं रहता था। दादा जी की दुकान थी लेकिन मुझे ठीक ठाक तोलना या दादा जी की तरह जिल्दी से रुपये-पैसे गिन लेना, छटांक-पाव का दाम जोड़ लेना नहीं आता था। मैं सीखता, कोशिश करता तभी तो आता।

होने को तो गाय भी घर में थी लेकिन दूध दुहने के नाम पर मुझे पसीना आने लगता था। एक बार चुपके से दुहने की कोशिश भी की थी मगर उसने वो लात मारी थी कि मैंने फिर हाथ ही जोड़ लिए। हालत बिगड़ गई थी मेरी। वह तो मौके पर दादी जी आ गई थीं नहीं तो मैं यह बात छिपा ही ले जाता।

मेरे गाँव के पूरब में एक किलोमीटर दूर एक नदी थी। इतवार के दिन मुझे भी नदी में नहाने जाना था। ऐसा करके मैं कोई रिवाज पूरा नहीं करता था। बस, दादा, बापू, चाचा और बड़े भइया के साथ जाता था। वे लोग तो रोज ही टहलते-टहलते नदी तक जाकर वहां से नहाकर ही लौटते थे। मुझे स्कूल जाना पड़ता था इसलिए कुएं से नहाकर चला जाता था। | मैं साचता था कि कितना अच्छा हो कि कभी इतवार ही नहीं आए या फिर कभी स्कूल में छुट्टी हो ही नहीं। क्योंकि सच बताऊँ मुझे नदी में नहाने से डर लगता था। मगर जबरदस्ती ले जाया जाता था। फिर भी मैं किनारे ही पर नहाता था। दादा बापू, चाचा और भइया तो तैरते हुए काफी गहरे में चले जाते थे। खूब डुबकियां मारते थे। वे तैर भी लेते थे। ऐसा मेरे चचेरे भाई और गांव के लडके भी कर लेते थे। बस मैं ही था जो एकदम डपारशंख था।

मैं तैरने की सोचता तो लगता कि डूबा और मरा। डुबकी लगाने पर भी ऐसा ही लगता था। इसलिए मैंने बस किनारे खड़े होकर हाथ से पानी छप्प-छप्प कर अपने ऊपर फेंकने या फिर साथ में लाए हुए लोटे से नहा लेने की जुगत बना रखी थी।

मेरी यह जुगत सभी के लिए हंसी और ठहाकों का विषय थी। लेकिन फिलहाल मैं कर भी क्या सकता था ? बाहर भी हंसी घर में भी हंसी, सच पूछो तो जान आफत में थी फंसी।

इन दिनों जंगल से गाय भैंस चराकर लौटते हुए चरवाहों के हाथों में टेसू के फूलों को देखकर मेरा मन बल्लियों उछल रहा था। आम के पेड़ों पर आ रहे बीर, फूल रही सरसों. पक रही गेंहूँ की बालियों और कोयलिया की कुहू कुहू ने मन में उमगों का सागर सा उड़ेल रखा था। “फागुन है। जल्दी ही होली के बाद इम्तहान हो जाएंगे। फिर बोल दी जाएगी लम्बी छुट्टी। मैं तो छक्कन काका की बगिया में पड़ा पड़ा खरटि भरा कदंगा। वहीं | पढाई भी होगी और फिर शाम को…। शाम को हुआ करेगी धमाकेदार कबड्डी….. ।

मैं बड़े उत्साह से आज यह सब मां से कह रहा था कि बीच में बड़े भझ्या बोल |पडे,“और सुबह रोज ही नदी पर नहाने चला करोगे। यह भी तो कहो……” | बड़े भइया की बात सुनकर मुझ पर जैसे सांप लोट गया। “देखो.. मां “”

तुनकते हुए मैं चुपचाप मुंह औंधा कर खाट पर पड गया। मैंने सोचा–बड़े भइया कहते तो ठीक ही हैं। छुट्टियों में तो रोज ही जाना | पडेगा नदी पर। रात भर मैं यह सोचकर परेशान होता रहा। “बापू, मैं इस बार की छुट्टियां मामा के घर बिताऊंमा । देखो, ना मत | कहना।” सुबह आँख खुलते ही मैंने अपने मन की बात कह दी। | मेरे शहर में रहते हैं। सब कुछ अनोखा है वहाँ। शाम को तिमंजिले पर खडे होकर चारों ओर देखो तो जगमगाहट भरा शहर परीलोक सा लगता है और रात ग्यारह-बारह बजे देखो तो जलते बल्बों से लगता है जैसे आसमान धरती पर उतर आया हो। मैं यह सारी बातें सोचकर कहुत खुश हो रहा था।

छुट्टियों में बापू कुझे मामा के घर छोड़ आया मगर दिन मस्ती में नहीं बीत रहे थे। वहां कोई कष्ट मिलता हो, ऐसी बात भी नहीं। वह तो मेरा ही डरपोक स्वभाव उन सबके लिए हसी का विषय बन जाता मै मन ही मन चढता और तुनकता सोचता, क्या मै हमेशा ऐसा ही बना रहूँगा।

“कल रविवार है। तुम्हारे भइया नदी पर जायेंगे। तुम भी साथ चले जाना।”

मेरी हालत खराब। बहानेबाजी काम न आई। मामा-मामी फिर बोले, “चले जाना, वंहा तुम्हें अच्छा लगेगा।”

मुझे गुस्सा सा आ रहा था। यह भइया भी अजीब है। एम. ए. है। अच्छी नौकरी पर हैं। अच्छा घर है। फिर भी नदी पर जाते हैं।” लेकिन अगले दिन मुझे खुद पर हंसी आयी। जानेंगे तो आपको भी आएगी। भझ्या नदी पर नहीं नदीपुर जा रहे थे। वह एक कस्बा था। तीन ओर नदी होने के कारण उसे नदीपुर कहा जाने लगा था।

मेरी जान में जान आई। भझ्या के पास मोपेड थी। उन्होंने स्टार्ट की। मैं पीछे बैठ गया। भइया मोपेड चला लेते हैं। उन्हें डर नहीं लगता। मैं तो साइकिल भी नहीं चला पाता। डर जो लगता है। एक बार चलाने की कोशिश भी की थी तो गिर पड़ा था। साथी खूब हंसे थे। तभी से दुबारा मैंने कोशिश ही नहीं की थी।

मोपेड तेज भाग रही थी। मैंने पिछला हिस्सा कसकर पकड़ लिया था। मुझे कहना ही पड़ा “भइया, धीरे चलाइए।”

भइया कोई उत्तर देते कि एक जोर की चीख सुनाई दी-“बचाओ….।” ।

भइया ने तेज ब्रेक के साथ मोपेड रोक दी। मोपेड पुल पर थी। मैंने देखा कोई डूब रहा था। भइया ने एक झटके में मोपेड खड़ी की। मैं तो बस उनका चेहरा ताक रहा था। वे पुल से ही कूद गये।

मेरा मुंह खुला सा रह गया। दिल की धड़कनें तेज हो गईं। भइया ने तैरते हुए जल्दी से उसे पकड़ कर पीठ पर लादा और किनारे आ गए। उसे पेट के बल लिटा कर पेट का पानी निकाला। कछ ही देर में उसे होश आ गया। मुझे बड़ा अजीब लग रहा था। भइया की जगह कहीं मैं होता तो… ? बस, आखे फाडे उसे डूबता देखता रहता। इसके सिवाय मैं कर भी क्या सकता था।”

जितना ज्यादा ज्ञान हो, हुनर हो। जितने तौर तरीके अपने पास हों, उतना ही अच्छा है। वक्त पर सब काम आते हैं।

मेरे मन का डर अब न जाने कहां गायब हो गया था। मैं सीखंगा, करूंगा। वह सब करूंगा जिसकी सुविधाएं मुझे हैं। मन ही मन मैने यह संकल्प कर लिया।

छुट्टियां बीतीं। एक नए जोश के साथ मैं गांव आ गया।


बल से बड़ी बुद्धि

एक गुफा में एक बड़ा ताकतवर शेर रहता था। वह प्रतिदिन जंगल के अनेक जानवरों को मार डालता था। उस वन के सारे जानवर उसके डर से काँपते रहते थे। एक बार जानवरों ने सभा की। उन्होंने निश्चय किया कि शेर के पास जाकर उससे निवेदन किया जाए। जानवरों के कुछ चुने हुए प्रतिनिधि शेर के पास गए। जानवरों ने उसे प्रणाम किया।

फिर एक प्रतिनिधि ने हाथ जोड़कर निवेदन किया, ‘आप इस जंगल के राजा है। आप अपने भोजन के लिए प्रतिदिन अनेक जानवरों को मार देते हैं, जबकि आपका पेट एक जानवर से ही भर जाता है।’

शेर ने गरजकर पूछा-‘तो मैं क्या कर सकता हूँ?’

सभी जानवरों में निवेदन किया, ‘महाराज, आप भोजन के लिए कष्ट न करें। आपके भोजन के लिए हम स्वयं हर दिन एक जानवर को आपकी सेवा में भेज दिया करेंगे। आपका भोजन हरदिन समय पर आपकी सेवा से पहुँच जाया करेगा।’

शेर ने कुछ देर सोचा और कहा-‘यदि तुम लोग ऐसा ही चाहते हो तो ठीक है। किंतु ध्यान रखना कि इस नियम में किसी प्रकार की ढील नहीं आनी चाहिए।’

इसके बाद हर दिन एक पशु शेर की सेवा में भेज दिया जाता। एक दिन शेर के पास जाने की बारी एक खरगोश की आ गई। खरगोश बुद्धिमान था।

उसने मन-ही मन सोचा- ‘अब जीवन तो शेष है नहीं। फिर मैं शेर को खुश करने का उपाय क्यों करूँ? ऐसा सोचकर वह एक कुएँ पर आराम करने लगा। इसी कारण शेर के पास पहुँचने में उसे बहुत देर हो गई।’

खरगोश जब शेर के पास पहुँचा तो वह भूख के कारण परेशान था। खरगोश को देखते ही शेर जोर से गरजा और कहा, ‘एक तो तू इतना छोटा-सा खरगोश है और फिर इतनी देर से आया है। बता, तुझे इतनी देर कैसे हुई?’

खरगोश बनावटी डर से काँपते हुए बोला- ‘महाराज, मेरा कोई दोष नहीं है। हम दो खरगोश आपकी सेवा के लिए आए थे। किंतु रास्ते में एक शेर ने हमें रोक लिया। उसने मुझे पकड़ लिया।’

मैंने उससे कहा- ‘यदि तुमने मुझे मार दिया तो हमारे राजा तुम पर नाराज होंगे और तुम्हारे प्राण ले लेंगे।’ उसने पूछा-‘कौन है तुम्हारा राजा?’ इस पर मैंने आपका नाम बता दिया।

यह सुनकर वह शेर क्रोध से भर गया। वह बोला, ‘तुम झूठ बोलते हो।’ इस पर खरगोश ने कहा, ‘नहीं, मैं सच कहता हूँ तुम मेरे साथी को बंधक रख लो। मैं अपने राजा को तुम्हारे पास लेकर आता हूँ।’ खरगोश की बात सुनकर दुर्दीत शेर का क्रोध बढ़ गया। उसने गरजकर कहा, ‘चलो, मुझे दिखाओ कि वह दुष्ट कहाँ रहता है?’

खरगोश शेर को लेकर एक कुँए के पास पहुँचा। खरगोश ने चारों ओर देखा और कहा, महाराज, ऐसा लगता है कि आपको देखकर वह शेर अपने किले में घुस गया।’

शेर ने पूछा, ‘कहां है उसका किला?’ खरगोश ने कुएँ को दिखाकर कहा, ‘महाराज, यह है उस शेर का किला।’

खरगोश स्वयं कुएँ की मुँडेर पर खड़ा हो गया। शेर भी मुँडेर पर चढ़ गया। दोनों की परछाई कुएँ के पानी में दिखाई देने लगी। खरगोश ने शेर से कहा, ‘महाराज, देखिए। वह रहा मेरा साथी खरगोश। उसके पास आपका शत्रु खड़ा है।’

शेर ने दोनों को देखा। उसने भीषण गर्जन किया। उसकी गूंज कुएँ से बाहर आई। बस, फिर क्या था! देखते ही देखते शेर ने अपने शत्रु को पकड़ने के लिए कुएँ में छलाँग लगा दी और वहीं डूबकर मर गया।

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